देश के युवा प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के लिए रचनात्मक गतिविधियों का हिस्सा बनें :डॉ० निशंक

के० के० पांडे

देहरादून, 18 जुलाई। गंगा संरक्षण पर केंद्रित राष्ट्रीय वेबीनार "गंगा : साहित्य, अध्यात्म और विज्ञान" में केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री डॉ० रमेश पोखरियाल 'निशंक' ने कहा कि गंगा भारतीयता की पहचान है। इसे दुनिया की सबसे स्वच्छ नदी बनाने के लिए नई पीढ़ी को सक्रिय रूप से भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने हरिद्वार को दुनिया की आध्यात्मिक राजधानी के रूप में विकसित किए जाने पर भी जोड़ दिया।

'स्पर्श गंगा' और चमन लाल महाविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में "गंगा : साहित्य, अध्यात्म और विज्ञान" विषय पर आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार में डॉ० निशंक ने कहा कि स्पर्श गंगा की तर्ज पर ही स्पर्श हिमालय अभियान की आवश्यकता है। युवाओं को गंगा के संरक्षण और उसे दुनिया की सबसे स्वच्छ नदी बनाने के अभियान का सक्रिय हिस्सा बनना चाहिए। उन्होंने स्पर्श शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि अपनी नदियों और अपनी धरती के साथ गहरे एहसास के साथ जुड़ने की जरूरत है। उन्होंने स्पर्श गंगा अभियान को और व्यापकता देते हुए इसके अंतर्गत आम लोगों के जीवन के उत्थान और परंपराओं के संरक्षण के कार्य को जोड़ने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि गंगा हमारे अस्तित्व की पहचान है। यह केवल नदी ही नहीं, बल्कि भारतीयता का प्रतीक और पर्याय भी है। गंगा भारत की जीवनधारा है और इसके किनारे पर विकसित हुई संस्कृतिया महान भारतीय परंपरा का उद्घोष करती हैं।

 

डॉ० निशंक ने कहा कि गंगा की स्वच्छता व संरक्षण की समस्या किसी एक वर्ग या एक व्यक्ति की समस्या नहीं है, सवाल विश्व धरोहर, आस्था की प्रतीक, हमारी अर्थव्यवस्था को आधार प्रदान करने वाली सम्पत्ति की सुरक्षा का है, इस तथ्य को ध्यान में रखा जाये तो सभी का हित है। अब गंगा को निर्मल बनाने के लिए सामूहिक रूप से भगीरथ प्रयास की आवश्यकता है। प्रतिबद्धता और प्रयास के सहारे ही भगीरथ गंगा को स्वर्ग से उतार लाए थे।

केंद्रीय मंत्री डॉ० निशंक ने युवाओं का आह्वान किया कि वे अपनी प्राकृतिक संपदा के संरक्षण के लिए रचनात्मक गतिविधियों का हिस्सा बनें। उन्होंने वैज्ञानिकों और शोधार्थियों का आह्वान किया कि वे गंगा के संरक्षण के लिए व्यापक कार्य योजनाएं तैयार करें। डॉ० निशंक ने हरिद्वार को दुनिया की आध्यात्मिक राजधानी बनाने और हर की पैड़ी को दुनिया के आध्यात्मिक आकर्षण का सर्वोत्तम केंद्र बनाने की जरूरत को भी रेखांकित किया। 

 

स्पर्श गंगा अभियान की राष्ट्रीय समन्वयक अरुषि पोखरियाल निशंक ने ने स्पर्श गंगा अभियान का विहंगावलोकन के साथ ही गंगा के संरक्षण के लिए स्पर्श गंगाओं के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड को प्रकृति का विशेष आर्शिवाद प्राप्त है कि जिसने उसे भारत के करोड़ों मानवीयों एवं जैव जगत को शुद्ध प्राणवायु प्रदान करने हेतु लगभग 70 प्रतिशत वन क्षेत्र, देश को सामरिक सुरक्षा प्रदान करने हेतु पर्वतराज हिमालय, विश्वभर को अपने ज्ञान एवं बौद्धिक चिन्तन, दर्शन एवं श्रम से सींचने वाला समृद्ध मानव संसाधन तथा जनमानस की प्यास बुझाने व् उदरपूर्ति के लिए गंगा-यमुना सहित सैकड़ों स्पर्श गंगाऐं उपहार स्वरूप भेंट की हैं। उन्होंने बताया कि इस अभियान के साथ चार लाख से अधिक लोग सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। आने वाले दिनों में स्पर्श गंगा की गतिविधियों को और विस्तार दिया जाएगा।  

मुख्य अतिथि उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० देवी प्रसाद त्रिपाठी ने गंगा के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संदर्भ पर विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि इस धरती पर प्रत्येक जलस्त्रोत और जलधारा गंगा के समान ही पावन और जीवनदायिनी है। जल का प्रवाह गंगा के पावन प्रवाह के समतुल्य है। प्रत्येक जलस्त्रोत तथा जलधाराओं को सुरक्षित तथा स्वच्छ रखना गंगा स्वच्छता अभियान के लिए प्रत्येक नागरिक का अमूल्य योगदान बन सकता है।

मुख्य वक्ता श्रीदेव सुमन उत्तराखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो० पी० पी० ध्यानी ने गंगा से जुड़े वैज्ञानिक तथ्यों और पहलुओं को बताते हुए कहा कि भारत की गंगा नदी के पानी में असाधारण शक्तियां हैं। अकबर ने इसे "अमृत-जल" बताया और हमेशा अपनी यात्राओं के दौरान गंगा-जल उपयोग किया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाज़ों पर इंग्लैंड वापसी की तीन महीने की यात्रा में केवल गंगा-जल ही उपयोग किया जाता था, क्योकि यह मीठा और ताज़ा बना रहता था। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक विशाल भू-भाग को सींचने वाली गंगा, देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है। गंगा घाटी में ही प्राचीन मगध महाजनपद का उद्भव  हुआ जहाँ से गणराज्यों की परंपरा विश्व में पहली बार प्रारंभ हुई। यहीं भारत का वह स्वर्ण युग विकसित हुआ जब महान मौर्य और गुप्त वंशीय राजाओं ने यहाँ शासन किया।

विशिष्ट वक्ता कुमाऊं विश्वविद्यालय में कार्यरत प्रो० अतुल जोशी ने कहा कि गंगा के अध्यात्म, साहित्य और विज्ञान का माहत्म्य तभी सिद्ध हो सकेगा जब हम गंगा तंत्र की हजारों स्पर्श गंगाओं की रक्षा करने में सफल होंगे। उन्होंने कहा कि मानवीय  चेतना की प्रवाहिता गंगा को ऋग्वेद, महाभारत, रामायण एवं अनेक पुराणों में पुण्य सलिला, पाप-नाशिनी, मोक्ष प्रदायिनी, सरित्श्रेष्ठा एवं महानदी के नामों से अलंकृत किया गया है। महाकवि तुलसीदास ने रामचरित मानस में गंगा को पतित-पावनी, दारिद्रय-नासनी, मुक्ति-प्रदायिनी और सबका कल्याण करने वाली बतलाया है। गंगा नदी के महत्व को आर्य-अनार्य, वैष्णव-शैव, साहित्यकार-वैज्ञानिक सभी स्वीकार करते हैं; क्योंकि गंगा इनमें कोई भेद नहीं करती है। सभी को एक सूत्र में पिरोती है। इसी बात को वाहिद अली ‘वाहिद’ ने अपनी कविता के माध्यम से स्पष्ट करते हुए कहा है "माँ के समान जगे दिन-रात जो प्रात: हुई तो जगाती है गंगा। कर्म प्रधान सदा जग में, सबको श्रम पंथ दिखाती है गंगा। सन्त-असन्त या मुल्ला-महन्त सभी को गले से लगाती है गंगा,ध्यान-अजान, कुरान-पुरान से भारत एक बनाती है गंगा।" मंदाकिनी, भोगावती तथा भागीरथी की संज्ञा से अलंकृत गंगा केवल भारत-भूमि मात्र में ही नहीं वरन् वह आकाश, पाताल और इस पृथ्वी को भी परस्पर मिलाती है। प्रो० जोशी ने कहा कि इस वेबिनार को तभी और अधिक प्रासंगिक और तार्किक बनाया जा सकता है जब हम गंगा को संरक्षित रखने की चुनौतियों को न केवल स्वीकार करें बल्कि इसके लिए कोई प्रभावी कार्ययोजना प्रस्तुत कर सकें। मेरा मानना है की गंगा के अध्यात्म, साहित्य और विज्ञान का माहत्म्य तभी सिद्ध हो सकेगा जब हम गंगा तंत्र की हजारों स्पर्श गंगाओं की रक्षा करने में सफल होंगे क्योंकि गंगा की पोषक स्पर्श गंगाओं के भी अपने उद्गम और हिमनद है, अपने वन और जैव जगत है, अपना इतिहास है, अपने गाँव और उनकी सभ्यता है, अपना अध्यात्म तथा देवी देवता हैं, अपना समाज एवं संस्कृति है, साहित्य एवं लोक परम्पराएँ हैं तथा अपना एक सशक्त अर्थशास्त्र एवं विज्ञान है। गंगा का एक आर्थिक वस्तु के रूप में शोषण करने और उसे बांधने की बजाय उसे सजीव मानते हुए उसके प्रवाह को निरंतरता प्रदान करने की आवश्यकता है। पतित पावनी गंगा का आध्यात्मिक, साहित्यिक, पौराणिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय माहात्म्य तभी संरक्षित एवं संवर्धित हो सकेगा जब उसके स्पर्श हिमालय, स्पर्श हिमनद और स्पर्श गंगाएं, स्पर्श वन तथा स्पर्श जैव जगत, स्पर्श मैदान, स्पर्श गाँव और शहर, स्पर्श देवी-देवता तथा स्पर्श तटों पर रहने वाली करोडो-करोड़ स्पर्श जनता के जीवन-जीविका तथा उनके स्पर्श समाज एवं स्पर्श संस्कृति की रक्षा की जायेगी। 

विशिष्ट वक्ता पद्मश्री कल्याण सिंह रावत ने उत्तराखंड की नदियों के संरक्षण के लिए समाज को सक्रिय भूमिका निभाने को कहा। उन्होंने कहा कि प्रकृति प्रदत्त जल का अनमोल खजाना इन्हीं नदियों में समाहित है। नदियों के जल को निर्मल बनाए रखने के लिए सामूहिक रूप् से निरन्तर प्रयास चलने चाहिए। गंगा और उनकी सहायक नदियों के दोनों तरफ गंगा प्रहरी के तौर मां गंगा की सेवा करें, उसकी पवित्रता और निर्मलता की रक्षा करें, लोगों में जागरूकता फैलाकर अधिक से अधिक लोगों को इसके लिए प्रेरित करें। 

वेबिनार की निर्देशक डॉ० सविता मोहन ने नदियों के संरक्षण के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए राष्ट्रव्यापी गंगा यात्रा की जरूरत को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक देश की नदियां उस देश की समृद्धि एवं खुशहाल सांस्कृतिक एवं सामाजिक विकास का कारक होती हैं और इन्हीं नदियों के साथ इन देश की संस्कृति और समृद्धि की अमृतधारा निरन्तर प्रवाहमान हैं। आमंत्रित वक्ता एवं स्पर्श गंगा अभियान से जुड़े डॉ० सर्वेश उनियाल ने बताया कि किस तरह पतित पावनी गंगा की निर्मलता और स्वच्छता को लेकर 'स्पर्श गंगा' के नाम से लोग एकजुट हुए और कारवां बनता चला गया। हरिद्वार से शुरू हुआ यह अभियान आज पांच राज्यों तक में फैल चुका है। अभियान की खास बात इसके काम की निरंतरता का बना रहना है। उन्होंने कहा कि स्पर्श गंगा अभियान देश का पहला ऐसा अभियान है, जो स्कूली छात्र-छात्राओं को जागरुक करने के साथ देश के लोगों में भी गंगा स्वच्छता संरक्षण के प्रति अलख जगा रहा है। आमंत्रित वक्ता डॉ० रामविनय सिंह ने कहा कि जो लोग गंगा को किसी भी प्रकार से प्रदूषित करते हैं, वे प्रकृति और अस्तित्व का को गहरा नुकसान पहुंचाते हैं। वेबिनार अध्यक्षता कर रहे गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रो० प्रभाकर बडोनी ने धरातल पर ठोस कार्य योजनाएं लागू किए जाने की जरूरत बताई। 

इस अवसर पर विशेषज्ञ वक्ताओं ने अलग हिमालय नीति बनाए जाने के प्रस्ताव पर सहमति जताई। साथ ही, हिमालय से निकलने वाली सभी नदियों को स्पर्श गंगा अभियान के साथ जोड़े जाने पर जोर दिया। वेबीनार का संचालन और संयोजन चमनलाल महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ० सुशील उपाध्याय ने किया। डॉ० ऋचा चौहान ने अतिथियों का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर चमन लाल महाविद्यालय के प्रबंध समिति के कोषाध्यक्ष अतुल हरित, डॉ० राखी उपाध्याय, डॉ० अशोक गहलोत, डॉ० बीना बेंजवाल आदि सहित देश के 24 राज्यों के 300 से अधिक विद्वानों ने प्रतिभाग किया।
 

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