कुमाऊं में सुहागिन महिलाओं का पारम्परिक परिधान - रंग्वाली पिछौड़ा

मनोज कुमार पांडेय 

पर्वतीय क्षेत्रों में सुहागिन महिलाओं द्वारा मांगलिक अवसरों पर गहरे पीले रंग की सतह पर लाल रंग से बनी बूटेदार ओढ़नी पहनने का प्रचलन है। इस ओढ़नी को "रंगोली पिछौड़ा" या "रंग्वाली पिछौड़ा" कहते हैं। कुमाऊंनी संस्कृति में इस पिछौड़े को पहनना बहुत ही शुभ व मंगलमय माना जाता है। कुंवारी लड़कियां यह पिछौडा नहीं पहनती है लेकिन शादी के पवित्र बंधन में बंधने वक़्त फेरों से पहले वर पक्ष द्वारा अखंड सुख-सौभाग्य व सुखी जीवन के आशीर्वाद के साथ उसको यह भेंट किया जाता है। जिसको पहनकर वह अपने सात फेरे पूरे करती है और शादी के पवित्र बंधन में बंध जाती है। शादी के सातों वचन इसी पिछौड़े को पहनकर लिए जाते हैं। इसीलिए यह हर महिला के सुख-सौभाग्य से जुड़ा है। लड़की शादी के वक्त चाहे जितना भी महंगा लहंगा या साड़ी पहन ले, लेकिन कुमाऊंनी संस्कृति में जब तक इस पिछौड़े को नहीं पहना जाता है तब तक उसका श्रृंगार पूरा नहीं होता। शुभ काम में पिछौड़ा गणेश पूजा के दिन से पहना जाता है।

यह पिछौडा वास्तव में बहुत ही सुंदर और आकर्षक होता है। पारम्परिक रूप से रंगवाली पिछौड़ा हस्त-निर्मित होता है जिसे वानस्पतिक रंजकों से रंगा जाता है, तत्पश्चात उस पर बूटियां व अन्य आकृतियां हाथों से उकेरी जाती हैं। इसमें प्रयोग होने वाले हर रंग का व उन रंगों से बनने वाले हर डिजाइन का भी अपना विशेष महत्व है। 

लगभग 3 मीटर लंबा व सवा मीटर तक चौड़े इस ओढ़नी को सफेद चिकन के कपड़े को हल्दी के पीले रंग में रंग कर बनाया जाता है। सफेद रंग तो वैसे  ही शांति ,शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है जबकि पीला रंग आपके मन की खुशी व प्रसन्नता को जाहिर करता है। लाल रंग सुख-सौभाग्य से जुड़ा है। हमारे समाज में महिलाएं लाल रंग का प्रयोग (जैसे लाल साड़ी व लहंगा, सिंदूर, बिंदी) हर शुभ कार्य में करती हैं। यह पिछौडा पीले रंग का होता है जिसमें लाल रंग से विभिन्न प्रकार के प्रतीक व बूटियां बनाए जाते हैं। प्रतीक बहुत सोच समझकर बनाए जाते हैं जैसे सूर्य, घंटी, फूल, शंख, शुभ का चिन्ह (स्वास्तिक)। इन प्रतीकों का एक विशेष महत्व होता है। ये किसी भी स्त्री की सम्पन्नता, उर्वरता और पारिवारिक ख़ुशी को प्रतिरूपित करते हैं। पिछौड़ा के मध्यवर्ती भाग में स्थित प्रतीकों के विशिष्ट अभिप्राय होते हैं। स्वस्तिक देवी-देवताओं का प्रतीक होता है जो कि मनुष्य में कर्मयोग की भावना को दर्शाता है जिसकी कि चारों भुजाएं खुशहाली और सम्पन्नता की द्योतक होती है। स्वस्तिक के ठीक मध्य स्थित ओम चैतन्य और आध्यात्मिक अस्तित्व का द्योतक माना जाता है। स्वस्तिक के प्रथम भाग में स्थित सूर्य, पुत्र के सुख और सम्पन्नता को दर्शाता है, द्वितीय वृत्त-खण्ड में स्थित घंटी स्वयं की सम्पन्नता का सूचक होता है तृतीय व चतुर्थ वृत्त-खण्डों (क्वाड्रंट्स) में स्थित शंख व लक्ष्मी क्रमशः धार्मिकता व वैभव का सूचक है। इसे देवी की चुनरी के सामान ही पवित्र मानते है। और इसी रूप में इसका आदर होता है। 

हाथ से बने पिछौड़े अब बहुत कम मिलते हैं। पिछले कुछ समय से फिर से हाथ से बने पिछौडों की मांग बाजार में है। अल्मोड़ा और बागेश्वर में रहने वाले कुछ परिवार आज भी हाथ से बने पिछौड़े बाजार में बेचते हैं। जिनकी भारी मांग दिल्ली और मुम्बई के बाजारों में भी है। उत्तराखण्ड सरकार अब यहाँ की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने एवं प्रचार-प्रसार की बड़ी अच्छी पहल रोजगार के रूप में करा रही है जिससे कि ये परम्परा अनवरत चलती रहेगी।

यह हमारे पूर्वजों की धरोहर है जो हमें विरासत के रूप में मिली है और सदियों से कुमाऊंनी महिलाओं ने इस परंपरा को पूरी शिद्दत के साथ समेटा और सहेजा है। बुजुर्ग महिलाओं के सानिध्य में नई पीढ़ी इस कला को सीखती है। बदलते वक्त के साथ भले ही पारंपरिक पिछौड़ों की जगह रेडिमेट पिछौड़ों ने ले ली हो लेकिन कई बदलाव के दौर से गुजर चुके सुहागिन महिलाओं का रंग्वाली पिछौड़ा आज भी कुमाऊंनी लोककला और परंपरा का अहम हिस्सा बना हुआ है।

यह वेबसाइट  शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया द्वारा विकसित की है।

@ 2020 शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया सर्वाधिकार सुरक्षित।

  • Facebook - Black Circle
  • Twitter - Black Circle

Ramgarh (Uttarakhand), India