महिलाओं की सुंदरता में चार-चांद लगाती पारंपरिक नथ (नथुली)

भारत भूषण पांडेय 

पारंपरिक गहने भला किसे नहीं लुभाते। यह इनका आकर्षण ही तो है, जो किसी का भी ध्यान ये अपनी ओर खींच लेते हैं। उत्तराखंड के पारंपरिक परिधान और आभूषण अपने आप में बेहद ही खास हैं। उत्तराखंड के सुदूरवर्ती अंचल में तो आज भी महिलाएं पारंपरिक ढंग से गढ़े गहनों को धारण करना पसंद करती हैं। बात की जाए उत्तराखण्ड की पारंपरिक नथ (नथुली) की तो गढ़वाल और कुमाऊं मंडल की संस्कृति में नथ का अपना अलग की महत्व है। गढ़वाल हो या कुमाऊं दोनों ही मंडलों में हर शुभ कार्य में सुहागिन महिलाएं नथ जरूर पहनती हैं। नथ (नथुली) उत्तराखंड में विवाहित महिलाओं द्वारा नाक में पहना जाने वाला एक आभूषण है। उत्तराखंडी महिलाओं के लिए पांरपरिक नथ एक पूंजी की तरह है, जिसे वह पीढ़ी-दर-पीढ़ी संजोकर रखती हैं। एक पारंपरिक नथ तीन से चार तोले सोने की बनती है। 

 

भारतीय आयुर्वेद में महिलाओं की नाक के बाएं ओर छिद्र करने के विषय में लिखा गया है। आयुर्वेद के अनुसार नासिका के बाएं तरफ़ की एक नस महिलाओं के गर्भ से जुड़ी होती है जिसमें छिद्र करने से प्रसव में आसानी होती है। यह बात ध्यान देने वाली है भारत में बाएं ओर नाक छेदने की परम्परा केवल उत्तर भारत में है दक्षिण भारत में नाक में दाएं ओर छिद्र किया जाता है। 

जिस तरह उत्तराखंड मुख्य रूप से दो हिस्सों गढ़वाल और कुमाऊं में बंटा है, ठीक उसी तरह से उत्तराखंडी नथ भी दो प्रकार की होती है। पूरे उत्तराखंड में सबसे सुंदर और आकर्षक नथ टिहरी की नथ मानी जाती है। टिहरी गढ़वाल की नथ सोने की बनती है और उस पर की गई चित्रकारी उसे दुनियाभर में मशहूर करती है। इसमें बहुमूल्य रुबी और मोती जड़े होते हैं। टिहरी की नथों में होने वाली विविधता और सुन्दरता के आधार पर कहा जा सकता है कि शायद गढ़वाल के राज परिवारों से नथ ने यहां के समाज में प्रवेश किया होगा। माना जाता है कि इस नथ का इतिहास राजशाही के दौर से शुरू होता है। तब राज परिवार की महिलाएं सोने की नथ पहना करती थीं। ऐसी मान्यता रही है कि जो परिवार जितना संपन्न होगा, वहां नथ भी उतनी ही भारी और बड़ी होगी। धन-धान्य की वृद्धि के साथ इसका आकार भी बढ़ता जाता था। उत्तराखंड में नथ आम लोगों के बीच अठारहवीं शताब्दी से प्रचलित हुई होगी। कुमाऊंनी नथ आकार में काफी बड़ी होती है, लेकिन इस पर डिजाइन कम होता है। बावजूद इसके यह बेहद खूबसूरत होती है। 

उत्तराखंड की पारंपरिक नथ के संबंध में प्रदेश की जानी-मानी लोकगायिका पद्मश्री बसंती देवी बिष्ट ने बताया कि पुराने समय में सुहागिनों के लिए 24 घंटे नथ धारण करना अनिवार्य था। लेकिन आधुनिकता के इस दौर में जहां नाथ के डिजाइन में परिवर्तन आया है वहीं, महिलाओं ने भी इसे सिर्फ खास मौकों पर पहने जाने वाला आभूषण बना दिया है। आजकल सुहागिन सिर्फ मांगलिक कार्यों और तीज-त्योहारों के अवसर पर ही नथ पहने दिखाई देती हैं। प्रदेश की पारंपरिक नथ के डिजाइन में आए बदलाव के बारे में सर्राफा व्यापारियों बताते हैं कि सोने के दाम बढ़ने की वजह से अब गढ़वाल और कुमाऊं की पारंपरिक नथ पहले के मुकाबले आकार में छोटी हो चुकी हैं। 

आजकल की युवतियां पुराने समय के बड़े बड़े नथ पहनने में असहज महसूस करती हैं उनके लिए बाजार में नए प्रकार के छोटे आकार में अलग अलग डिजाइन के नथ उपलब्ध हैं। साथ ही इनकी गढ़ाई भी हाथों की जगह मशीनों से होने लगी है। ज्वैलर्स भी इस बदलाव को अच्छा संकेत मान रहे हैं। उनका कहना है कि मशीनों से ढले नए कलेवर के गहनों में चमक ज्यादा होती है। साथ ही इसमें मिलावट की आशंका भी नहीं रहती। उत्तराखंडी नथ का क्रेज़ ना केवल पहाड़ों में है बल्कि पारंपरिक गहनों के प्रेमी दूर दूर से उत्तराखंड में आकर अपनी बेटियों के लिए यह पारंपरिक नथ लेते हैं।

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