तो विश्व-भारती विश्वविद्यालय रामगढ में होता....

रबींद्रनाथ टैगोर ने की थी इसकी शुरूआत, पारिवारिक हालातों के चलते नहीं हुआ सपना साकार।

गुरूदेव के समतुल्य शेक्सपीयर हाउस से प्रेरणा लेकर हो टैगोर टॉप का विकास।

डाॅ०  गिरीश रंजन तिवारी

एक जून 2015 का दिन अक्सर याद आ जाता है, एक सेमीनार के सिलसिले में लंदन जाना हुआ था और उस दिन वापसी से पहले वारविक शायर में कालजयी लेखक विलियम शेक्सपीयर के स्ट्रैट फोर्ड अपऑन एवोन स्थित जन्म स्थान को देखने का कार्यक्रम बन गया। तब तक मन में विशेष उत्सुकता नहीं थी लेकिन वहां पहुंचकर जब उनके आवास को देखा तो मन में अभी बीते माह उत्तराखंड के अपने जिले नैनीताल के रामगढ में हुए रबीन्द्रनाथ टैगोर की 155वीं जयंती संबंधी कार्यक्रमों की याद ताजा हो गई और तमाम सवाल दिल में चुभने लगे।

 

कारण सिर्फ यह नहीं था कि ब्रिटेन ने टैगोर के अपने समतुल्य शेक्सपीयर की यादें ताजा रखने के लिये कैसे उनकी मृत्यु के चार सौ साल बाद भी उनके आवास को ज्यों का त्यों सहेज कर एक संग्रहालय का रूप दे दिया है बल्कि इसलिये और भी ज्यादा कि शेक्सपीयर के आवास के प्रांगण में विश्व के आज तक के इतिहास में केवल एक ही हस्ती का बुत लगा हुआ है और वे हैं रबींद्रनाथ टैगोर। टैगोर की प्रतिमा और वह भी केवल उनकी ही प्रतिमा यहां देखना जितना सुखद था उससे कहीं अधिक अप्रत्याशित।

ब्रिटिशर्स तो परंपरावादी होते ही हैं और चाहे वास्तुकला हो या जीवन शैली परंपरा का गहरा असर सब जगह देखने को मिलता है यहां तक कि उनका तो संविधान तक परंपराओं को ही नियम मान लेने से बना है। इसके चलते शेक्सपीयर हाउस में सोलहवीं शताब्दी की रसोई, स्नानागार, उनके पिता की कार्य करने और मां की भोजन परोसते की मुद्रा में बनी मूर्ति, उस दौर की पोशाकें सब कुछ जीवंत सा बनाया गया है। बाहर प्रांगण में दिन भर स्कूली विद्यार्थी और थियेटर आर्टिस्ट शेक्सपीयर के चर्चित नाटकों के दृश्यों का मंचन करते रहते हैं। सब कुछ इतना प्रभावशाली कि पर्यटक न भी चाहे तो शेक्सपीयर मेें उसकी रूचि जाग्रत हो जाए।

बहरहाल इससे एक माह पूर्व 7 मई को अपने रबींद्रनाथ टैगोर की 155 वीं जयंती कार्यक्रम रामगढ में आयोजित हुए थे। रामगढ वो जगह है जहां टैगोर 19वीं शताब्दी में पांच बार आए और अपने चर्चित कविता संग्रह “शिशु” सहित गीतांजलि के कुछ भाग की रचना की जिसके लिये 1913 में उन्हें साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला जो किसी एशियाई का पहला नोबल था। उनकी इन्हीं व अन्य रचनाओं के लिये 1915 में उन्हें ब्रिटिश सरकार ने नाइटहुड की उपाधि दी जिसके आधार पर नाम के साथ सर लगाया जाता था हालांकि 1919 में जलियांवाला कांड के विरोध में उन्होंने इस उपाधि को ब्रिटिश सरकार को लौटा दिया था।


रामगढ स्थित उनका यह आवास आज पूरी तरह खंडहर है और चारों ओर झाड झंखाड के अलावा यहां कुछ भी नहीं है। यहां पहुंचने का कोई सीधा रास्ता तक नहीं है और जैसे तैसे पहुंच जाओ तो दिन दोपहर में भी भय महसूस होने लगे। लेकिन इससे बढकर महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि यहीं टैगोर ने विश्व भारती की परिकल्पना की थी और विद्यालय शुरू करने के लिये यहां चालीस एकड भूमि भी खरीद ली थी किंतु नियति को शायद यह मंजूर न था। समुद्र तट से 8200 फुट की ऊंचाई पर हिमालय की सुदीर्घ धवल श्रंखला के दर्शन कराने वाला यह स्थान वास्तव में आलौकिक है। यहां की शांति और दिव्य वातावरण रबींद्रनाथ की प्रकृति के अनुकूल थे। वे विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ थे और उनका मानना था कि विद्यार्थियों को गुरूकुल पद्घति में प्रकृति के सानिध्य मेें शिक्षित किया जाना चाहिए। उनकी कल्पना विश्व-भारती विश्वविद्यालय के मोटो में प्रतिबिंबित होती है, “यत्र विश्वम भवत्येक निडम“ अर्थात जहां संपूर्ण विश्व एक घोंसले में बस जाए। यह हैरत की बात है कि भारत को साहित्य में प्रथम नोबल दिलाने, भारत सहित बांगलादेश के राष्ट्रगीत ”आमार सोनार बांगला” के रचयिता और भारत के सर्वश्रेष्ठ 12 मेें से एक विश्वविद्यालय विश्व-भारती की स्थापना करने वाले रबींद्रनाथ ने स्वयं कोई औपचारिक विद्यालयी शिक्षा ग्रहण नहीं की थी। उनकी शिक्षा घर पर ही हुई उनके पिता देबेंद्रनाथ ने उन्हें शिक्षा के लिये इंग्लैंड भी भेजा किंतु वे शिक्षा पूरी कर पाने में सफल नहीं रहे। किंतु यही उनकी प्रकृति थी जिसे उन्होंने आजीवन जीया, निभाया ओर इसी से अपने क्षेत्र में अतुल्य व सर्वश्रेष्ठ कार्य कर दिखाया।


रबींद्रनाथ सबसे पहले 1903 में रामगढ आए यहां वे कुथीबादी आफ सुरूल, स्नोव्यू गार्डन नाम के स्थान पर रहे उन्होंने इसका नामकरण हिमांती किया। उन्होंने इसी शीर्षक से एक कहानी भी लिखी जो हिमालय की भव्यता का वर्णन करती है। आज यह स्थान टैगोर टॉप नाम से जाना जाता है। 1903 में टैगोर अनेक समस्याओं से घिरे थे। एक वर्ष पूर्व 1902 में उनकी पत्नी मृणालिनी का निधन हुआ था उनके पुत्र समीन्द्रनाथ और बडी पुत्री 12 वर्षीय रेणुका का स्वास्थ्य खराब रहता था। रेणुका को टीबी ने आ घेरा था और वे उसके स्वास्थ्य के लिये ही उसे लेकर इस चीड बाहुल्य पर्वंतीय क्षेत्र में आए थे। यहां वे इन बच्चों के पिता के साथ ही मां की भूमिका में थे। इसी दौरान अपने बच्चों के जीवन से प्रेरित मातृविहीन बच्चों की व्यथा पर उन्होंने शिशु शीर्षक से कविताओं की श्रंखला लिखी जो अत्यंत सराही गई।


बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर उनके सभी प्रयास विफल रहे और वे वापस कलकत्ता लौट गए जहां 1903 में ही सितंबर में रेणुका और बाद में 1907 में पुत्र समी का भी देहांत हो गया। इसी दौरान उनके मन में विश्व-भारती की परिकल्पना जगी लेकिन पारिवारिक समस्याओं के कारण व स्थाई रूप से यहां बस नहीं सके। वरना विश्व-भारती विश्वविद्यालय रामगढ में ही बना होता। हालांकि विश्व भारती को ध्यान में रखते हुए उन्होंने यहां भूमि खरीदी भी किंतु बाद में नोबल पुरस्कार से मिली राशि से उन्होंने इसकी स्थापना 1921 में शांति निकेतन में की। 1914 में वे पुनः यहां आए तब वे रामगढ कस्बे में भी रहे जहां आज नीमराणा रिजोर्ट है। कुमाऊं मूल की प्रसिद्ध लेखिका गौरा पंत, शिवानी और उनके परिजन शांतिनिकेतन में ही शिक्षित हुए। बाद में 1937 में अल्मोडा आगमन पर टैगोर का उनके आवास में आना जाना रहा। शिवानी की पुत्री प्रसिद्घ लेखिका व पत्रकार मृणाल पांडे और ईरा पांडे के लेखन और स्वभाव में भी सदैव शांति निकेतन और बंगाल की मिठास और छाप रही। 1927 और 1937 में भी टैगोर अल्पकाल के लियो रामगढ आऐ थे। पूर्व में रबींद्रनाथ से प्रेरित होकर प्रसिद्ध कवियत्री महादेवी वर्मा ने भी रामगढ में आवास बनाया जो आज महादेवी संग्रहालय में तब्दील हो गया है। टैगोर की प्रेरणा से रामधारी सिंह दिनकर, सच्चिदानंद हृदयानंद वात्स्थायन अज्ञेय भी यहां लंबे समय तक रहे। टैगोर और शेक्सपीयर में अद्भुत समानताऐं रहीं। दोनों अपने समय से बहुत आगे के व्यक्तित्व थे। दोनों ने ही लेखन की विविध विधाओं, कविता, कहानी, नाटक, निबंध, उपन्यास के क्षेत्र में विलक्षण लेखन किया। टैगोर ने 1916 में शेक्सपीयर पर बंगाली में एक कविता लिखी थी जो उन्हीं के लेख में पत्थर पर उत्कीर्ण कर शेक्सपीयर हाउस में रखी गई है जिसका भावार्थ था - “दूर समुद्र के किनारे जब तुम्हारा जन्म हुआ, हे विश्व कवि इंग्लैंड के क्षितिज ने तुम्हें अपने दिल के बहुत निकट पाया लेकिन तुम्हें पहचान मिली एक वैश्विक धरोहर के रूप में“।


यह बेहद दुखद है कि बंगाल से हजारों किमी दूर यहां रामगढ आकर और रहकर उन्होंने गीतांजलि के कुछ भाग सहित शिशु संग्रह की रचना की और विश्व-भारती की परिकल्पना की जो आज भारत के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में से एक है न केवल परिकल्पना बल्कि उसे यहां स्थापित करने के प्रयास भी शुरू किये,  आज वह स्थान बेहद उपेक्षित है। न सरकार ने न ही स्थानीय नागरिकों या संस्थाओं ने कभी इसे विकसित करने का प्रयत्न किया, वरना न सही विश्व भारती यह विश्व पर्यटन का एक बेहतरीन केंद्र तो हो ही सकता था जैसा कि आज वारविक शायर इंग्लैंड का शेक्सपीयर हाउस है।

 

यह एक प्रसन्नता और राहत की बात जरूर है कि गुरूदेव की मृत्यु के 75 वर्ष बाद ही सही बीते वर्ष एक क्षेत्रीय संस्था हिमालयन रिसर्च एंड डवलपमेंट सोसाइटी (हर्डस) ने इस स्थान को वांछित सम्मान तथा महत्व दिलाने का बीडा उठाया और पहली बार यहां उनकी जयंती के अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रम व गोष्ठियों आदि का आयोजन हुआ। संस्था के प्रयासों से रामगढ से टैगोर टॉप तक तीन किलोमीटर सीसी मार्ग का निर्माण चल रहा है। संस्था का दावा है कि वह इस स्थल को विकसित करने, यहां संग्रहालय बनाने तथा पर्यटन से जोडकर यहां व अल्मोडा के बीच टैगोर सर्किट बनाने का प्रयास करेगी। 
 

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Ramgarh (Uttarakhand), India