जनगीतों के नायक गिरीश चन्द्र तिवारी 'गिर्दा'

डॉ० एस० डी० तिवारी 

किसी कवि, लेखक या कलाकार के जीवन का सही लक्ष्य क्या है? कि वो तमाम तरह के साहित्यिक पुरुस्कारों से नवाजा जाए या फिर उसकी कविताएं पाठ्यक्रम की किताबों में शामिल कर ली जाएं या फिर कोई अध्येता उसकी कविताओं पर पीएचडी करें। लेकिन ऐसे व्यक्तित्व बिरले  ही होते हैं जिनकी अंतिम यात्रा में हजारों लोगों का सैलाब उसकी कविता एक स्वर में गाएं, रोते जाएं और गाते जाएं। जनकवि 'गिरदा' के बारे में कुछ भी लिख पाऊं ये मैं अपना सौभाग्य मानता हूँ, किन्तु 'गिरदा' जैसे व्यक्तित्व के प्रति मेरी लेखनी पूर्ण रूप से न्याय कर पाए यह असंभव है। 

गिरीश चन्द्र तिवारी 'गिर्दा' का जन्म 1945 में ज्योली हवालबाग में श्री हंसादत्त तिवारी तथा श्रीमती जीवन्ती तिवारी के घर पर हुआ। अपने ओज और अक्खड़पन के कारण वो 'गिरदा' नाम से लोकप्रिय हुए। उन्हें आजीविका चलाने के लिए क्लर्क से लेकर वर्कचार्जी तक का काम करना पड़ा। छठे दशक में पीलीभीत जिले में पीडब्ल्यूडी में नौकरी के दौरान 'गिर्दा' का सम्पर्क कवि सम्मेलनों के माध्यम से अनेक हस्तियों से हुआ। फिर संस्कृति और सृजन के संयोग ने कुछ अलग करने की लालसा पैदा की। अभिलाषा पूरी हुई जब हिमालय और पर्वतीय क्षेत्र की लोक संस्कृति से सम्बद्ध कुछ करने का अवसर मिला।

उन्होंने ‘अन्धायुग’, ‘अंधेरी नगरी’, ‘थैंक्यू मिस्टर ग्लाड’, ‘भारत दुर्दशा’ जैसे नाटकों का निर्देशन करने के साथ ही ‘नगाड़े खामोश हैं’ तथा ‘धनुष यज्ञ’ जैसे नाटकों का लेखन किया। कुमाउँनी-हिन्दी की ढेर सारी रचनाएँ लिखीं। गिर्दा ‘शिखरों के स्वर’ (1969), ‘हमारी कविता के आँखर’ (1978) के सह लेखक तथा ‘रंग डारि दियो हो अलबेलिन में’ (1999) के संपादक रहे साथ ही ‘उत्तराखण्ड काव्य’ (2002) की भी रचना की । ‘झूसिया दमाई’ पर उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण संकलन-अध्ययन किया था। उत्तराखण्ड के कतिपय आन्दोलनों में हिस्सेदारी की और कई बार गिरफ्तारी भी हुई।

वह लोक संस्कृति के इतिहास के ‘जीवित एनसाइक्लोपीडिया’ थे। लोक संस्कृति में कौन से बदलाव किन परिस्थितियों में आए इसकी तथ्य परक जानकारी उनके पास होती थी। कुमाऊंनीं लोक-गीतों झोड़ा, चांचरी में मेलों के दौरान हर वर्ष देशकाल की परिस्थितियों पर पारंपरिक रूप से जोड़े जाने वाले ‘जोड़ों’ की परंपरा को उन्होंने आगे बढ़ाया। बहुमुखी प्रतिभा के धनी 'गिरदा' लोकधुनों और लोकमंच के तो जानकार थे ही, उनके गीत चिपको आंदोलन, वन आंदोलन, नशा विरोधी आंदोलन, अलग राज्य के उत्तराखंड आंदोलन और नदी बचाओ आंदोलन की पहचान थे। वह अपनी कविताओं में तत्कालीन परिस्थितियों को जोड़ते हुए चलते थे। गिर्दा सबकी पहुंच में थे, कमोबेश सभी ने उनके भीतर की विराटता से अपने लिए कुछ न कुछ लिया और गिर्दा ने भी बिना कुछ चाहे किसी को निराश भी नहीं किया। 

 

गिरदा के गीत हमें ना सिर्फ देवभूमि से जोड़तें हैं बल्कि उनमें उनका अपनी मात्रभूमि के लिए असीम प्रेम को भी झलकता है-
आज हिमाल तुमन के धत्यूंछौ, जागौ-जागौ हो म्यरा लाल,
नी करण दियौ हमरी निलामी, नी करण दियौ हमरो हलाल।

'गिर्दा' से थोड़ी देर के लिए भी जो मिला, वह उन्हें कभी भुला नहीं सका। उनकी सादगी, विनम्रता तथा मेहनतकश जनता के प्रति सहानुभूति दिखावटी नहीं थी। मेहनतकश जनता के शोषण ने उनके भीतर एक आक्रोश को जन्म दिया। उत्तराखण्ड के जन-सरोकारों से जुडा, शायद ही कोई मुद्दा हो जो 'गिर्दा' की कलम से अछूता रहा हो। सरकारी व्यवस्था से उपजे गुस्से को तथा उत्तराखण्ड में हुए जनान्दोलनों को लेकर लिखे गये उनके गीतों में पीङा है, आह्वान है तथा उज्वल भविष्य की आस है। जहाँ भी जनसंघर्ष था गिर्दा उन सभी जगहों पर कवि, गायक और नायक के रूप में अनिवार्य रूप से विद्यमान रहे। 
सारा पानी चूस रहे हो, नदी-समन्दर लूट रहे हो। 
गंगा-यमुना की छाती पर, कंकड़-पत्थर कूट रहे हो।। 

साहित्य-संस्कृति की प्रगतिशील विरासत को गहराई से आत्मसात् कर उसका सृजनात्मक विकास करते हुए, उसे समृद्ध बनाते हुए उसका उपयोग जनता को जगाने, उसमें उत्साह का संचार करने और संगठित होकर एक समतामूलक समाज के निर्माण हेतु उसे प्रेरित करने का काम उन्होंने बखूबी किया। उनके गीतों ने एक छोटे से कालखंड के लिए ही सही, सत्ताओं को हिलाने वाले गीतों के इतिहास को नए सिरे से जिंदा किया। 1977 में केंद्र सरकार की नौकरी में होने के बावजूद वह वनांदोलन में न केवल कूदे वरन उच्च कुलीन ब्राह्मण होने के बावजूद ‘हुड़का’बजाते हुए सड़क पर आंदोलन की अलख जगाकर औरों को भी प्रोत्साहित करने लगे। उनके हाथ में जब हुड़का होता था, वह महज एक बाजा नहीं बल्कि मशाल बन जाता था। हुड़के की थाप पर प्रकट होते इस इंकलाब ने न जाने कितने अभियानों में जनचेतना की कौंध पैदा की और पहाड़ के चप्पे-चप्पे को झकझोरा। जनता के बीच आशा का संचार करता उनका यह गीत आने वाले कई पीढियों तक आन्दोलन गीत बन कर गाया जाता रहेगा-
जैंता एक दिन त आलो ये दुनी में
चाहे हम ने ल्या सकूं, चाहे तुम नि ल्या सको
जैंता क्वै न क्वै त ल्यालो, ये दुनी में
जैंता एक दिन त आलो ये दुनी में……

गिरदा कहते थे उत्तराखंड में संसाधन हैं, लेकिन सरकार के पास विजन ही नहीं। लोग ही नहीं रहेंगे तो संस्कृति भी नहीं बचेगी। हमारा राज्य कैसा होगा इसका नक्शा तो गिर्दा ने पहले ही बना लिया था। कहते थे उत्तराखंड जो नया राज्य बनेगा उसका मुकुट हिमालय होगा। धौलीगंगा के किनारे-किनारे बड़ा कैलाश और छोटा कैलाश होंगे। गिर्दा के सपनों का उत्तराखंड का नक्शा अब तक नहीं उतरा। खीजकर तब गिर्दा कहते थे-
बात यो आजै कि न्हेति पुराणि छौ, छांणि ल्हियो इतिहास लै यै बताल,
हमलै जनन कैं कानी में बैठायो, वों हमरै फिरी बणि जानी काल।

 

यशपाल समिति की रिपोर्ट "शिक्षा बिना बोझ के" तथा राष्ट्रीय पाठ्य चर्या की रूपरेखा 2005 के मूलभूत सिद्धांतों से मेल खाती हुई यह कविता उनकी गहरी और व्यापक सोच का चित्रण करती है-  
जहाँ न बस्ता कंधा तोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा।
जहाँ न पटरी माथा फोड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा।
जहाँ न अक्षर कान उखाड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा।
जहाँ न भाषा जख़्म उघाड़े, ऐसा हो स्कूल हमारा।

एक महान जनकवि, आंदोलनकारी, गायक और कलाकार के रूप में हमेशा जनता के बीच रह कर उनकी आवाज बने, उनके लिए संघर्ष किया और संघर्ष भी ऐसा जिसने उत्तराखंड राज्य निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गिर्दा ने जनपक्षधरता और जन सरोकारों की जो लौ जलाई है, वह एक अखण्ड ज्योति बन हमेशा जलती रहेगी। गिर्दा के जाने से उत्तराखण्ड के विज्ञ समाज में जो रिक्तता उत्पन्न हुई है, वह कभी भरी नहीं जा सकेगी।

गिर्दा को याद करते हुए तो ख़ुद मशहूर लोकगायक और उत्तराखंड राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभा चुके नरेंद्र सिंह नेगी कहते हैं- "हम सब तो कवि थे। मंचों पर गाते थे। गिर्दा सड़कों का कवि था। उनका मंच और श्रोता जैसे पूरा उत्तराखंड था।"

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