कुमाऊँ की लोक-चित्रकला - ऐपण

श्रीमती मनीषा पांडेय 

रंगोली अथार्त अल्पना भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा और लोक-कला है। अलग-अलग प्रदेशों में अल्पना के प्रतिरूपों के नाम और उसकी शैली में भिन्नता हो सकती है लेकिन इसके पीछे निहित भावना और संस्कृति में समानता है। इसकी यही विशेषता इसे विविधता देती है और इसके विभिन्न आयामों को भी प्रदर्शित करती है। संपूर्ण भारत के विभिन्न क्षेत्रों में इस लोक कला को अलग-अलग नामों जैसे उत्तराखंड में ऐपण तो उत्तर प्रदेश में चौक पूरना, राजस्थान में मांडना, बिहार में अरिपन, मद्रास में कोलाम,  गुजरात में रंगोली, बंगाल में अल्पना, महाराष्ट्र में रंगोली, कर्नाटक में रंगवल्ली के नाम से जाना जाता है। पूरे भारत में इसे अलग अलग नाम है लेकिन इन्हें त्यौहारों, शुभ कार्यों व्रत के दौरान ही बनाया जाता है। चूँकि अल्पनायें किसी क्षेत्र की लोक संस्कृति की परिचायक होती हैं। अतः उनका मूलाधार यथावत् बनाए रखना उचित होता है। ये अल्पनायें पुरातन पीढ़ियों से उतरती हुई नवागत पीढ़ियों को विरासत के रूप में प्राप्त होती हैं।

लोक-चित्रकला के क्षेत्र कुमांऊँ का उत्तर भारत में प्राचीन काल से ही महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कुमांऊँ की चित्रकला को अधिकांशतः नारी-शक्ति का संरक्षण प्राप्त रहा है। कुमांऊँ की नारी ही धार्मिक सभाओं में इस चित्रकला की गुरु व शिष्या दोनों हैं। मॉं गुरु है तो पुत्री शिष्या। इन्हीं दो गुरु-शिष्य परम्परा से ही यह चित्रकला निरंतर प्रगति कर रही है। कुमांऊँ की चित्रकला मात्र अभिव्यक्ति का साधन नहीं है, वरन् इसमें धर्म, दर्शन और कुमांऊँ की संस्कृति की अमिट छाप भी विद्यमान रहती है।

कुमाऊँ की देहरी और दीवार सजाने की कला 'लिख थाप' या थापा कहलाती हैं, इनको ऐपण, ज्यूँति या ज्यूँति मातृका पट्ट भी कहा जाता है। इसमें भीगी हुई सिंदूरी रंग की मिट्टी गेरू से रंग कर आधार तैयार किया जाता है फिर उसके ऊपर से बिस्वार जो रात भर भिगो कर पिसे गये चावल या चावल के आटे से तैयार एक घोल होता है, से कलात्मक चित्रों के रूप बनाए जाते हैं। ऐपण में सम बिंदु और विषम रेखाओं को शुभ माना गया है। देखने में भले ही ये ऐपण आसान से नजर आते है, लेकिन इन्हें बनाने में ग्रहों की स्थिति और धार्मिक अनुष्ठानों का खास ध्यान रखा जाता है। कुमाऊं में परंपरागत तौर पर तंत्र आधारित पूजा पद्धतियों का प्राविधान है, जिनमें अलग-अलग देवताओं का आह्वान करते समय उन्हें आसन देने के लिए खास तरह की ऐपण चौकियां बनाई जाती हैं। गणेश पूजन के लिए स्वास्ति चौकी, मातृ पूजा में अष्टदल कमल, षष्ठी कर्म, नामकरण में गोल चक्र में पांच बिंदु (पांच देवताओं के प्रतीक), देवी पूजा में कलश की चौकी, शादी विवाह में धूलि अर्घ्य चौकी, कन्या चौकी, यज्ञोपवीत में व्रतबंध की चौकी, शिवार्चन में शिव चौकी, देली पर द्वार देवी के प्रतीक ऐपण, दीपावली पर लक्ष्मी चौकी, लक्ष्मी के पाए आदि बनाई जाती हैं। उत्तराखण्ड में ऐपण कला में कालांतर से चली आ रही मान्यताओं की अभिव्यक्ति परिलक्षित होती है. अतः इनमें तांत्रिक, मान्त्रिक एवं यांत्रिक आस्थाओं के संकेत मिलते हैं। इस तरह यह समझना भी आवश्यक है कि ऐपण केवल एक लोक कला नहीं वरन कुमाऊं अंचल में होने वाली तांत्रिक पूजा (ॐ  एँ ह्रीं क्लीं प्रकार की) में देवगणों-देवियों का आह्वान कर उन्हें आसन देने के लिए प्रदान की जाने वाली चौकियां हैं।  शिव व विष्णु पुराण सहित अनेक पुराणों में भी इन चौकियों का वर्णन आता है। तिब्बत में भी इसी तरह की जमीन पर विशाल आकार की ‘किंखोर” कही जाने वाली चौकियां बनाई जाती हैं।

कुमाऊँ का प्राचीन इतिहास अनेक कबीलों तथा विभिन्न संस्कृतियों को अपने आँचल में समेटे हुए है। कुमाऊँ में अल्पना तथा भिप्ति चित्रों का प्रत्यक्ष रुप व चलन चन्द शासन काल से होता है। कुमाऊँ में चन्द वंश की स्थापना का सूत्रपात चम्पावत में सोमचन्द से आरम्भ होता है। सोमचन्द तथा उसके दश वंशजों का शासन 975 ई. से 1178 ई. तक माना जाता है। सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि यहाँ के प्रशासक अथवा शासक राजपूत वर्ग - महरा, फड़त्याल, जिन्ना, जलाल, मनराल, रोतौला, रजबार आदि में यह कला समृद्ध नहीं है और न उनके सांस्कृतिक जीवन का अटूट अंग। ऐपण व भिप्ति चित्रकला परम्परा कुमाऊँ में मात्र साह (साह) व ब्राह्मणों में ही अपने सम्पूर्ण विकसित स्वरुप तथा जीवन के समस्त सांस्कृतिक कार्यकलापों की गहराई की हद तक जुड़ी हुई है। ब्राह्मणों में पंत व जोशी अपना मूल स्थान महाराष्ट्र व गुजरात मानते हैं। कहा जाता है कि सोम चन्द 8वीं शताब्दी में गुजरात से आकर यहाँ बसा था। दूसरा मान्यता है कि सोम चन्द 'झूसी' इलाहाबाद का राजकुमार था और बैस राजवंश से सम्बन्धित था। तीसरी जनश्रुति कहती है कि सोम चन्द कन्नौज के शासक का भाई था, जो ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के अन्तर्गत नये राज्य की कामना हेतु कुमाऊँ में आया था। उसका यहाँ आगमन उसकी बद्रीनाथ यात्रा के निमित्त हुआ था। तत्कालीन शासक ब्रह्मदेव ने अपनी कन्या का विवाह इससे किया और दहेज में चम्पावत के सुई क्षेत्र, दुर्ग तथा तराई की कुछ भूमि भी इसे प्रदान की। इस कथन का साक्ष्य कुमाऊँ क्षेत्र में घसने वाले 'साह' लोगों की इस मान्यता से होता है कि साह अपना पूर्व स्थान 'झूसी' इलाहाबाद को मानते हैं और आज भी साह लोग विशेष रुप से बढ़े-बूढ़े जब कभी प्रयाग व कुम्भ स्नान के लिए जाते हैं, तब झूसी में ही रहना सार्थक समझते हैं। दूसरी बात यह है कि कुमैया साह अपना पूर्ववर्ती स्थान चम्पावत को मानते हैं। इन सब बातों से यही विश्वास होता है कि 'साह' लोग चन्दों के साथ ही बाहर से आये।

ऐपणों की रचना में अलग अलग समुदायों में अनेक प्रकार के प्रतीक व लाक्षणिक अन्तर दृष्टिगोचर होते हैं। साहों व ब्राह्मणों के ऐपणों में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि ब्राह्मणों में चावल की पिष्ठि निर्मित घोल द्वारा धरातलीय अल्पना अनेक आलेखन प्रतीकों, कलात्मक डिजाइनों, बेलबूटों में प्रकट होती है। साहों में धरातलीय आलेखन ब्राह्मणों के समान ही होते हैं परन्तु इनमें भिप्ति चित्रों की रचना की ठोस परम्परा है। थापा श्रेणी में चित्रांकन दीवलों या कागज में होता है। यह शैली ब्राह्मणों में नहीं के बराबर है। जिन आलेखनों या चित्रों की रचना कागज में की जाती है। उन्हें पट्टा कहते हैं। इसी प्रकार नवरात्रि पूजन के दिनों में दशहरे का पट्टा केवल साह लोग बनाते हैं। ऐपणों में एक स्पष्ट अन्तर यह है कि ब्राह्मण गेरु मिट्टी से धरातल का आलेपन कर चावल के आटे के घोल से सीधे ऐपणों का आलेखन करते हैं परन्तु साहों के यहाँ चावल की पिष्टि के घोल में हल्दी डालकर उसे हल्का पीला अवश्य किया जाता हैं तभी ऐपणों का आलेखन होता है।

कुमाऊँनी ऐपणों को अगर सूक्ष्मता से देखा जाए तो बोध होता है कि इन पर बंगाल का स्पष्ट प्रभाव है। भले ही कुछ प्रतीक व नाम शुद्ध कुमाऊँनी भाषा व क्षेत्र के ही हैं परन्तु पूर गठन बंगाल की अल्पना के प्रभाव से पूर्ण दिखाई देता है। 16वीं सदी के तारानाथ, जो तिब्बती इतिहासकार थे, द्वारा लिखित इतिहासकार से ज्ञात होता है कि 7वीं सदी में पश्चिमी भारत में 'भाखड़' से एक चित्र शैली प्रचलित हुई और 9वीं सदी से पूर्वी भारत में भी एक शैली का प्रचलन हो चला था। पहले नेपाल के चित्रकार पश्चिम भारतीय शैली में काम करते थे परन्तु बाद को उन्होंने पूर्वी शैली को अपना लिया। यह पूर्वी शैली ही आगे चलकर 'सेन' और 'पाल' शैली कहलाई। इस शैली में जहाँ चित्रों का निर्माण मात्र लाल, पीला, नीला, काला, सफेज, बैगनी रंगो में होता था, वहीं चित्रांकन उसी प्रकार होता था जिस प्रकार कुमाऊँ में लिख थापों व वर बूंदों में। बंगाल में सेन व पाल शासन में अनेक वज्रयानी (तांत्रिक) स्थविर प्रगट हुए तथा उस समय तांत्रिक बैद्ध (वज्रयानी) केवल नेपाल, बिहार तथा बंगाल में ही शेष रह गए थे और तिब्बत बज्रयानी लामावाद का दुर्ग बन चुका था। इसलिए कुमाऊँ के वर बूंद, जो 12 या 13 प्रकार के हैं, के विषय में कुमाऊँ की वयोवृद्ध जानकारों का कहना है कि यह कला भोट देश अर्थात् तिब्बत से आयी है। मान्यतानुसार शिव का स्थान कैलाश पर्वत तथा विष्णु का मानसरोवर दोनों भोट प्रदेश (तिब्बत) में हैं। इसी प्रकार शिव-पार्वती व विष्णु की पूजा अर्चना के लिए हर हर मण्डल व गौर तिलक का निर्माण किया जाता है। कुमाऊँनी ऐपणों में चावल पिष्टि के घोल का प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार बंगाल के ऐपणों का निर्माण व आलेखन होता है। बंगाल में कृषि विषयक लौकिक आचार तथा अनुष्ठान की अल्पना है। कुमाऊँ में भी इसी प्रयोजन के लिए लोक संस्कृति में हरेला, डिकरा, बिरुड़िया व डोर दुबज्योड़ पूजा का विधान व थापे तथा ऐपण हैं।

कुमाऊँ की ज्यूँति मातृका पट्टों, थापों तथा वर बूदों में श्वेताम्बर जैन अपभ्रंश शैली का भी स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। श्वेताम्बर जैन पोथियों की श्रृंखला में बड़ौदा के निकट एक जैन पुस्तकागार में 1161 ई. की एक ही पुस्तक में औधनियुक्ति आदि सात ग्रंथ मिले, जिनमें 16 विद्या देवियों, सरस्वती, लक्ष्मी, अम्बिका, चक्र देवी तथआ यक्षों के 21 चित्र बने हैं। इन ग्रंथ चित्रों में चौकोर स्थान बनाकर एक चौखट सी बनाई गई हैं और इनके मध्य में आकृतियाँ बिठाई गई हैं। ठीक इसी प्रकार का चित्र नियोजन कुमाऊँ के समस्त ज्यूति पट्टो, थापों व बखूदों में किया जाता है। कुमाऊँ में ज्यूति पट्टों में महालक्ष्मी, महासरस्वती व महाकाली ३ देवियाँ बनाई जाती है साथ में १६ षोडश मातृकाएं तथा गणेश, चन्द्र व सूर्य निर्मित किये जाते हैं। अपभ्रंश शैली में रंग व उनकी संख्या भी निश्चित है। जैसे लाल, हरा, पीला, काला, बैगनी, नीला व सफेद। इन्हीं सात रंगों का प्रयोग कुमाऊँ की भिप्ति चित्राकृतियों अथवा थापों व पट्टों में किया जाता है।

कुमाऊँ में प्रचलित मुख्य ऐपणों व चौकियों की सविस्तार चर्चा इस प्रकार की जा सकती है - 

सरस्वती पीठ - 
तीन प्रकार से बनाई जाती है। धरातल को पहले गेरु मिट्टी के घोल से लीप लेते हैं। फिर चावल पिष्ठिका (विस्तार) से रेखांकन किया जाता है। साह इसमें पीली आभा लाते हैं व ब्राह्मण विस्तार का रंग सफेद ही रहने देते हैं।
(अ) इसका 9(नौ) बिन्दुओं द्वारा निर्माण होता है। इन बिन्दुओं को रेखा द्वारा इस प्रकार जोड़ा जाता है कि आठ (8) भद्र स्वरुप निकल आते हैं। यह कृति सरस्वती चौकी या अष्टदल कंवल कहलाती है। इसको बनाने के बाद ही इस पर देव प्रतिमाएँ स्थापित की जाती है।
(ब) सरस्वती पीठ में 9(नौ) बिन्दु बनाये जाते हैं और इन्हें रेखा द्वारा इस प्रकार एक दुसरे से मिलाया जाता है कि ९ (नै) षोडश या स्वस्तिक बन जाते हैं। इस पीठ का निर्माण नवरात्रियों में देव स्थापना व पूजन हेतु किया जाता है। 
(स) एक तारा का निर्माण किया जाता है। इसके 5(पांच) कोण होते हैं। इसे स्वस्तिक यंत्र, पंच शिखा या पंचानन भी कहा जाता है। यह चिन्ह सृष्टि की रचना का सूचक है। इसके 5 कोण पांच तत्वों - पृथ्वी, जल, आकाश, वायु, अग्नि - के द्योतक हैं। महा उग्र तारा यंत्र भी 5 कोणीय या शिखा वाला होता है। इस यंत्र को जटा शंकरी भी कहा जाता है। मुख्यत: इसका प्रयोग अध्र्य स्थापना व देव स्थल के मुख्य दीया जलाने के समय किया जाता है। इसे निर्मित कर इसके ऊपर मुख्य दिये को रख दिया जाता है। 
(द) सरस्वती या श्री यंत्र देवी चौकी 2 (दो) समत्रिबाहु त्रिभुजों को एक दूसरे के विपरीत तथा ऊपर बैठाकर किया जाता है। इसमें 6 भुजाऐं तथा 6 कोण होते हैं। यह काली या नवदुर्गा पूजन के कार्य में निर्मित होती है।

महालक्ष्मी चौकी - 
इस चौकी का निर्माण 9(नौ) बिन्दुओं द्वारा किया जाता है। सरस्वती चौकी अथवा अष्टदल कंवल की ही भांति होती है। अन्तर मात्र यह होता है कि चौकी के चारों ओर दो पाँवों की छाप बनाई जाती है। इसका आयोजन इस प्रकार होता है कि पाँवों की छाप एक अलंकृत बेल की तरह दृष्टिगोचर होती है। कहीं-कहीं कोई परिवार 8(अष्ट) कोणीय कमल का निर्माण करते हैं।

जनेऊ पीठ - 
जनेऊ पीठ या यंत्र का निर्माण षट्कोण के अन्दर प्रत्येक भुजा पर आठ (8) बिन्दुओं का अंकन किया जाता है। इसी प्रकार मध्य भाग में बराबर दूरी में तथा समानान्तर 8 बिन्दुओं का अंकन किया जाता है। मध्य भागीय बिन्दुओं को रेखा द्वारा इस प्रकार जोड़कर व्यवस्थित किया जाता है कि रचना 7 श्री यंत्रों की छटा लिए हुए प्रकट होती है। इन्हें सप्तॠषि मण्डल कहा जाता है। यह हैं कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र तथा वशिष्ठ। इस सम्पूर्ण यंत्र के शीष में मुकुट तथा दाईं व बाईं तरफ 2-2 हाथ अथवा कांगें तथा चरण पीठ बनाई जाती है। इस यंत्र को मां गायत्री देवी के रुप में चतुर्भुजी माना जाता है। इस यंत्र का निर्माण जनेऊ या उपनयन संस्कार के समय अत्यावश्यक होता है।

शिव पीठ यंत्र - 
इस यंत्र स्वरुप अल्पना का आलेखन 12न्12 बिन्दुओं द्वारा, दूसरे प्रकार में 16न्16 बिन्दुओं द्वारा किया जाता है। बाह्य धरातल को कुण्डी (ताम्र पात्र) के स्वरुप में अंकित किया जाता है। ईषाण व ऊषाण का अंकन होता है। यह श्रावण मास में शिव पूजन हेतु बनाई जाती है।

सूर्य चौकी - 
इसका निर्माण नामकरण संस्कार के बाद नव शिशु को बाहर प्रकाश में लाये जाने पर किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसका निर्माण सूर्य व्रत के उपलक्ष्य में रविवार को पौष माह में भी किया जाता है। इसमें चन्द्र, सूर्य, शुक्र (विष्णु-लक्ष्मी), अठ जल (अष्ट कोणीय यंत्र), शंख, घंटा, कुण्डी या चक्र आसन, आरती, गड़ु़वा, धूपदान पुन: आसन निर्मित किया जाता है।

स्यो - 
नामकरण संस्कार के बाद छटी का चाक विसर्जन करने नौला जाते हैं। तब आंगन में स्यो का चित्रांकन अल्पना द्वारा होता है। ब्राह्मणों तथा साहों में अलग-अलग प्रकार का स्यो बनता है। ब्राह्मणों में कमल दलो का सिंहासन सदृश स्यो निर्मित होता है। सबसे नीचे 5 कमल पंखुड़ियाँ निर्मित की जाती है, उनके स्वर 4,3,2,1 के हिसाब से निर्माण होता है। ऊपर शीर्षमुकुट नीचे पद वेदी बनती है। साहों में स्यो कलश या गडुवे के रुप में बनता है।

नाता - 
साहों में नातों का निर्माण व मान्यता विशिष्ट है। नाते दो समय अथवा कालों में बनाये जाते हैं। इनका अलंकरण व रेखांकन केवल चूल्हे या भोजन कक्ष में होताहै। जो नाते चैत्र मास में बनाये जाते हैं उन्हें चैतु नाता कहते हैं। इसके बाद दीपावली में नातों को बनाया जाता है। यह भी ऐपण का प्रकार है जो केवल पीली मिट्टी के धरातल पर बिस्वार से अंकित किया जाता है। बाईं और विशिष्ट शैली में अंगुलियों की पोरों से 3 मानवीय आकृतियां बनाई जाती हैं जिनके हाथ एक दूसरे के हाथों को पकड़े हुए बनाये जाते हैं। दाईं ओर लक्ष्मी व नारायण का नाता रेखांकित किया जाता है जो पवित्रता व धन धान्य दाता व पालककर्त्ता समझे जाते हैं। मध्य में धान की बालियों के प्रतीक चिन्हों के अंकन द्वारा परिवार के सदस्यों तथा निकट सम्बन्धियों की संख्या दर्शाई जाती है। यह एक प्रकार से सम्मिलित परिवार की सदस्य संख्या का लेखा जोखा अंकित करता है। यह दो प्रकार से बनाये जाते हैं (अ) अल्मोड़ा शैली (ब) बागेश्वर शैली।

धुँया - 
इसका आलेखन दीपावली के दिन अमावस्या के बाद बड़ी एकादशी (12 दिन के बाद) को किया जाता है। इसे बूढ़ी दीपावली कहते हैं। इसका आलेखन सूप में किया जाता है। इसकी कल्पना सूप से समान पंख युक्त पक्षी की होती है। कुछ लोग गरुढ़ आरुढ़ नारायण की बात इसके लिए कहते हैं। मान्यता है कि पारिवारिक क्लेश, दरिद्रता को दूर करने की कल्पना से इनका निर्माण होता है।

धूलि अध्र्य की चौकी - 
यह कमल के आकार की अल्पना है। इसका कलेवर गड़ु़वा (टोंटीदार कलश) की तरह अंकित किया जाता है। केन्द्र स्थल यज्ञ वेदी के समतुल्य अंकित किया जाता है। आड़ी तिरछी चार रेखाऐं बनाई जाती हैं, जो अरणी-भरणी यज्ञ काष्ठ की द्योतक होती है। इसका फैलाव केन्द्र स्थल से बाहर की ओर बढ़ता जाता है। अंकन के लिए कमल दल के प्रधानता दी जाती है। इसका स्वरुप गोलाई लिये हुए कलश की तरह बनाया जाता है। दोनों ओर 2-2 हाथ की तरह फांगे अलंकृत हाथी की सूँड की तरह बनाये जाते हैं। इनके अन्तिम सिरे पर गगरी बनाई जाती है। यह विष्णु स्वरुप पवित्र समझा जाता है। शीर्ष के मुकुट व नीचे पाँवों की ओर पाठ निर्मित की जाती है। इसमें विष्णु प्रतीक शंख, चक्र, गदा, पद्म अंकित किये जाते हैं। विवाह की र सर्वप्रथम इसी से प्रारम्भ होती है। कन्या का पिता वर का स्वागत, चरण प्रक्षालन व अध्र्य दान संकल्प सहित, वर को इसी चौकी पर खड़ा करके कन्या का दान करता है तथा भेंट देता है।

अब उन चित्रांकनों का विवरण दिया जा रहा है जिनमें चावल पिष्ठिका घोल व गेरु का प्रयोग नहीं किया जाता वरन् विभिन्न रंगों - लाल, चटख लाल, हरा, पीला, नीला, बौजनी, काला व सफेद - को प्रयोग में लाया जाता है।

मुहाली, द्वार मातृ, माई तथा विजन - 
इनका निर्माण विवाहोत्सव में मुख्य द्वार के सौन्दर्यीकरण के लिये किया जाता है। माई, विजन व द्वार मातृ बुरी दृष्टि व अशुभ को दूर करने की कामना से चित्रित किये जाते हैं।

विवाह का ज्यूति पट्टा - 
इसमें महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती केन्द्र में बनाई जाती है। इनके साथ गणेश, सूर्य, चन्द्र व 16 मातृकाएं अंकित की जाती है। इन्हें चौकोर रेखिकीय चौखट में अंकित कर बाहर की ओर मछिया सिंगालिया अथवा खोडस वरों से अलंकृत किया जाता है। शीर्ष पर बड़े हिमालय व छोटे हिमालय का अंकन किया जाता है। इन सबके शीर्ष पर 'हलयाली बोट' - हरा पेड़ जो कल्पतरु माना जाता है, कमल (8 पंखुडियों वाला), शुक - सारिका (लक्ष्मी-नारायण) व दो हरे तोतों का निर्माण किया जाता है। राधा कृष्ण का चित्रांकन मनुष्याकृति में किया जाता है। शुकसारिका, शेष नाग की शय्या में लेटे हुए विष्णु व चरणों के पास लक्ष्मी तथा नाभि से उत्पन्न कमल पर ब्रह्मा की कल्पना को विशिष्ट रेखाओं द्वारा निर्मित किया जाता है। 

यज्ञोपवीत का ज्यूति पट्टा - 
इसका निर्माण विवाह ज्यूति की ही तरह होता है। मुख्य अन्तर यह है कि शीर्ष पर विष्णु-लक्ष्मी या कृष्ण-राधा की मानवीय प्रतिमा का रेखांकन नहीं होता। दूसरा अन्तर है शीर्ष पर बाईं ओर सप्त ॠषि मण्डल का जनेऊ पीरु की तरह बनाया जाता है तथा दाहिनी ओर छापरी (भिक्षा पक्ष का निर्माण) किया जाता है। मान्यता है कि 'गिरह जाग' पर बालक चुन्डित मुन्डित हो एक कौपीन मात्र पहनकर ब्रह्मचर्याश्रम में प्रविष्ट करता है तथा विद्या अध्ययन के लिए काशी में अपने गुरु के पास जाता है। ब्रह्मचर्याश्रम में भिक्षा द्वारा ही अपना व गुरु पोषण का दायित्व वहन करता है। अध्ययन के उपरान्त उसका उपनयन व यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है। अत: इस अवसर पर ज्यूति पट्टे की पूजा अर्चना की जाती है। 

छट्टी की ज्यूति व सामान्य ज्यूति - 
यह ज्यूति पट्टा भी विवाह ज्यूति पट्टे की तरह ही होता है। परन्तु इसमें शीर्ष पर लक्ष्मी नारायण या राधकृष्ण की मानवीय अवयवों से युक्त प्रतिमा का आलेखन नहीं किया जाता है। बाकी अलंकरण व स्वरुप का विन्यास अन्य ज्यूतियों की तरह ही किया जाता है।

ज्यूति मातृका चौकी - 
इसका निर्माण काष्ठ चौकी को हल्दी से रंग दिया जाता है। इसमें समस्त अलंकरण लाल रंग की रेखाओं द्वारा निर्मित किये जाते हैं। इसमें न तो किसी प्रकार के 'वर' बनाये जाते हैं और न 'छज्जा' बेल को बनाया जाता है। अन्य सभी प्रतीक व अलंकरण विवाह ज्यूति की तरह ही होते हैं। इसमें भी लक्ष्मी नारायण या राधा कृष्ण की युगल मानवीय आकृति नहीं बनाई जाती।

जन्माष्टमी का पट्टा या थापा - 
सर्वप्रथम शिव पार्वती बनाये जाते हैं। उसके उपरान्त दशावतार निर्मित किये जाते है। शिव की जटाओं से गंगा व यमुना का उद्गम निर्मित किया जाता है। इसके उपरान्त कृष्ण की विस्तृत लीलाएं दर्शायी जाती हैं। इनकी अभिव्यक्ति पूर्णत: सुखसागर, भागवत के अतिरिक्त ब्रह्मपुराण व विष्णुपुराण के अनुसार होती है। इसमें गोवर्धन धारण इत्यादि को अंकित किया जाता है। चारों ओर सुन्दर गौ पुच्छ लता निर्मित की जाती है।

हरशयनी पट्टा - 
इस थापे में विष्णु को शेषनाग की शैय्या पर लेटा हुआ तथा चरणों को दबाते हुए लक्ष्मी दर्शाई जाती है। क्षीरसागर का निर्माण किया जाता है। प्रतीक रुप से नीले गहन जल में मछली तथा कछुवा और नाभि से उत्पन्न कमल व उस पर चार मुख वाले ब्रह्म रेखांकित किये जाते है। चारों ओर घंटी या लगुली बेल बनाई जाती है।

हर बोधिनी पट्टा - 
इसे तुलसी विवाह के अवसर पर मात्र लाल रंग से निर्मित किया जाता है। यह एक प्रकार की चौकी होती है। इसे 12(बारह) बिन्दुओं से निर्मित किया जाता है। उसमें 4 भद व एक कँवल बनता है। इसे भी चारों ओर से सुन्दर लता व पुष्पों के निर्माण से भव्य रुप दिया जाता है। इसे 'बाल भद्र' के नाम से जाना जाता है। 

दूर्वाष्टमी और डोर दुवज्योड़ा पट्टा - 
इसमें सात रानिया, एक नौला (जल भरने का कूप), नौले में बच्चा बनाया जाता है। बच्चे के एक हाथ में माँ के गले में पड़े तागे को पकड़ रखा है। यह तागा डोर कहलाता है तथा हाथ में भुज दण्ड की तरह 3 पल्ले का धागा औरतें धारण करती हैं। इन्हें दुबज्योड़ा कहते हैं। यह एक प्रकार से स्रियों द्वारा जनेऊ की तरह पवित्र समझकर धारण किया जाता है। इन पर 2-2 चिड़ियाँ बैठाई जाती है। इसका निर्माण लोक कथा पर आधारित है।

ॠषिपंचमी व नागपंचमी पट्टा - 
इसमें वामनावतार (विष्णु) तथआ सप्त ॠषि बनाये जाते हैं। विशेष आकृति युक्त नाग जोड़े में होते हैं।

महालक्ष्मी का पट्टा - 
इसमें 3 छत्र बनाये जाते हैं। 8 पंखुड़ियों वाले कमल में चार भुजाओं वाली महालक्ष्मी को बनाया जाता है। बाईं तरफ के हाथों में चक्र व पद्म बनाया जाता है तथा दाईं तरफ के हाथों में त्रिशूल। नीचे 9 बिन्दु वाली सरस्वती चौकी या 'घृत कंवल' बनाया जाता है। लक्ष्मी के दोनों ओर दो-दो हाथी सूंड उठाकर जल कलश से लक्ष्मी का प्रक्षालन करते हैं। उसके नीचे दोनों ओर अठजल (जल कुण्ड आठ भुजाओं वाले) बनाये जाते हैं।

नवदुर्गा पट्टा - 
यह पट्टा साह वंश में ही प्रचलित है और कुमाऊँ की मान्यताओं, धार्मिक विश्वासों व अंकन शैली का प्रतीक है। इसमें मुख्यत: पीला, लाल, नीला, काला तथा हरा रंग प्रयोग में लाया जाता है। इसका धरातल पीला बनाया जाता है। उसके उपरान्त ही अन्य प्रतीक, आकृतियाँ तथा मंत्रों का आलेखन होता है। चौकोर या आयताकार पट्टे के चारों ओर सुन्दर किनारे का निर्माण किया जाता है। उसके उपरान्त ही मुख्य पट्टे का आलेखन प्रारम्भ होता है। इसका प्रयोग विशेषरुप से आश्विन मास की नवरात्रियों में भगवती पूजन व व्रत के लिए होता है।

कुमाऊँ में भिप्ति - 
चित्रण व अलंकरण की कोटि के अन्तर्गत वर-बूंद आते हैं, जो निम्न प्रकार के हैं - सूरजी वर, गुलाब चमेली वर, मुष्टि वर, अलमोड़िया खोडस, गलीची वर, विशिष्ट गलीचीवर, कटारी वर, 20 बिन्दु का संगलिया वर, 22 बिन्दु का संगलिया वर, 16 बिन्दु का भद्र वर, 19 बिन्दु का भद्र, स्वास्तिक फूल या 6 फूल वर, 24 बिन्दु का, 6 फूल वर, 22 बिन्दु का, घौर तिलक 37 बिन्दु का वर, हर हर मण्डल वर, 37 बिन्दु का नींबू वर, 9 (नौ) बिन्दु का मछिया वर, खोड्स वर या खोड्स वर, 22 बिन्दु का, खोड्स वर 24 बिन्दु का, खोड्स वर 6 बिन्दु का, खोड्स वर 12 बिन्दु का।

किसी भी समुदाय की संस्कृति और कला ही उस समुदाय की पहचान होती है। लेकिन आधुनिक समय में लोग धीरे-धीरे अपनी संस्कृतियों और परम्पराओं को भूलते जा रहे हैं। पुरानी संस्कृतियों और परम्पराओं को जीवित रखने के लिए ज़रूरत है हमें एक बार फिर से अपनी संस्कृति और परम्पराओं की तरफ़ लौटने की। आधुनिकता के दौर में अब धीरे धीरे गेरू और बिस्वार का स्थान पर सिन्थेटिक रंगो का प्रचलन बढ़ रहा है। इसका परिणाम है कि जो सुघड़ता गेरू की प्रष्ठभूमि में बिस्वार से होती है उनके स्वरूप में लोक तत्व का हृास हो रहा है। उत्तराखंड के शहरी इलाक़ों में यह लोक कला धीरे-धीरे ख़ात्मे की कगार पर है, जबकि ग्रामीण अंचलों में आज भी यह परम्परा काफ़ी समृद्ध है। 

इस लोक कला को जीवित रखने के लिए कई स्वयंसेवी संस्थाएँ काम कर रही हैं। कई संस्थाओं द्वारा समय-समय पर ऐपण कला सिखाने के लिए प्रशिक्षण शिविर लगाए जाते हैं। स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा ऐपण डिजाइन से तैयार उत्पादों को काफी पंसद किया जा रहा है। स्टेशनरी, फाइल कवर, फोल्डर, पेन स्टैंड, दुपट्टा, बैग, पूजा की थाली, नेम प्लेट, चॉबी का छल्ला, टी कोस्टर समेत अन्य कई उत्पादों को को ऐपण प्रिंट से तैयार किया जा रहा है। यहां तक की नए बन रहे भवनों की दीवारों पर टेक्चर की जगह ऐपण की डिमांड आ रही है। अगर ऐपण उत्पादों को राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा दिया जाये तो युवाओं के लिए ऐपण कला रोजगार का साधन बन सकती है।

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