‘लोकल से ग्लोबल’ बनाम गुरुदेव के ग्रामीण पुनर्निर्माण का मॉडल ‘श्रीनिकेतन’

मनोज पाण्डेय

विगत लगभग दो माह से पूरी दुनिया अपने-अपने तरीकों से लॉकडाउन में जी रही है। कुछ ही माह पहले तक उदारीकरण और वैश्विकरण को दुनिया की आवश्यकता बताने वाले अर्थशास्त्रियों एवं अर्थव्यवस्थाओं को आज यह देख कर न जाने किस प्रकार का एहसास हो रहा होगा जब वह भी अपनी छोटी-बड़ी सभी प्रकार की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए निहायत स्थानीय उत्पादों और सेवाओं पर स्वयं को निर्भर देख रहे होंगे। कहने का आशय है कि कोरोना संक्रमण ने बहुत कम समय में ही उपभोक्ताओं को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों/सेवाओं से बाहर निकालकर उन्हे पुनः स्थानीय उत्पादकों एवं बाजारों पर निर्भर बना दिया है। अतः कोरोना संकट ने हमें स्थानीय उत्पादन, स्थानीय बाजार और स्थानीय आपूर्ति श्रंखला के महत्व को समझा दिया है क्योंकि इस विश्वव्यापी संकट के समय में स्थानीय (लोकल) ने ही हमारी सबसे अधिक रक्षा की है।

इससे पूर्व दुनिया ने ऐसी अभूतपूर्व स्थिति का सामना नहीं किया था, जब बाजार से मांग और आपूर्ति दोनों नदारद हो। बाजार में न तो उपभोक्ता के पास क्रय-शक्ति है और न ही उत्पादक के पास उपभोक्ता वस्तुएं एवं सेवाएं उपलब्ध हैं। अतः इस ज्वलंत समस्या से देश की अर्थव्यवस्था को बाहर निकालने की जिम्मेदारी निभा रहे नीति-नियंताओं एवं सरकार के माथे पर चिंता की लकीरें खिचना स्वाभाविक है।

सरकार इस चुनौती का सामना करने के लिए तरह-तरह कि नीतियाँ बना रही है तथा प्रयोग कर रही है। लेकिन अभी भी एक सर्वहितार्थ एवं सर्वस्वीकार्य निर्णय प्रतीक्षित है। इसी कठिनाई को दृष्टिगत रखते हुए भारत की करोड़ों गरीब जनता को लॉकडाउन 03 की समाप्ति पर केंद्र सरकार के द्वारा राहत प्रदान करने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा बीस लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज की घोषणा की गयी है तथा देश की अर्थव्यवस्था को कोविड-19 के चंगुल से बाहर निकालने के लिए “लोकल से ग्लोबल” विचार को अपनाने की वकालत करते हुए ‘लोकल के लिए वोकल’ बनने का आह्वाहन किया गया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने विगत छः वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के लिए कई योजनायें बनायीं एवं लागू की हैं, उनमे स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, स्टैंडअप इंडिया तथा मेक इन इंडिया सभी में ‘लोकल के लिए वोकल’ का विचार प्रदर्शित होता है। यह विचार भारत के राष्ट्रगान के  रचियता तथा विश्व में एशिया को साहित्य के लिए प्रथम नोबेल पुरूस्कार दिलाने वाले ‘गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर’ के ग्रामीण पुनर्निर्माण के मॉडल ‘श्रीनिकेतन’ से प्रभावित प्रतीत होते हैं। पूरी दुनिया गुरुदेव को अंतर्राष्ट्रीयतावाद के समर्थक के रूप में जानती-पहचानती है जिन्होने सभी देशो की संस्कृतियों को एकजुट करने का विचार किया था परन्तु यह बात कम ही लोग जानते हैं कि गुरुदेव ने ही सर्वप्रथम “विचार वैश्विक और कृति स्थानिक” (थिंक ग्लोबल एक्ट लोकल) के सूत्र वाक्य से ‘ग्लोबल से लोकल’ का विचार भी प्रतिपादित किया था।

श्री मोदी ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के संकल्प को सिद्ध करने तथा देश को भावी चुनौतियों का सामना करने के लिए लैंड (भूमि), लिक्विडिटी (वित्तीय तरलता), लेबर (श्रम) और लॉ (कानून) का  समन्वित एवं समुचित उपयोग कर आर्थिक सुधार का मंत्र दिया है। लैंड (भूमि) के अंतर्गत भूमि सुधार से सम्बंधित कानूनों में व्यापक परिवर्तन किये जाने प्रस्तावित हैं जिसके तहत विकास परियोजनाओं के लिए भूमि की कमी न हो सके। लिक्विडिटी (वित्तीय तरलता) से आशय देश के वित्तीय बाजार में मुद्रा एवं साख का समुचित प्रवाह बनाये रखने से है। लेबर (श्रम) का अर्थ औद्योगिक एवं निर्माण इकाइयों को उनकी आवश्यकता के अनुसार कुशल श्रम की आपूर्ति बनाये रखने से है, तो लॉ (कानून) का तात्पर्य देशी अथवा विदेशी उद्यमियों के लिए देश में अपना कारोबार प्रारभ करने के लिए कडे कानूनों में शिथिलता प्रदान करने तथा लाल-फीताशाही को समाप्त कर एकल खिड़की व्यवस्था बनाने से है।

प्रधानमन्त्री की ‘लोकल के लिए वोकल’ होने की बात केवल आज की परिस्थितियों में ही नहीं वरन भारत जैसे गाँव के देश के समग्र एवं संतुलित विकास के लिए सर्वदा पूर्णतः समसामयिक एवं प्रासंगिक है। परन्तु आज के परिप्रेक्ष्य में ये चारों ही ‘ल’ (लैंड, लिक्विडिटी, लेबर और लॉ) देश की अर्थव्यवस्था को बडे उद्यमियों के हाथों सौपने की तैयारी से प्रेरित लगते हैं क्योंकि 1991 में जब देश में एल.पी.जी (उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण) की शुरुआत की जा रही थी तो उस समय भी मुख्यतः इन्ही क्षेत्रों में परिवर्तन किये गए थे और समाजवादियों द्वारा उक्त नीति का यह कहकर विरोध किया जा रहा था कि इस कारण ‘गाँवों’ के देश भारत में गांधी के ‘स्वदेशी आन्दोलन’ को ठेस पहुँच रही है। परन्तु जैसी की संभावना व्यक्त की जा रही हैं, यदि लैंड (भू सुधार) के नाम पर किसानों की जमीन का अधिग्रहण, लिक्विडिटी के नाम पर बडे उद्योगपतियों की ऋण माफ़ी, लेबर के अंतर्गत श्रम कानूनों का उद्योगपतियों के हित में परिवर्तन तथा लॉ (कानून) का बडे उद्यमियों एवं पूँजीपतियों की सुविधानुसार परिवर्तन हुआ तो ‘लोकल के लिए वोकल’ के विचार का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। अतः गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के अनुयायी तथा ‘विस्वा-भारती’ (शान्तिनिकेतन) के कुलपति, प्रधानमन्त्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को यह सुनिश्चित करना होगा कि ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान का वास्तविक उद्देश्य स्थानीय उत्पादक, स्थानीय उपभोक्ता एवं स्थानीय बाजार का कल्याण हो।

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