जिंदगी ऑनलाइन अथार्त वर्क फ्रॉम होम

श्रीमती मनीषा पांडेय 

दुनिया भर में कोविड-19 की महामारी का शोर है। कारोबार, फ़ैक्ट्रियां, बाज़ार, सिनेमा, स्कूल और कॉलेज बंद हैं। लोग घरों में बंद हैं और घर की दीवारों में सिमट गई है तेज रफ्तार से भागती रोजमर्रा की जिंदगी। कोरोना वायरस के संक्रमण ने कुछ ही हफ़्तों में अभिवादन, काम करने और शिक्षा के तौर-तरीक़े को भी बदल डाला है। पूरी दुनिया में लोग घर से काम करने के विश्वस्तरीय प्रयोग के लिए बाध्य हो गए हैं।

दुनिया में कोरोना वायरस का असर लंबे समय तक रहने वाला है। प्रधानमंत्री मोदी भी देश को संबोधित करते हुए कह चुके हैं कि लोगों को कोरोना के साथ ही जीना पड़ेगा। इतना तो तय है कि कोरोना वायरस की आपदा गुजर जाने के बाद जीवन पहले जैसा नहीं रह जाएगा। इस आपदा से निबटने के लिए उठाए गए छोटे-मोटे कदम भी हमारी आदतों में शुमार हो जाएंगे। लेन-देन काफी हद तक डिजिटल हो जाएगा। शिक्षण-पद्धति, सरकारी कामकाज, व्यापार करने के तौर-तरीके व नौकरी-चाकरी के ढंग भी बदलेंगे। सोशल डिस्टेंसिंग को बनाए रखने के लिए 'वर्क फ्रॉम होम' की अवधारणा अब महत्वपूर्ण बन जाएगी।

मध्ययुग में भी 'वर्क फ्रॉम होम' की संस्कृति विद्यमान थी। लोगों के मकानों में किचन और बेडरूम के साथ कताई, बुनाई, सिलाई या गोश्त, सब्जी और डेयरी की दूकानें सटी होती थीं। आगे चलकर मुख्य सड़क पर कार्यस्थल अथवा शॉप और उसी के पीछे निवास बनाने का प्रचलन भी खूब था। अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध तथा उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में यूरोप में हुई औद्योगिक क्रांति ने लोगों को घर से निकल कर मिलों और फैक्ट्रियों में काम करने को मजबूर कर दिया। क्योंकि मशीनों से बड़े पैमाने पर तैयार होने वाले माल ने हमारे कुटीर उद्योगों और विविध कलाओं पर सर्वाधिक प्रभाव डाला। आज भी क्रिएटिव राइटिंग, इडीटिंग, ग्रैफिक डिजाइनिंग, फैशन और ब्यूटी, इंटरटेनमेंट और मीडिया जैसे काम पूरी तरह से घर बैठे संपन्न किए जा सकते हैं, लेकिन ऑफिस को अपना अभेद्य दुर्ग समझने वाले बॉसेस को यह बात हजम नहीं होती है।

कोरोना संकट के इस दौर ने यह दिखाया है कि टेलीवर्किंग यानी घर से काम करने का चलन सिर्फ इसलिए ज़रूरी नहीं है कि कंपनियों को महंगे होते जा रहे दफ्तरी इलाकों की समस्या से निपटना है बल्कि शहरों में घर-दफ्तर के बीच बढ़ती दूरियों, ट्रैफिक जाम और परिवहन के बढ़ते खर्चों जैसी कई समस्याओं का हल भी खोजना है। लाखों लोगों के घर से काम करने की इस कोशिश का क्या सुखद अंजाम निकल सकता है, इन दिनों हमारे देश समेत पूरी दुनिया ने यह देखा है। इन दिनों प्रकृति खुल कर सांस ले रही है। पक्षियों की चहचहाट अब दिन में भी सुनाई दे रही है और जंगली जानवर खुली सड़कों पर चहलक़दमी कर रहे हैं।

वर्क फ्रॉम होम की जिस अवधारणा को अभी तक फुटकर में अपनाया जाता था, कोरोना के संकट ने साबित कर दिया है कि अगर इस वर्क कल्चर के कायदों को सलीके से अपनाया जाता तो आपदाओं में लगने वाले हर किस्म के झटकों को हम आसानी से सह जाते। भारत के श्रम क़ानून अभी भी 19वीं सदी की आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले हैं, जबकि बाक़ी की दुनिया पहले ही इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुकी है। सरकार को चाहिए कि वो दूर से काम करने को वैधानिकता और नियामक जामा पहनाने के लिए गंभीरता से सोचना आरंभ कर दे। 

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