क्रान्तिकारी परिवर्तन की ओर भारतीय शिक्षा नीति (NEP 2020)

मोहन चन्द्र जोशी (7/13 टकाना रोड़ पिथौरागढ़)

29 जुलाई का दिन भारत के लिए कई दृष्टि से न केवल महत्वपूर्ण है बल्कि ऐतिहासिक भी है। आज जहाॅ एक ओर सामरिक महत्व के महत्वपूर्ण रक्षा सौदे को साकार होते हुए देश ने देखा, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को केन्द्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। सम्भवतः आगामी लोकसभा सत्र में इसे संसद से भी मंजूरी मिल लायेगी। 34 वर्षो के लम्बे इंतजार के बाद 21वीं सदी में प्रवेशित भारत की शिक्षा नीति की प्रतीक्षा सम्पूर्ण प्रबुद्ध समाज बेसब्री से कर रहा था। देर से ही सही लेकिन कैबिनेट ने जिस शिक्षा नीति के प्रारूप को मंजूरी दी है वह वास्तव में एक नई उम्मीद की किरण लेकर आया है। देश के शिक्षा जगत में एक नये उत्साह का संचार देखा जा सकता है। इस उत्साह का कारण भी है। अब तक भारतीय शिक्षा नीति कमोवेश मैकाले के शिक्षा-दर्शन के इर्द-गिर्द ही घूमती हुई प्रतीत होती थी। पहली बार ऐसा लग रहा है कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय परिवेश, परिस्थिति एवं प्रतिभा का सम्मान किया गया है, और उसे महत्व देने की मनःस्थिति के साथ आम नागरिकों से, शिक्षा क्षेत्र से जुड़े प्रबुद्धजनों से और भारत के ग्रामीण परिवेश से सुझाव आमंत्रित कर उन्हें समायोजित करने का प्रयास किया गया है। 

वर्तमान में जो शिक्षा व्यवस्था हमारे देश में संचालित हो रही है उसका सबसे आधुनिक आधार राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 रही है। जिसने हर स्तर पर गुणवत्ता में सुधार के नाम पर विद्यार्थियों के लिए बोझ बढाने का ही कार्य किया। शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में सबसे पहले विद्यालय को आनन्दालय बनाने की बात कहीं गई और उसे कार्यरूप में परिणित करने का प्रयास किया जाता रहा है, परन्तु शिक्षा के क्षेत्र में ढांचागत परिवर्तन करने में विशेष प्रयास इसके बाद भी नहीं हो पाये।राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में जो बातें सामने आ रही हैं उनमें सबसे महत्वपूर्ण है नई पाठ्यक्रम और शैक्षणिक संरचना। इसके अलावा और भी अनेक महत्वपूर्ण बातें है जो इस देश की शिक्षा व्यवस्था में मील का पत्थर साबित हो सकती हैं । इनमें सबसे पहले है पूर्व-प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमीकरण की बात की जाय तो हम देखते हैं कि इससे पूर्व प्राथमिक शिक्षा को उतना महत्व कभी नहीं दिया गया जितना भारत जैसे देश में दिये जाने की आवश्यकता थी। आंगनबाड़ी केन्द्रों को मजबूती प्रदान करना तथा नये प्री-स्कूल खोलने के साथ-साथ प्राथमिक शिक्षा से लिंक करते हुए मध्याह्न भोजन योजना को और विस्तार देना आदि ऐसे उपाय है जो प्राथमिक शिक्षा के आधार को न केवल मजबूदी प्रदान करेंगे बल्कि ग्रामीण परिवेश में बच्चों के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य का स्तर भी सुधरेंगे। यहाॅ सरकार को इस बात का ध्यान रखना आवश्यक होगा कि पूर्व-प्राथमिक व प्राथमिक स्तर पर शिक्षकों के चयन प्रक्रिया में बाल मनोविज्ञान की अवधारणा को सबसे महत्वपूर्ण मानते हुए ऐसे शिक्षकों को नियुक्त करना होगा जो शिक्षा के सरोकारों व बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ रखते हों। 


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि प्राथमिक स्तर तक  शिक्षा का माध्यम क्षेत्रीय भाषाओं, या राष्ट्रभाषा का प्रावधान किया जाना है। क्यों कि अब तक हम अंग्रेजी के वर्चस्व को स्वीकार कर चुके हैं। जिस कारण प्राथमिक शिक्षा का माध्यम अंगे्रजी भाषा बनाये जाने की हम में होड़ सी लगी हुई है। उससे एक ओर तो बच्चों का मानसिक शोषण हो रहा है वहीं दूसरी ओर भारतीय सांस्कृतिक विरासत एवं क्षेत्रीय भाषाओं में विद्यमान पैत्रिक परम्परा का ज्ञान लुप्त हो रहा था। जिस कारण बच्चे अपने परिवेश एवं मामृभूमि या जन्मभूमि से कुछ समय बाद भावनात्मक रूप से जुडे रहने से वंचित हो रहे थे। यह एक प्रकार का बाल अपराध ही है, जिसमें हम बच्चों को उनकी पैत्रिक विरासत से वंचित कर रहे हैं। जिसके दूरगामी दुष्परिणाम अलगाव एवं नैतिक मूल्यों के गिरावतट के रूप में हमारे सम्मुख आने लगे हैं। यह अच्छा ही हुआ कि सरकार ने इस बात को समझा और समय रहते चेत गई और प्राथमिक शिक्षा में क्षेत्रीय भाषाओं को महत्व दिया। इससे राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास करने में भी सहायता मिलेगी और एक समय ऐसा आयेगा कि उत्तर भारत का व्यक्ति अपनी क्षेत्रीय भाषा के साथ-साथ दक्षिण भारत की भाषाओं को आसानी से सीख लेगा, समझ लेगा और सांस्कृतिक सरोकारों में सामंजस्य स्थापित कर पाने में समर्थ हो सकेगा। प्राथमिक शिक्षा के लिए एन0सी0ई0आर0टी0 द्वारा सम्पूर्ण देश के लिए एक सार्वभौमिक पाठ्यक्रम बनाया जायेगा जो सम्पूर्ण भारत के लिए एक समान होगा। यह शिक्षा के सार्वभौमिकरण का प्रथम प्रयास है, जो कि स्वागत योग्य है।

  
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में तीसरी महत्वपूर्ण बात विभिन्न वर्गो में छात्रों का तथाकथित बौद्धिक स्तर के आधार पर विभाजन किये जाने की प्रथा का अन्त होना है। प्राथमिक स्तर ग्र्रेड 3 से 5 तक छात्रों को भविष्य की शिक्षा के लिए तैयार किया जायेगा जिसके अन्तर्गत छात्रों का परिचय  विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान जैसे विषयों को पढ़ाया लायेगा। अगले तीन वर्ष मीडिल-स्टेज के होंगे जिसमें तय पाठ्यक्रम को पढ़ाया जायेगा और मिडिल स्टेज के बाद ग्रेड 9 से 12 तक चार वर्षो विषय की गहरी समझ को बढाया जायेगा और उनकी विश्लेषण क्षमता का विकास किया जायेगा। अब तक जो व्यवस्था थी उसमें विज्ञान, वाणिज्य एवं कला संकाय में छात्रों को बहुत पहले ही विभाजित किया जाता था जिसमें विज्ञान वर्ग को पढ़ने वालों को बौद्धिक रूप से कुशल और अन्य को कमतर आंकने की प्रथा चल पड़ी थी जिसका विद्यार्थियों जीवन के विभिन्न पहलुओं पर कुप्रभाव पड़ रहा था। अब इस समस्या का स्थाई समाधान हो जायेगा। अब सम्भवतः सभी बच्चे जो विद्यालयी शिक्षा में दाखिला लेंगे वे सब केवल विद्यार्थी होंगे। जो अपनी योग्यता एवं कार्यक्षमता को प्रदर्शित करने के लिए स्वयं स्फूर्त रूप से तत्पर होंगे। यहाॅ राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एक और बात उल्लेखनीय है कि इस दौरान जो छात्र बीच माध्यमिक स्तर की पढ़ाई के दौरान इंटर्नशिप  करना चाहता है वह पढाई के बीच में ही ऐसा कर सकता है। जिसकी इस देश को अत्यधिक आवश्कता है। अब हम कल्पना कर सकते हैं कि इस देश में भविष्य में "स्किल इण्डिया" या "मेक इन इण्डिया" का सपना साकार हो सकेगा।

 
नई शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण बदलाव होने हैं जो कि भारत की परिस्थितियों के अनुकूल एवं जनमानस की अपेक्षाओं के अनुरूप ही होंगे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात है - ’’मल्टी इन्ट्री और मल्टी एग्जिट सिस्टम’’  अर्थात एक वर्ष की पढ़ाई करने पर सार्टीफिकेट, दो वर्ष की पढ़ाई पूर्ण करने पर डिप्लोमा और तीन वर्ष की पढ़ाई करने पर डिग्री कोर्स और यदि चार वर्ष की पढ़ाई कर लेते है तो रिसर्च के साथ डिग्री मिलेगी। सबसे बड़ी बात यह है कि इस दौरान आप किसी भी विषय की पढ़ाई कर सकते है और जब चाहें बीच में पढ़ाई छोड़ सकते हैं। किसी प्रोजेक्ट में काम करते हुए पढ़ाई करना इससे आसान हो जायेगा। इस बडे़ बदलाव से न केवल उच्च शिक्षा में गुणवत्ता आयेगी बल्कि विद्यार्थियों में कार्यसंस्कृति और कार्यक्षमता दोनों का विकास भी तेजी से होगा। 

भारतीय दर्शन में शिक्षा का मूल उद्देश्य बताते हुए कहा गया है कि "सा विद्या या विमुक्तये" अर्थात विद्या वह है जो मुक्ति प्रदान करे। बालक का सर्वांगीण विकास करना ही शिक्षा का लक्ष्य बताया गया है। गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने "शिक्षा और संस्कृति (1935)" में लिखा है "जब भारत की संस्कृति अपने सर्वोच्च अवस्था में थी वह कभी धन की कमी के कारण हतोत्साहित या शर्मिन्दा नहीं हुई। इसका कारण यह था कि उस संस्कृति का उद्देश्य आत्मिक जीवन का विकास करना था, भौतिक सम्पदा का संग्रहण नहीं। शिक्षा का लक्ष्य इसी उद्देश्य को प्राप्त करना होना चाहिए।" सम्भवतः राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2019 हमें शिक्षा के उसी लक्ष्य की ओर ले जाने में मील का पत्थर साबित होगी।  

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