पुस्तक समीक्षा - प्रकृति का अलौकिक सौन्दर्य 

महेश डोभाल

उत्तराखंड भारत का ही नहीं बल्कि दुनिया का एक बेहद खूबसूरत और सर्वगुण संपन्न भू-भाग है। देवभूमि के रूप में प्रसिद्ध यह प्रणम्य प्रदेश अनेकानेक विशेषताओं के साथ वनस्पतियों और बहुमूल्य जड़ी-बूटियों की खान भी है। इस देवभूमि के देवत्व, सौन्दर्य, संस्कृति, आध्यात्म आदि का गुणगान समय-समय पर कवियों, लेखकों एवं विद्वतजनों द्वारा अपनी लेखनी से  किया जाता रहा है। इसी क्रम में बिनसर पब्लिकेशन द्वारा डॉ० रमेश पोखरियाल 'निशंक' द्वारा लिखित "धरती का स्वर्ग उत्तराखण्ड" श्रृंखला की नवीनतम पुस्तक "प्रकृति का अलौकिक सौन्दर्य" प्रकाशित की है। लेखक एवं प्रकाशक द्वारा इस पुस्तक को बहुत ही आकर्षक तरीक़े से प्रस्तुत किया गया है। विषय वस्तु, सौन्दर्य से समृद्ध छायाचित्रों एवं शब्द चयन में किये गये अभिनव प्रयोग से पुस्तक रोचक बन पड़ी है। 

बागेश्वर के संदर्भ में  पौराणिक पक्ष को शब्द सौंदर्य के शिल्प में ढालने का हुनर, लैंसडाउन के संदर्भ में जवानों की पगताल तथा मुनस्यारी के संदर्भ में “आधा संसार आधा मुनस्यार” की विवेचना पढ़ते ही मन बरबस इन स्थलों की सुरम्यता में रम जाने को आतुर हो जाता है। मुक्तेश्वर के संदर्भ में “कुमाऊँ की सुरम्यता में शब्द और नि:शब्द दोनों का आभास“ तथा फूलों की घाटी के संदर्भ में “अलौकिक, अद्भुत एवं विस्मय की त्रिवेणी” जैसे संबोधन, भाषा की सम्पन्नता व समृद्धि का दर्शन कराते हैं। यद्यपि कई जगहों पर शब्दों की पुनरावृत्ति से प्रस्तुतीकरण प्रभावित हुआ है, फिर भी वाक्य-विन्यास व शब्द-संयोजन इस कृति का एक समृद्ध पक्ष हैं। 

खिर्सू के सदंर्भ में  जिस १०० साल पुराने बंगले का उल्लेख है उसकी तस्वीर न पाने से जो उदासी होती है उसको शब्दों में व्यक्त करना मुश्किल है। ख़ूबसूरत छायाचित्रों पर संबंधित स्थल की पहचान उजागर न होने से भी जिंज्ञासू पाठकों को मायूसी होगी। प्रकृति के दिव्य प्रतिमानों से सुसज्जित इस सुरम्य भूमि में विद्यमान इतने सारे सरोवरों/तालों के विषय में एकमुश्त जानकारी प्रकृति प्रेमी पाठकों के लिये किसी कौतुहल के उजागर होने जैसा है, इसके लिये लेखक के प्रयास सराहनीय हैं।

यूँ तो प्रकृति के सौन्दर्य को एकाग्र मन, चेतन बुद्धी एवं दृष्टिसमपन्न चक्षुओं के त्रियुग्म से ही अनुभूत किया जा सकता है, परन्तु इस पुस्तक के वाचन के पश्चात अब इस विराट सौन्दर्य को मानसिक रूप से भी अनुभूत किया जा सकेगा, ऐसा मेरा मानना है। प्रत्येक स्थल के जीवंत चित्रण से प्राकृत सौन्दर्य की अनुभूति के साथ-साथ भाषा का सौन्दर्य भी पढ़ते ही बनता है।

इस पुस्तक वाचन के पश्चात अधिकतर पाठक इन स्थलों की तलाश में गूगल मैप व अन्य माध्यमों को खंगालने के लिये आतुर हो जाये तो उनकी व्यग्रता को पाठ्य सामग्री के उत्कृष्ट प्रभाव का अभीष्ट समझ लेना भी उचित ही है। इस पुस्तक के प्रकाशन के लिये प्रकाशक एवं लेखक को बधाई तथा सृजनात्मक लेखन के प्रति निरंतरता बनाये रखने के लिये अनंत शुभकामनायें।


 

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