हरेला - प्रकृति के पूजन एवं पोषण का लोक पर्व 

महेश डोभाल

भारतीय संस्कृति की यह विशेषता रही है कि इसमें जीवन के जिन कर्त्तव्यों अथवा मूल्यों को प्रकृति के संरक्षण व संवर्धन के लिये श्रेष्ठ और आवश्यक जाना गया है, उन्हें धार्मिकता और पुण्यलाभ के साथ जोड़ दिया गया है, जिससे व्यक्ति उनका पालन व अनुकरण अनिवार्य रूप से करे। प्राकृतिक संसाधनो से सूझबूझ के साथ सामंजस्य का दर्शन उत्तराखंड की ऐसी ही एक दूरदर्शिता से परिपूर्ण परम्परा में है जिसे हरेला के नाम से जाना जाता है। प्राकृतिक रूप से धरा को हर्ब, शर्ब, बुश और ट्रीज के रोपण के द्वारा हरियाली से परिपूर्ण करने का हर छोटा व बड़ा प्रयास ही हरेला कहलाता है।

 

मानव और प्रकृति के परस्पर प्रेम को दर्शाता यह पर्व हरियाली का प्रतीक है। आज के समय में पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से इस त्योहार की महत्ता और बढ़ गई है। सामान्यतया हरेला वर्ष भर में तीन अलग-अलग अवसरों पर मनाया जाता है। प्रथम चरण में चैत्र मास के अवसर पर, द्वितीय चरण में श्रावण मास के अवसर पर व तृतीय चरण में अश्विन मास के दौरान हरेला का पर्व मनाया जाता है। 

श्रावण मास के दौरान मनाया जाने वाला हरेला इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि एक तो इस समय वर्षा ऋतु के दौरान लगाए जाने वाली पौध बिना अधिक देखभाल के कम समय में व सहजता से ही प्रकृति के बीच अपना अस्तित्व बनाने में सफल हो जाती है दूसरा श्रावण मास शंकर भगवान जी को विशेष प्रिय है और भगवान शिव का निवास स्थान कैलाश (हिमालय) में होने के कारण उत्तराखंड की भूमि को शिव भूमि (देवभूमि) भी कहा जाता है। इसलिए हरेले के इस पर्व को कही कही हर-काली के नाम से भी जाना जाता है। 

 

श्रावण मास के हरेले में भगवान शिव परिवार की पूजा अर्चना की जाती है। शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की मूर्तियां शुद्ध मिट्टी से बना कर उन्हें प्राकृतिक रंग से सजाया-संवारा जाता है। जिन्हें स्थानीय भाषा में डिकारे कहा जाता है। सावन लगने से नौ दिन पहले गेहूँ, जौ, धान, गहत, भट्ट, उड़द, सरसों आदि पांच या सात प्रकार के अनाज के बीज एक रिंगाल को छोटी टोकरी में मिटटी डाल के बोई जाती हैं। इसे सूर्य की सीधी रोशनी से बचाया जाता है और प्रतिदिन सुबह पानी से सींचा जाता है।

हरेले से एक दिन पहले  9वें दिन इनकी पाती की टहनी से गुड़ाई की जाती है और डेकर यानी श्री हरकाली पूजन होता है। घर के आंगन से शुद्ध मिट्टी लेकर शिव, पार्वती, गणेश, कार्तिकेय आदि की छोटी मूर्तियां तैयार की जाती हैं। उन्हें रंगने के साथ बाकायदा श्रृंगार किया जाता है। हरेले के सामने शिव-पार्वती का पूजन कर धन-धान्य की कामना की जाती है। हरकाली पूजन में पुवे-प्रसाद, फल आदि का भोग लगाया जाता है। हरेले की गुड़ाई की जाती है। पहले से सामूहिक रूप से डेकर पूजन की परंपरा रही है। मोहल्ले और गांव के लोग एक साथ डेकर पूजन करते थे। बाद में प्रतीकात्मक रूप से घरों में पूजन किया जाने लगा। 10वें दिन हरेला अथार्त 4 से 6 इंच लम्बे इन पौधों को काटा जाता है। विधि अनुसार घर के बुजुर्ग सुबह पूजा-पाठ करके हरेले को देवताओं को चढ़ाते हैं। घर के सदस्य इन्हें बहुत आदर के साथ अपने शीश पर रखते हैं। घर में सुख-समृद्धि के प्रतीक के रूप में हरेला बोया व काटा जाता है। इसके मूल में यह मान्यता निहित है कि हरेला जितना बड़ा होगा उतनी ही फसल बढ़िया होगी। साथ ही प्रभू से फसल अच्छी होने की कामना भी की जाती है। हरेला पर्व उत्तराखंड के अतिरिक्त हिमाचल प्रदेश में भी हरियाली पर्व के रूप में मनाया जाता है। हरियाली या हरेला शब्द पर्यावरण के काफी करीब है। ऐसे में इस दिन सांस्कृतिक आयोजन के साथ ही पौधारोपण भी किया जाता है। जिसमें लोग अपने परिवेश में विभिन्न प्रकार के छायादार व फलदार पौधे रोपते हैं।

यह पर्व लोक विज्ञान और जैव विविधता से भी जुड़ा हुआ है। हरेला बोने और नौ-दस दिनों में उसके उगने की प्रक्रिया को एक तरह से बीजांकुरण परीक्षण के तौर पर देखा जा सकता है। इससे यह सहज पूर्वानुमान लग जाता है आगामी फसल कैसी होगी। हरेले में मिश्रित बीजों के बोने की जो परम्परा है वह बारहनाजा अथवा मिश्रित खेती की पद्धति के महत्व को भी दर्शाता है। परिवार व समाज में सामूहिक और एक दूसरे की भागीदारी से मनाये जाने वाला यह लोक पर्व सामाजिक समरसता और एकता का भी प्रतीक है क्योंकि संयुक्त परिवार चाहे कितना भी बड़ा हो पर हरेला एक ही जगह पर बोया जाता है और तो और कहीं-कहीं पूरे गांव का हरेला सामूहिक रूप से एक ही जगह विशेषकर गांव के मंदिर में भी बोया जाता है। पहले हरेले पर कई स्थानों में मेले भी लगते थे परन्तु आज वर्तमान में छखाता पट्टी के भीमताल व काली कुमाऊं के बालेश्वर व सुई-बिसुंग में ही मेले आयोजित होते है। 

विभिन्न अवसरों सहित हरेला के पर्व पर रोपित किए जाने वाले वृक्षों की महत्ता को मत्स्यपुराण में लिखी इस बात से समझा जा सकता है जिसमें लिखा गया है कि- "दशकूप समावापी दशवापी समोहदः, दशहद समः पुत्र दश पुत्र समोदयः" अर्थात लोक कल्याण की दृष्टि से दस कुओं के समान एक बावड़ी, दस बावडियों के समान एक तालाब, दस तालाबों के समान एक पुत्र और दस पुत्रों के समान एक वृक्ष का महत्व  है। वृक्ष को पुत्र के समान महत्व देते हुये कहा गया है कि एक व्यक्ति के द्वारा पालित वृक्ष वही कार्य करता है जो एक पुत्र करता है। वह अपने पुष्पों से देवों को प्रसन्न करता है, छाया से यात्रियों को सुख पहुँचाता है और अपने फलों से मनुष्यों को संतुष्ट करता है। वृक्ष का रोपण करने वाला दु:ख से परे होता है। 

 

खेद का विषय है कि इस सनातन सोच के विपरीत आज के उपभोक्तावादी समाज में  मनुष्य यह समझने लगा है कि समस्त प्राकृतिक संपदा पर सिर्फ और सिर्फ़ उसी का आधिपत्य है। वह जैसा चाहें, इसका दोहन करें। इसी भोगवादी प्रवृति के कारण हमने प्रकृति का इस सीमा तक शोषण कर लिया कि अब हमारा स्वयं अपना ही अस्तित्व संकट में पड़ने लगा है। समूचे वैश्विक स्तर पर आज पूंजीवादी और बाजारवादी संस्कृति जिस तरह प्रकृति और समाज से दूर होती जा रही है यह बहुत चिन्ताजनक बात है। पर्यावरण के सिद्वान्तों के अनुरूप ही हम सभी को अपनी सुविधाओं एवं आकांक्षाओं में परस्पर तालमेल बिठाना होगा और हमें समझना होगा कि प्रकृति, पर्यावरण और पारिस्थितिकी की रक्षा किये बिना हमारा कोई अस्तित्व ही नही रहेगा। इसीलिये हम सबको उत्तराखंड की इन समृद्ध लोक परम्पराओं से सीख लेते हुये वृक्ष रोपण के अभियान को उच्चतम स्तर पर ले जाना होगा। 

इस अवसर पर कई व्यक्तियों के अनुभवों के आधार पर मैं एक बात बड़ी गंभीरता से कहना चाहता हूँ कि वृक्षरोपण करते समय वैज्ञानिक तथ्य, पुरातन ज्ञान एवं उस क्षेत्र की पारिस्थितिकी संतुलन में सहायक कारकों का आवश्यक रूप से ध्यान रखा जाना नितान्त आवश्यक है। हमने देखा है कि बिना गम्भीर अध्ययन के ही पहाड़ों में चीड़ के वृक्षों का जिस स्तर पर रोपण किया गया उससे आज अनेकों कठिनाइयां पैदा हो रही  हैं। धरती में वृक्ष रोपण करने से पहले हमें अपने मनोमस्तिष्क में समावेशी एवं सर्व कल्याण रूपी भावना का प्रस्फुटन करना होगा। सिर्फ़ हरे के लिये ही वृक्ष रोपण सही सोच नहीं है क्योकिं इससे कुछ अवसरों पर लाभ की जगह हानि की ही संभावना अधिक होगी। इसीलिये वृक्ष रोपण करते समय पुरातन ज्ञान व सर्व कल्याण की भावना के अनुरूप सघन छायादार, वर्षभर हरियाली युक्त, औषधीय, बहुउपयोगी तथा फलदार वृक्षों का अधिकाधिक रोपण करें । 

लेखक पर्यावरण संरक्षण, गंगा स्वच्छता अभियान आदि में सक्रियता से प्रतिभागिता करते रहे हैं एवं पहाड़ के विकास व नियोजन, पर्यावरण तथा संस्कृति विषयों पर सतत लेखन करते हैं वर्तमान में हेमवती नन्दन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय में इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं 

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