स्पर्शगंगा अभियान : पारिस्थितिकीय संतुलन हेतु एक वैश्विक आवश्यकता 

प्रो० अतुल जोशी

भारत के बड़े भूभाग को एक सूत्र में पिरोने वाली गंगा अपने उद्गम क्षेत्र के निवासी उत्तर भारतीयों के लिए जितनी पूजनीय है, उससे भी अधिक वह देश के पूर्व, पश्चिम और दक्षिण राज्यों के निवासियों के लिए पूजनीय और पवित्र है। मान्यता है कि नभ, थल और पाताल में तीनों लोकों में प्रवाहित होने वाली महिमामयी माॅं गंगा का जल कभी दूषित व विषाणुयुक्त नहीं होता। देश के प्रत्येक हिस्से के लोग अपने धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक क्रियाकलापों में गंगा की आराधना को विशेष रूप से शामिल कर उसका आर्शिवाद प्राप्त कर कृतार्थ होते हैं। जन्म, मरण, मांगलिक कार्यों सहित साक्षी मानने व शपथ लेने जैसे भावनात्मक व्यवहार में भी ‘माॅं’ के नाम से स्वीकार्य गंगा नदी भारतवासियों की दैनिक जीवन शैली का एक आवश्यक अंग है। वेदों एवं पुराणों में बारंबार तीर्थमयी नाम से संबोधित तथा विदेशी साहित्य में भावमुक्त वर्णित गंगा के सम्बंध में भारतीयों के मानस पटल में यह स्वीकारोक्ति है कि गंगा नाम के उच्चारण मात्र से ही पापों का नाश हो जाता है, दर्शन करने से कल्याण होता है तथा स्नान-पान से सात पीढ़ियाॅं तक पवित्र हो जाती हैं।

 

भारतीय एकता के अखंड स्रोत के माहात्मय का वर्णन करते हुए ‘गीता’ में श्रीकृष्ण ने कहा है कि ‘स्त्र्रोतसामस्मि जाह्नवी’ अर्थात नदियों में, मैं जाह्नवी (गंगा) हूँ। इस प्रकार माॅं, देवी, जीवनदायिनी, पापनाशिनी, कल्याणी, मोक्षदायिनी, तारिणी अनेकोनेक अलंकरणों से पूजी एवं पहचाने जाने वाली गंगा नदी कोे विश्व में सैकड़ों-हजारों प्रवाहित होने वाली छोटी-बड़ी नदियों के समकक्ष सर्वोच्च स्थान प्राप्त है।

विश्व में जब भी कहीं पारिस्थितिकी संतलुन एवं पर्यावरण संरक्षण का संदर्भ आता है तो उसका अभिप्राय हिमालय के संरक्षण से भी होता है। गंगा को हिमालय की पुत्री के रूप में पूजा जाता है। अतः हिमालय एवं गंगा का अस्तित्व सह होने के साथ-साथ परस्पर पूरक भी है। चीन एवं नेपाल देशों से अन्तर्राष्ट्रीय सीमा निर्धारित करने वाली देवभूमि उत्तराखंड को प्रकृति का आर्शिवाद प्राप्त है कि जिसने उसे भारत के करोड़ों मानवीयों एवं जैव जगत को शुद्ध प्राणवायु प्रदान करने हेतु लगभग 70 प्रतिशत वन क्षेत्र, प्यास बुझाने तथा उदरपूर्ति के लिए गंगा-यमुना सहित सैकड़ों स्पर्श गंगाऐं, देश को सामरिक सुरक्षा प्रदान करने हेतु पर्वतराज हिमालय तथा विश्वभर को अपनेे ज्ञान एवं बौद्धिक चिन्तन एवं दर्शन से सींचने वाला समृद्ध मानव संसाधन उपहार स्वरूप प्रदान किया है। प्रकृति प्रदत्त इस जिम्मेदारी का समुचित अहसास करते हुए देवभूमि और उसके मानवीयों ने प्रागेतिहासिक काल से ही अनेकोनेक कठिनाईयों का सामना करते हुए मानव कल्याण के प्रति अपने दायित्वों का अनवरत पालन किया है। औैद्योगिक क्रान्ति तथा वैश्विक बाजारवाद के काल में मनुष्य की बढ़ती भौतिकवादी सोच ने उत्तराखंड ही नहीं वरन संपूर्ण हिमालय क्षेत्र के समक्ष जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिेंग, सिकुड़ते हिमनद, विलुप्त होती जैवीय एवं वानस्पतिक प्रजातियाॅं, सूखते प्राकृतिक जल स्रोत, वन दावाग्नि, भूकंप, भूस्खलन, बादल फटने, सूखा जैसी प्राकृतिक चुनौतियों का पहाड़ खड़ा कर दिया है। परिणामस्वरूप हिमालयवासियों के समक्ष जीवन और जीविका को सुचारू बनाने की समस्या उत्पन्न होने के साथ ही देश सहित एशिया के पारिस्थितिकी संतुलन को भी खतरा पैदा हो गया है। विगत कई दशकों से गंगा के संरक्षण एवं सफाई के नाम पर देश भर में विविध नामो से चलाये गए अभियानों में लाखो करोड़ रूपया बरबाद करने के बावजूद गंगा की दशा और दयनीयता में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, उल्टे और भी संकुचित और प्रदूषित होती चली गयी।  

देवभूमि के नाम से प्रसिद्ध हिमालयी राज्य उत्तराखंड के उत्तरकाशी जनपद में लगभग 4000 मीटर की ऊॅंचाई पर स्थित ‘गोमुख’ हिमनद से गंगा उद्गमित होती है। गंगोत्री (उत्तरकाशी) से 21 किलोमीटर दक्षिण में स्थित गोमुख हिमनद से यात्रा प्रारम्भ करने वाली तथा देश का सबसे बड़ा नदी तंत्र एवं जल संग्रहण क्षेत्र बनाने वाली गंगा (भागीरथी) अपने उद्गम स्थल पर तीव्र वेग से प्रवाहित एक छोटी सी जल धारा के रूप में ही प्रकट होती है। अलकनंदा नदी विष्णुप्रयाग से उद्गमित होकर चार प्रयागों (विष्णु, नन्द, कर्ण, रूद्र) में अनेको स्पर्श गंगाओं (प्राकृतिक जल धाराऐं) का जलधारण करते हुए, गौमुख से उद्गमित भागीरथी से मिलकर देवप्रयाग में माँ गंगा का रूप धारण करती है तथा हरिद्वार से मैदान पर उतर जाती है। आगे चलकर माॅं गंगा, भारत के 5 राज्यों ( उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल ) से गुजरते हुए स्वयं का सागर - ‘गंगा सागर’ बनाती है। इस पूरे यात्रा मार्ग में कोसी, रामगंगा, गंडक, घाघरा, गोमती, महानंदा, यमुना, सरस्वती (विलुप्त), ब्रह्मपुत्र आदि सैकडों स्पर्श गंगायें, गंगा को व्यापक स्वरुप प्रदान करती हैं। 

इस प्रकार गंगा देश की सभी छोटी बड़ी प्राकृतिक जल धाराओं, स्त्रोतों एवं स्पर्श गंगाओं की वह प्रतिनिधि है जो उनके समाहित हो जाने के बावजूद भी उन्हे गंगा का ही पावन स्वरुप प्रदान करती है। अपने 2071 किलोमीटर लम्बे यात्रा मार्ग पर गंगा नदी अनेकों क्षेत्रीय, सांस्कृतिक एवं धार्मिक विविधताओं को स्वयं में समाहित करती हुई भारत और बांग्लादेश देशों को सांस्कृतिक आधार पर तो एक करती ही है साथ ही स्वयं को विश्व में एक ऐसी नदी के रूप में विशिष्ट स्थान पर सुशोभित करती है जिसका अपना सागर ‘गंगा सागर’ है।

प्रश्न उठता है कि गौमुख में एक छोटी सी जल धारा के रूप में प्रकट होने वाली गंगा कैसे वैश्विक स्तर पर माँ, कल्याणी, जीवनदायिनी के सर्वोच्च शिखर पर विराजमान हो गयी? इसका एक मात्र आधार वह स्पर्श गंगायें ही हैं जिन्होने स्वयं को मानवता और विश्व कल्याण के लिए माँ गंगा में समाहित कर लिया और अपने अस्तित्व को ही तिलांजलि दे दी। उत्तराखंड के विष्णु प्रयाग, नंद प्रयाग, कर्ण प्रयाग, रूद्रप्रयाग तथा देव प्रयाग एवं प्रयागराज (इलाहाबाद) आदि सभी छोटे बड़े प्रयाग, गंगा को महानतम बनाने के साथ-साथ स्पर्श गंगाओं के अस्तित्व के समापन के साक्षी हैं। स्पष्ट है कि स्पर्श गंगाओं के अस्तित्व के बिना न तो गंगा इतनी व्यापक एवं महान हो सकती है और ना ही उसे माँ का स्थान मिल सकता है। अतः सर्वप्रथम हमें स्पर्श गंगा की अवधारणा को समझना आवश्यक है। नभ में हिमकण, ओस की बॅूंदे, वर्षा जल, थल में समुद्र, हिमनदों, नदियों, तालाबों, झरनों एवं प्रपातों आदि में प्रवाहित जल तथा पाताल में कुओं तथा नौलों के रूप में भूजल सभी स्पर्शगंगाओं के पोषक तत्व हैं जिनके लिए क्षेत्र विशेष की भौगोलिक सीमा का कोई महत्व नहीं होता। 

इस सम्बन्ध में देश विदेश के गंगा बचाओ आन्दोलन से जुडे पर्यावरणविदों एवं गंगा-रक्षकों का मत है कि जब तक स्पर्श गंगाओं को नहीं बचाया जाएगा तब तक गंगा का अस्तित्व खतरे में ही बना रहेगा। हिमालयी राज्य उत्तराखंड द्वारा देश-दुनिया के संपूर्ण जैव जगत के समक्ष पारिस्थितिकी संतुलन की चुनौतियों से निबटने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री माननीय डाॅ० रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की पर्यावरक्षण संरक्षण की अभिनव सोच एवं मार्गदर्शन में दिनांक 17 दिसम्बर 2009 से ‘स्पर्शगंगा अभियान’ की शुरूवात की गयी। ‘स्पर्श गंगा अभियान’, भारत के माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री डाॅ० रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ का माँ गंगा को समर्पित एक ऐसा दिव्य विचार अथवा तर्क है जो वैश्विक स्तर पर गंगा को जल की प्रतिनिधि मानते हुए उसके संरक्षण की प्रेरणा देता है। प्रारंभ में हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय के डाॅ० प्रभाकर बडोनी, कार्यक्रम समन्वयक, राष्ट्रीय सेवा योजना प्रकोष्ठ द्वारा इस अभियान को क्रियान्वित किया गया और बहुत कम समय में ही इस अभियान से पूरे उत्तराखंड का जनमानस जुड़ गया। पूरे प्रदेश भर के विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में स्पर्शगंगा प्रकोष्ठ तथा माध्यमिक विद्यालयों में स्पर्शगंगा क्लबों की स्थापना की गयी। प्रत्येक रविवार को विद्यार्थी सहित युवा अपने निकटवर्ती क्षेत्रों के प्राकृतिक जलस्रोतों, नदियों, तालाबों, कुओं, गधेरों, नौले आदि की सफाई करते, कूड़े का निस्तारण करते तथा एकत्रित पालीथिन को नगरपालिका, ग्रामसभा आदि के सुपुर्द कर उसे पुर्नप्रयोज्य बनाने की कार्यवाही करते थे। पूरे उत्तराखंड में हरिद्वार, देहरादून तथा कोटद्वार से श्री बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमनोत्री तथा काशीपुर, टनकपुर एवं हल्द्वानी से गैरसैण, कपकोट तथा धारचुला तक स्पर्श गंगा अभियान के स्वयंसेवक स्पर्शगंगाओं को संरक्षित एवं साफ रखने की मुहीम से जुड़ चुके थे। अतः प्रदेश सरकार ने वर्ष 2010 से 17 दिसम्बर को ‘स्पर्श गंगा दिवस’ के रूप में आयोजित करने का शासनादेश भी निर्गत कर दिया। कालान्तर में यह अभियान पारिस्थितिकी संतुलन के एक ऐसे जनआंदोलन का रूप लेता गया जिसे न केवल उत्तराखंड वरन देश-विदेश में भी खूब ख्याति प्राप्त हुई। 

बौद्ध धर्मगुरू दलाई लामा, पूर्व उप प्रधानमंत्री श्री लाल कृष्ण आडवाणी, पूर्व विदेश मंत्री स्व० सुषमा स्वराज, योगगुरू रामदेव, पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा, सांसद एवं अभिनेत्री हेमामालिनी, स्वामी अग्निवेश सहित अनेकानेक गणमान्य विभूतियों ने न केवल इस अभियान में शिरकत की वरन इसे पारिस्थितिकीय संतुलन के लिए एक अमोद्य अस्त्र भी बताया। फलस्वरूप यह अभियान जन एवं पर्यावरणीय संदर्भों से सरोकार रखने वाले प्रबुद्ध विद्धानों, दार्शनिकों, शिक्षकों, समाजसेवियों के लिए पर्यावरण की सेवा का पर्याय बन गया। आशा है कि भविष्य में स्पर्श गंगा अभियान अपनी अवधारणात्मक एवं वैचारिक शक्ति के बल पर पृथ्वी और उसकी पारिस्थितिकी की रक्षा करने हेतु देश-दुनिया के जनमानस का सबसे बड़ा मंच साबित होगा। 

लेखक पूर्व में कुमाऊॅं विश्वविद्यालय, नैनीताल में रा0से0यो0 प्रकोष्ठ के कार्यक्रम समन्वयक के पद पर कार्य कर चुके हैं। 

यह वेबसाइट  शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया द्वारा विकसित की है।

@ 2020 शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया सर्वाधिकार सुरक्षित।

  • Facebook - Black Circle
  • Twitter - Black Circle

Ramgarh (Uttarakhand), India