‘गुरुदेव’ रबीन्द्रनाथ टैगोर की 1903में प्रथम रामगढ (उत्तराखंड) यात्रा से जुडे ऐतिहासिक तथ्य

प्रो0 अतुल जोशी

उत्तराखण्ड के विविध जनपदों में प्रमुख जनपद ‘नैनीताल’, राज्य का भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं आर्थिक सहित उपर्युक्त वर्णित आधारों को स्वयं समाहित करता हुआ इस पर्वतीय राज्य का सही अर्थों में आदर्श प्रतिनिधित्व करता है। इसी कारण प्रागेतिहासिक आधारों पर आदिगुरू शंकराचार्य से लेकर चीनी यात्री ह्वेनसांग,  महर्षि अरविन्द,  नारायण स्वामी,  स्वामी विवेकानंद,  बाबा नीम करोली,  बाबा हेड़ा खान,  महात्मा गांधी, जिम कॉर्बेट, आधुनिक मीरा महादेवी वर्मा, आचार्य नरेन्द्र देव आदि ने मानव जाती के कल्याण हेतु स्वयं द्वारा निर्धारित उद्देश्यों को पूर्ण करने के लिए जनपद नैनीताल को अपनी कर्मभूमि तथा यात्रा मार्ग बनाया।

इसी क्रम में विश्व में मानवता के कल्याण के लिए अपनी जिम्मेदारी तथा मानकों के स्वयं निर्धारक, एशिया में साहित्य के लिए प्रथम नोबेल पुरस्कार से अलंकृत तथा भारत सहित बांगलादेश के राष्ट्रीय गान के रचेयता गुरूदेव रबिन्द्र नाथ टैगोर द्वारा कुल तीन बार वर्ष 1903, 1914 एवं 1937 में रामगढ़ (नैनीताल) की यात्रा की गयी। गुरुदेव की वर्ष 1903 में प्रथम रामगढ़ यात्रा का न केवल उत्तराखंड वरन विश्व भर के साहित्य प्रेमियों के लिए विशेष ऐतिहासिक महत्व है।

इस यात्रा में जहाँ एक और गुरुदेव अपनी क्षय रोग से पीड़ित पुत्री रेणुका के स्वास्थ्य लाभ हेतु रामगढ़ आये थे वहीं दूसरी और उन्होने इस दौरान अपने कालजयी ग्रन्थ ‘गीतांजलि’ सहित अनेक काव्यों की रचना भी कर डाली। यही नहीं, इसी यात्रा में उनके द्वारा रामगढ़, उत्तराखंड में ही भारत के आधुनिक एवं पारंपरिक शिक्षा के विश्व-विख्यात केंद्र ‘विस्वा-भारती’ (शान्तिनिकेतन) की स्थापना का स्वप्न भी संजोया गया। परन्तु आज तक गुरुदेव की 1903 की इस रामगढ (उत्तराखंड) यात्रा में उनके द्वारा किये गए ऐतिहासिक कार्य और संजोये गए सपनों से सम्बंधित तथ्यपरक जानकारी बुद्धिजीवियों, विचारकों, पाठकों तथा समाज के सम्मुख प्रस्तुत नहीं हो सकी। इसी कारण रामगढ़ (उत्तराखंड) को साहित्य सृजन की भूमि के रूप में वह स्थान प्राप्त नहीं हो सका जिसका वह वास्तव में अधिकारी है।

दिसम्बर, 1883 में बाईस वर्षीय रबींद्रनाथ का विवाह ग्यारह वर्षीय ‘भबतरिणी’ (पूर्व नाम) से हुआ था जिनका बाद में काव्य नाम ‘मृणालिनी’ कर दिया गया। एक सुखद पारिवारिक समझ और सोहार्द के साथ गुरुदेव और उनकी पत्नी मृणालिनी देवी की पांच संताने हुई परन्तु विधाता ने गुरुदेव का दीर्घ दाम्पत्य जीवन तय नहीं किया था और 1902 में तीस वर्ष की अल्प आयु में ही उनकी पत्नी मृणालिनी देवी का निधन हो गया। गुरुदेव पर आई इस असमय विपत्ति का परिणाम यह रहा कि इसके बाद उनके द्वारा रचित कविताओं में गहरे दुःख का भाव व्यक्त होने लगा जिसका आभास उनकी कविता ‘स्मरण’ से होता है जोकि गीतांजलि के अंग्रेजी संकलन में सम्मिलित है।

पत्नी मृणालिनी के निधन के बाद गुरूदेव को अपनी क्षय रोग से ग्रस्त पुत्री रेनुका के पिता के साथ ही उसकी माँ की भूमिका का भी निर्वहन करना पड़ रहा था। गुरूदेव को प्राकृतिक एवं आर्युवेदिक चिकित्सा पद्धतियों का भी अच्छा ज्ञान था। इसी कारण उन्होने कोलकाता से काठगोदाम तक सुविधाजनक सीधी रेल-यात्रा का उपयोग कर सन् 1903 में अपनी बीमार बेटी के स्वास्थ्य लाभ हेतु हिमालय की वादियों मे चीड़ आच्छादित वनों के बीच रामगढ़ आने का निर्णय किया। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है की क्षय रोग से पीड़ितों के लिए लाभकारी शुद्ध प्राणवायु प्रवाहित करने वाले इसी स्थल (रामगढ़) के निकट (लगभग 10 कि.मी.) ही भवाली (नैनीताल) में 1912 में क्षय-आश्रम की स्थापना हुई जिसकी पहचान देश के समस्त क्षेत्रों के क्षय रोगियों को नया जीवन देने के एक महत्वपूर्ण क्षय-आश्रम के रूप में बनी। रामगढ़ के वृद्ध स्थानीय नागरिक बताते हैं कि लोग गुरुदेव को ‘कलकतिया डाक्टर’ भी कहते थे और उनके पास उपचार हेतु परामर्श लेने जाते थे ।

कठिनाइयों को अवसर में बदल लेना महान लोगों की फितरत होती है। गुरुदेव ने भी इस लोकोक्ति को सिद्ध किया था। पत्नी के अल्प आयु में निधन, व्यवसाय में लगातार हानि तथा अपनी बीमार पुत्री के इलाज़ की समस्या को लेकर जब गुरुदेव भटक रहे थे तो उसी समय उनके रामगढ़ में प्रवासित स्विट्ज़रलैंड के मित्र डेनियल के पास जाकर रहना उनके जीवन की एक ऐसी महत्वपूर्ण घटना सिद्ध हुई जिसने उन्हे एशिया में साहित्य सृजन के लिए प्रथम नोबेल पुरूस्कार से सम्मानित होने का अवसर दिला दिया। 

दरअसल, वर्ष 1903 में ग्रीष्म ऋतू के प्रारम्भ होने पर 42 साल की उम्र में गुरूदेव अपनी 12 वर्षीय पुत्री रेनुका, जो कि क्षय रोग से ग्रस्त थी, के स्वास्थ्य लाभ हेतु अपने छोटे पुत्र समीन्द्रनाथ टैगोर के साथ काठगोदाम से पैदल चलकर भीमताल, भवाली, श्यामखेत तथा महेशखान के जंगल होते हुए अपने मित्र स्विट्ज़रलैंड निवासी डेनियल के अतिथि बनकर रामगढ़ (उत्तराखंड) आये थे। यहाँ वह उनके आवास जिसे ‘शीशमहल’ के नाम से जाना जाता है और वर्तमान में खँडहर का रूप ले चुका है, में रहे। कृष्ण दत्ता और एंड्रयू रॉबिन्सन, अपने द्वारा लिखी गयी गुरुदेव  की जीवनी “रवींद्रनाथ टैगोर - द माइरीड माइंडेड मैन” में यह दावा करते हैं कि गुरुदेव की महेश खान की यात्रा लंबी और कठिन थी, कवि कभी-कभी अपनी बीमार बेटी को अपनी बाहों में लेते थे तथा उसका मनोरंजन करते रहते थे”। नैनीताल के इतिहासकार अनंत जोशी ने अपने दादा को महेश खान में टैगोर की दास्तां सुनाते हुए याद किया कि कैसे गुरुदेव अपने रामगढ आवास के बाहर कुर्सियां लगाये रात में सितारों को देखने के लिए बैठते थे। वह खगोलीय प्रवचनों के साथ तारामंडल दिखाते हुए रेणुका की देखभाल करते थे तथा प्रायः स्पष्ट पहाड़ी वातावरण में गीत गुनगुनाते हुए अद्भुत रूप से चमकते सितारों को निहारते भी थे। रेणुका अपने बिस्तर पर लेटकर, चोटियों में झिलमिलाते हुए नक्षत्रों को देख सकती थी”। यहाँ के अद्भुत सौन्दर्य से प्रभावित गुरुदेव स्वयं लिखते हैं कि “चारों और की पहाड़ियां मुझे एक शान्ति और धूप के साथ उभरते हुए पन्ना-पोत की तरह लगती है। एकांत एक फूल की तरह है जो अपनी सुन्दरता की पंखुड़ियों को फैलाता है और अपने ज्ञान के मूल या उसके दिल में शहद रखता है”।

रामगढ़ प्रवास के दौरान गुरुदेव अपने मित्र डेनियल के घर से लगभग दो किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थित चोटी, जिसके चारों ओर प्राकृतिक सौंदर्य की छटा देखते ही बनती थी, जहाँ से उत्तर दिशा में धवल तुषाराच्छादित हिमगिरि,  दक्षिण में सघन बांज व खन्स्युं का वन और सुदूर तराई का दृश्य मन को आल्हादित करने वाला था। दोनो ओर सेब से लदे विशाल व उन्नत बगीचे थे, जहाँ पर गुरुदेव साहित्य सृजन करते थे। गुरुदेव के जीवन का यही वो महत्त्वपूर्ण काल-क्रम था जब उन्होने रामगढ़ को अपने कालजयी ग्रन्थ ‘गीतांजलि’ के लेखन की कर्मभूमि बनाया।

गुरुदेव केवल साहित्यकार, कवि और कलाकार ही नहीं थे वह सच्चे अर्थों में प्रकृति प्रेमी और पर्यावरण के प्रति समर्पित व्यक्ति थे। उनकी पर्यावरण संरक्षण के प्रति सोच की एक झलक पर्मियन काल, के पूर्वार्ध में पैदा हुई चीन मूल की एवं वर्तमान में विश्व में विलुप्त प्रायः पादप प्रजाति एवं एकमात्र जीवित जीवाश्म “गिंगो बाईलोवा” नामक उस वृक्ष से झलकती है जो उनके मित्र डेनियल के आवास ‘शीशमहल’ के ठीक सामने अपनी यौवनवस्था में पहुँच चुका है। इस सम्बन्ध में पर्यावरणविद डॉ. एस. डी. तिवारी बताते हैं की गुरुदेव ने ‘शीशमहल’ स्थित अपने आवास के समीप एक ‘अनावृत जीवी’ कुल के वृक्ष का रोपण किया था। यह एतिहासिक वृक्ष आज भी विद्यमान है, जिसकी आयु लगभग १०० वर्ष से भी अधिक प्रतीत होती है। वैज्ञानिक दृष्टि से यह एक जीवित जीवाश्म का उदहारण है। वर्ष 2018 में अपनी रामगढ़ यात्रा पर आये डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ इस वृक्ष की आयु तथा महत्व का वनस्पतिक अध्ययन करने के लिए उसकी पत्तियों एवं शाखाओं को वन अनुसन्धान केंद्र, देहरादून भी ले गये थे। उल्लेखनीय है की रामगढ और कुमायूं के वन क्षेत्रों में “गिंगो बाईलोवा” नामक वृक्ष की प्रजाति नहीं पायी जाती है अतः इस वृक्ष का रामगढ़ में होना मात्र संयोग न होकर प्रकृति प्रेमी गुरुदेव की उपस्थिति का एक और ठोस प्रमाण हैं।

पत्रकार एवं लेखक शांतनु गुहा रॉय का अपने लेख में उल्लेखित वह कथन महत्वपूर्ण है जिसमे फैंटम क्रॉनिकल (वंशानुक्रम) द्वारा सौंपी गई कहानियों में कहा गया है कि गुरुदेव ने गीतांजलि में संकलित काव्यों यथा नैवेद्य, शिशु एवं खेया के लेखन से सम्बंधित एक-चौथाई कार्य अपने रामगढ स्तिथ टैगोर टॉप आवास में ही पूर्ण कर लिया था, जिसने एक दशक बाद १९१३ में गुरुदेव को नोबेल पुरस्कार से अलंकृत होने में मदद की और इस पर हैरानी भी व्यक्त की कि गुरुदेव ने यह काम अपनी बीमार बेटी के साथ रहते हुए संपन्न किया। शांतनु गुहा रॉय अपने लेख में महेश खान के वन विश्राम गृह के कार्यवाहक प्रकाश सिंह को उद्दृत करते हुए लिखते हैं कि, भारत के सबसे प्रसिद्ध कवि गुरुदेव ने अपने गानों के लेखन हेतु जिन लेखनियों का प्रयोग किया तथा जिस महोगनी लकड़ी की कुर्सी पर बैठकर बीमार रेणुका सितारों को निहारती थी वह सब जंगल में घूमने वाले स्थानीयों द्वारा चुरा लिया गया अथवा नष्ट कर दिया गया है। यूनाइटेड न्यूज़ ऑफ़ इंडिया, द टाइम्स ऑफ़ इंडिया एवं डेली पायनियर की पत्रकार जसकिरन चोपड़ा भी “डेली पायनियर” के २०१३ में अपने प्रकाशित लेख “रीमेमबेरिंग टैगोर’स डीप टाइस विथ कुमायूं” में कहती हैं की “गुरुदेव ने 1903 में कुमाऊँ में रहते हुए ‘गीतांजलि’ के छंद लिखे थे और यहीं पर उनके मन में सबसे पहले ‘विश्व भारती’ का विचार आया”।

‘गीतांजलि’ टैगोर की सबसे प्रसिद्ध रचना है जो नवंबर 1912 में महान अंग्रेजी कवि डब्ल्यू बी येट की प्रस्तावना के साथ इंग्लैंड में प्रकाशित हुई थी जिसमे वह कहते हैं कि “गुरुदेव अपनी पत्नी, उनके पिता की और दो बच्चों की असमय मृत्यु के कारण 1901-1910 की अवधि के बीच भावनात्मक संकट में थे”। गुरुदेव ने शांति की खोज के लिए ही ‘गीतांजलि’ का लेखन प्रारंभ किया जिसका केंद्रीय विषय दिव्य विचार आत्म शुद्धि और मानवता की सेवा हैl यह गुरुदेव को हिमालय की अभिप्रेरणा ही थी जिस कारण उन्होने इस कालजयी ग्रन्थ की रचना के लिए प्राकृतिक सौंदर्य से आच्छादित हिमालय की रामगढ़ (उत्तराखंड) की मनोरम चोटी को लेखन स्थली बनाया। 

दिल्ली विस्वविद्यालय के रामानुजम कॉलेज के छात्रों द्वारा डॉ. मधु बत्ता के संयोजन में वर्ष 2016-17 में “इम्पैक्ट ऑफ़ एनवायरनमेंट ऑन क्रिएटिव राइटर्स माइंड” अ स्टडी ऑफ़ रबीन्द्रनाथ टैगोर एंड महादेवी वर्मा विथ स्पेशल रेफरेंस टू रामगढ इन उत्तराखंड”  विषय पर किये गए लघु शोध में लिखा है कि “दार्शनिकों,  कवियों, लेखकों,  और संतों के साथ रामगढ़ के गहरे और प्राचीन संबंध रहे हैं। संवेदनशीलता और सादगी कवियों का मुख्य आभूषण होता है, जिसके कारण वह पहाड़ तथा उसके निवासियों के शांतिपूर्ण वातावरण के साथ स्वयं को स्वतः जोड़ लेते हैं। प्रायः इसीलिए कहा जाता है कि जब हम प्रकृति के करीब होते हैं, तो हम अपनी कल्पना को और भी मजबूत बनाते हैं और आंतरिक विचारों और चेतना को उभारते हैं। हिमालय का यह स्थान (रामगढ़) किसी के दिल को शांत, और एकांत सोच से भर देता है एवं उत्कृष्ट और कलात्मक विचारों को जागृत करता है। कई लेखकों और विचारकों ने अपनी सोच को फिर से जीवंत करने के लिए रामगढ़ का दौरा किया। रचनात्मकता के पर्याय गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर और सामाजिक कार्यकर्ता नारायण स्वामी ने रामगढ़ को अपनी कर्मस्थली बनाया और आश्रम की स्थापना की। यह प्रमाणित है कि ‘गीतांजलि’ की रचनाएँ गुरुदेव के रामगढ़ प्रवास के दौरान रची गई थीं। गुरुदेव रामगढ़ के प्रशंसक  थे और इसी कारण इस स्थान पर आने के लिए वह सदैव समर्पित आगंतुक बने रहे जिसका उल्लेख गुरुदेव ने अपने फुर्सत के पलों में वर्ष 1937 में शान्तिनिकेतन से कृषि वैज्ञानिक प्रो. बो.सी. सेन को लिखे पत्र में यह पछतावा जाहिर कर किया था कि “उन्हे कुछ और वक़्त पहाड़ की वादियों के बीच गुजारना चाहिए था। इस तथ्य का उल्लेख प्रो. सेन की पत्रकार पत्नी जी. इमरसन ने अपने लेख में भी किया।  टैगोर का प्रकृति के प्रति लगाव एवं झुकाव उनके द्वारा लिखे हुए लेखों और कविताओं में स्पष्ट झलकता है। इसका वास्तविक आभास कतिपय उन्हे रामगढ़ में ही हुआ होगा क्योंकि वहां रचित अपने काव्य एवं अन्य साहित्य संग्रह में प्रकृति के साथ उनका गहरा जुड़ाव प्रदर्शित होता हैं।

अपनी इस रामगढ़ यात्रा के दौरान गुरुदेव अपनी पुत्री रेणुका को लेकर रामगढ़ क्वारब होते हुए उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी के नाम से विख्यात अल्मोड़ा भी गए और वहां भी प्रवास किया। इसी बीच अपनी बीमार पुत्री रेणुका की देखभाल करने की जिममेदारी अपने साले (पत्नी का भाई) नागेन्द्रनाथ पर छोड़कर गुरुदेव पुनः रामगढ़ आते-जाते रहे। वर्ष 1903 में गुरुदेव के कुमायूं के अल्मोड़ा और रामगढ प्रवास के दौरान उनके सहयोगी मोहितचन्द्र सेन भी उनसे मिलने आये थे। मोहितचन्द्र सेन जब शान्तिनिकेतन वापस चले गए थे तो उन्होने गुरुदेव के काव्य संकलन ‘शिशु’ के प्रकाशन हेतु गुरुदेव के साथ पत्राचार किया था। पत्राचार में यह उल्लेखित है कि गुरुदेव ने मोहितचन्द्र सेन को इस दौरान ‘शिशु’ संकलन के लिए कुल 14 काव्य रचनाएं भेजी थी जोकि गुरुदेव की सृजन एवं संकल्प शक्ति का अदभुत उदाहरण है और उन्हे एक विशेष स्थान पर सुशोभित करता है।

हिमालय के समान ही दृढ संकल्पित एवं अडिग गुरूदेव का ही व्यक्तित्व था कि इतनी विपदाओं एवं कठिनाइयो के बावजुद भी वह कभी डिगते हुए नही दिखे उल्टे अपने लिए बडे लक्ष्य निधार्रित करते और पाते हुए दिखाई दिए। इसका सबसे बड़ा प्रमाण इसी दौरान उनके द्वारा रामगढ़ में अभागे मातृविहीन बच्चों को समर्पित काव्य रचना ‘शीशु’  तथा महाकाव्य ‘गीतांजली’ की रचना करना रहा। पत्रकार एवं लेखक शांतनु गुहा रॉय ने अपने लेख “होम वेयर रबीन्द्रनाथ टैगोर रोट पार्ट्स ऑफ़ ‘गीतांजलि’ इस नाऊ इन रुइंस” में गुरुदेव के इसी प्रवास के दौरान अपने बच्चों के जीवन से प्रेरित मातृविहीन बच्चों की व्यथा पर ‘शिशु’ शीर्षक से कविताओं की श्रंखला तथा ‘क्रिसेंट मून’ की रचना के साथ ही महाकाव्य गीतांजलि के लेखन कार्य का उल्लेख किया है।

उनके कुमायूं क्षेत्र में इस आवागमन का वृतांत भारत के पूर्व राष्ट्रपति एवं शिक्षाविद् डॉ० एस0 राधाकृष्णन ने वर्ष 1961 में प्रकाशित अपनी पुस्तक रबीन्द्रनाथ टैगोर: अ सेंटेनरी, वॉल्यूम 1861-1961” में गुरूदेव के पुत्र रतींद्रनाथ से हुई बातचीज का हवाला देते हुए किया है कि “जब गुरूदेव अपनी पुत्री रानी (रेनुका) को उसके इलाज के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा रहे थे तो एक बार यातायात के साधनों के अभाव के कारण उन्हें रामगढ़ (अल्मोड़ा) से काठगोदाम तक की 40 मील की दूरी पैदल तय करनी पड़ी।” जिस पुत्री के स्वास्थ्यवर्धन की दृष्टि से गुरूदेव रामगढ़ आये, उसकी सितंबर 1903 में मृत्यु हो गयी।

समाचार पत्र ‘नयी दुनिया’ के पत्रकार प्रमोद पाण्डे 2014 में प्रकाशित “गीतांजलि की ताकत थी रामगढ़ की शांति” शीर्षक लेख में लिखते हैं कि “पत्नी मृणालिनी की 1902  में मौत के बाद गुरुदेव अपनी बीमार बेटी रेनुका व बेटे समींद्रनाथ को लेकर 1903 की गर्मियों की शुरुआत में कोलकाता से नैनीताल आए तो काफी दिन यहां रुके। यहां रामगढ़ की शांत पहाड़ियों पर हिमालय का दर्शन करते हुए उन्होंने यहां जो रचा, बाद में साहित्य जगत ने उसे ‘गीतांजलि’ नाम से जाना। इन कविताओं की ही यह ताकत थी कि दुनिया की श्रेष्ठतम रचनाओं को नोबेल पुरस्कार देने की 1901 से शुरू हुई श्रृंखला के तेरहवें वर्ष में ही गुरुदेव को यह गौरव हासिल हो गया था। बेटी रेनुका व बेटे समींद्रनाथ की मौत (1907) के बाद गुरुदेव ने अपने साहित्य में यह तथ्य उजागर किया है कि कलेजे पर पड़े इस कुठाराघात को सहन करने की ताकत उन्हें कुमाऊं की आध्यात्मिक शांति व अलौकिक ऊर्जा से ही मिली। वह रामगढ़ से इतना अधिक प्रभावित थे कि यहां आश्रम की स्थापना भी करना चाहते थे। भारत और पश्चिमी परंपराओं के सर्वश्रेष्ठ को मिलाकर विश्र्वभारती विश्र्वविद्यालय बनाने का विचार भी उन्हें यहीं सूझा था”।

रामगढ में गुरुदेव के स्वपन के सम्बन्ध में कुमाऊॅं विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष प्रो गिरीश रंजन तिवारी ने ‘तो विश्व-भारती विश्वविद्यालय रामगढ़ में होता’ विषयक अपने एक लेख में लिखा है कि टैगोर विद्यालयी शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ थे और उनका मानना था कि विद्यार्थियों को गुरूकुल पद्धति में प्रकृति के सानिध्य में शिक्षित किया जाना चाहिए। उनकी कल्पना विश्व-भारती विश्वविद्यालय के मोटो में प्रतिबिंबित होती है, “यत्र विश्वम भवत्येक निडम” अर्थात जहां सम्पूर्ण विश्व एक घोंसले में बस जाए। प्रो0 तिवारी आगे लिखते हैं कि उन्ही की प्रेरणा से कवियत्री महादेवी वर्मा ने जहाँ रामगढ़ में आवास (मीरा कुटीर) बनवाया वहीं रामधारी सिंह दिनकर तथा सच्चिदानंद हृदयानंद वात्स्थायन अज्ञेय भी यहाँ लंबे समय तक रहे।

छायावाद की लोकप्रिय कवयित्री महादेवी वर्मा रामगढ़ में गुरूदेव की मौजुदगी को याद करते हुए लिखती हैं कि ‘हिमालय के प्रति मेरी आसक्ति जन्मजात है। उसके पर्वतीय अंचलों में मौन हिमानी और मुखर निर्झरों, निर्जन वन और कलरव-भरे आकाश वाला रामगढ़ मुझे विशेष रूप् से आकर्षित करता रहा है। वहीं नन्दा देवी, त्रिशूल आदि हिम देवताओं के सामने निरन्तर प्रणाम से समाधिस्थ जैसे एक पर्वत शिखर के ढाल पर कई एकड़ भूमि के साथ एक छोटा-सा बंगला कवीन्द्र का था जो दूर से उस हरीतिमा में पीले केसर के फूल जैसा दिखाई देता था। उसमें किसी समय वे अपनी रोगिणी पुत्री के साथ रहे थे और संभवतः वहां उन्होने शान्ति-निकेतन जैसी संस्था की स्थापना का स्वप्न भी देखा था”।

गुरुदेव की रामगढ़ यात्रा का सम्बन्ध जोडते हुए उनकी 150वीं जन्म शताब्दि के अवसर पर दिनांक 8 मई 2012  को भारतीय संसद के उच्च सदन, राज्यसभा में चर्चा के दौरान पत्रकार एवं सांसद चंदन मित्रा ने गुरूदेव को श्रृद्धांजलि देते हुए कहा था कि गुरूदेव आध्यात्म की दृष्टि से आधुनिक भारत के वास्तुकार थे, उन्होने रामगढ़,  ईरान में शिराज और बाली (इंडोनेशिया) की यात्रा की और रामगढ़ (उत्तराखंड) में उन्होने गीतांजलि के एक बड़े भाग की रचना की।

गुरूदेव रबिन्द्र नाथ टैगोर की ऐतिहासिक बाली (इंडोनेशिया) की यात्रा की 90वीं वर्षगाँठ के अवसर पर 2017 में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठि में डॉ० रमेश पोखरियाल निशंक केन्द्रीय मंत्री, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार ने अपने उद्बोधन में कहा था कि गुरूदेव को महाकाव्य गीतांजलि की रचना करने की प्रेरणा शांत, एकांत, नैसर्गिक सौन्दर्य से परिपूर्ण देवभूमि, उत्तराखंड स्थित रामगढ़ में ही मिली थी। इस प्रकार गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की वर्ष 1903 में रामगढ़ उत्तराखंड की ऐतिहासिक यात्रा से सम्बंधित विविध आयामों की विवेचना के आधार पर अनेक महत्वपूर्ण तथ्य प्रकाश में आते हैं जो संक्षेप में विद्वानों के समक्ष समालोचना हेतु निम्नवत प्रस्तुत है- 

गुरुदेव की रामगढ़ (उत्तराखंड) यात्रा का प्रमुख कारण उनकी बेटी रेणुका का स्वास्थय था जिस कारण वह वर्ष 1903 के ग्रीष्मकाल (अप्रैल) के प्रारंभ से अगस्त माह तक रामगढ़ में रहे। इस अवधि में गुरुदेव अपनी पुत्री के साथ अपने स्विट्ज़रलैंड निवासी मित्र डेनियल के रामगढ़ स्थित आवास ‘शीशमहल’ में रहे तथा उन्होने पुत्री की देखभाल के साथ साथ साहित्य सृजन भी किया जिसमे ‘शिशु’ कविता के लेखन के साथ ही कालजयी महाकाव्य ‘गीतांजलि’ का संकलन प्रमुख था। गुरुदेव का लेखन कार्य प्रायः ‘शीशमहल’ से लगभग दो किलोमीटर ऊपर स्थित चोटी, जिसे वर्तमान में ‘टैगोर टॉप’ के नाम से जाना जाता है, में होता था। इस स्थल को गुरुदेव अपने ‘बोलपुर, बंगाल’ स्थित आश्रम ‘शान्तिनिकेतन’ के रूप में विकसित करना चाहते थे, जिसकी इच्छा उन्होने अपने मित्र डेनियल से भी जाहिर की थी परन्तु, इस यात्रा में पुत्री के स्वास्थ्य व् आर्थिक कठिनाइयों के कारण उनका यह सपना पूरा न हो सका। 1914 में नोबेल पुरूस्कार प्राप्ति के पश्चात गुरुदेव जब दूसरी बार रामगढ आये तो उन्होने इसी स्थल पर आवास क्रय किया जिसके खँडहर रुपी अवशेष ‘टैगोर टॉप’ रामगढ़ में आज भी देखे जा सकते हैं। अपने इस रामगढ़ प्रवास के दौरान गुरुदेव उत्तराखंड की ‘साहित्यिक नगरी’ अल्मोड़ा भी आते-जाते रहे।   

आज भी देश और दुनिया में फैले गुरुदेव के अनुयायियों द्वारा टैगोर टॉप, स्थित रामगढ़ में उनकी विरासत से साक्षात्कार करने हेतु प्रतिवर्ष हजारों की संख्या में की जानी वाली यात्रा हमारे निष्कर्ष को और भी सार्थक बनाती है, जिनमे आधुनिक मीरा महादेवी वर्मा, डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, श्री भगत सिंह कोश्यारी, स्वर्गीय प्रकाश पन्त, डॉ. बी.बी. दत्ता, प्रो. स्वप्न कुमार दत्ता, पूर्व विदेश सचिव श्री शशांक, प्रनोती, ज्योतिर्मय गोस्वामी जैसे साहित्यकार एवं शिक्षाविद सम्मिलित हैं। विगत छह वर्षों में स्थानीय नागरिकों के सहयोग से ‘हिमालयन एजुकेशनल रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसाइटी’ तथा ‘शान्तिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालय’ के सहयोग से प्रतिवर्ष गुरुदेव का ‘जन्मोत्सव’ आयोजित किया जा रहा है तथा राज्य सरकार द्वारा एक करोड़ बीस लाख की लागत से रामगढ़ से ‘टैगोर टॉप’ तक लगभग तीन किलोमीटर सी.सी. समपर्क मार्ग का निर्माण कार्य पूर्ण हो चुका है। 

संभवतः गुरुदेव रबीन्द्रनाथ एक सदी पूर्व इस बात को महसूस कर चुके होंगे कि विश्व में संचार क्रांति और वैज्ञानिक विकास के परिणामस्वरूप भौगोलिक दूरी तो नहीं रहेगी लेकिन मानवीय संवेदनाओं के अभाव में मन की परस्पर दूरी बढती जायेगी। इस दूरी को पाटने के लिए उन्होने आध्यात्मिक स्वतन्त्रता को आवश्यक बताते हुए कहा कि इसका एहसास प्रकृति की गोद में ही संभव है जहाँ नेसेर्गिक सौंदर्य हो, शांत और सुमुधुर संगीत हो और पक्षियों का कलरव कुसुमालयों को पल्लवित और पुष्पित करने के लिए आध्यात्मिक गान करता हुआ प्रतीत होता हो। अतः जहाँ से हिमालय के नयनाभिराम दृश्य मन को शीतलता प्रदान करते हो और गुरुदेव के प्रकृति और मानवीय संवेदना पर आधारित दर्शन, साहित्य, संगीत, कला को सुनने, समझने और देखने के लिए सर्वोपयुक्त प्राकृतिक वातावरण सुलभ होता हो वह स्थल टैगोर टॉप, रामगढ़, उत्तराखंड के अतिरिक्त दूसरा नहीं हो सकता।

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Ramgarh (Uttarakhand), India