नई शिक्षा नीति से रचनात्मक सोच, तार्किक निर्णय और नवाचार की भावना को मिलेगा बल - प्रो० एन० के० जोशी  

केंद्रीय मंत्रालय ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 को पास कर दिया है। इसमें स्कूली और उच्च शिक्षा में व्यापक बदलाव किया गया है। कुछ मुख्य बातों, और उनका छात्रों और शिक्षण संस्थानों पर होने वाले असर के सन्दर्भ में कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल के कुलपति एवं ख्यातिप्राप्त शिक्षाविद प्रो० एन० के० जोशी से बातचीत की गई। पेश है बातचीत के मुख्य अंश –

सवाल : एक शिक्षाविद की दृष्टि से आप नई शिक्षा नीति को कैसे देख रहे हो?
जवाब : शिक्षा नीति किसी भी राष्ट्र की मूलभूत आवश्यकता होती है जिसमें अतीत का विश्लेषण, वर्तमान की आवश्यकता तथा भविष्य की संभावनाएं निहित होती है। हम अभी नई सदी के शुरुआती दौर में है और संयोग से बहुत सारा घटनाक्रम भी हमारे पक्ष में है, जिनका लाभ हम अपनी कमजोरियों को दूर करने और सामाजिक-आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए शिक्षा के जरिए बड़े बदलाव आयोजित कर ला सकते है। नई नीति को 21वीं सदी की जरूरतों को देखते हुए काफी लचीली और बहु-विषयक शिक्षा प्रणाली के लिए तैयार किया गया है। इसके जरिए हर छात्र की विशेष क्षमता का सदुपयोग किया जा सकेगा। मैं एक शिक्षक होने के नाते नई शिक्षा नीति को नई और व्यापक शुरुआत के तौर पर देख रहा हूं। अगर सभी प्रावधानों पर समय पर और ईमानदार प्रतिबद्धता के साथ अमल किया गया तो नई शिक्षा नीति सार्थक प्रभाव डालने वाली है। 

सवाल : क्या नई शिक्षा नीति जरूरी थी ?
जवाब : देश में पहली शिक्षा नीति 1968 में तैयार की गई। उसके बाद 1986 में राजीव गांधी सरकार के दौरान दूसरी शिक्षा नीति बनाई गई। जिसमें कंप्यूटर के प्रयोग पर बल दिया गया। बदलते वक्त की जरूरतों को पूरा करने के लिए, शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए, इनोवेशन और रिसर्च को बढ़ावा देने, 21वीं सदी की संभावनाओं और जनमानस की आकांक्षाओं को देखते हुए एक प्रभावी शिक्षा नीति बनाए जाने की जरूरत थी। देश के चुनिदा शिक्षाविदों व शिक्षा के प्रशासकों ने कड़ी मेहनत और अनुसंधान के बाद नई शिक्षा नीति तैयार की है। यह शिक्षा जगत में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाएगी।

 

सवाल : नई शिक्षा नीति के प्रमुख बिंदु क्या है ?
जवाब : नई शिक्षा नीति में तीन बिंदु हैं जो भारत को सुपर पावर बनने में मदद करेंगे: वे है क्वालिटी, इनोवेशन और रिसर्च। नई शिक्षा नीति में केंद्र व राज्य सरकारों के सहयोग से शिक्षा क्षेत्र पर जीडीपी के 6 फीसद हिस्से के बराबर निवेश का लक्ष्य, शैक्षिक पाठ्यक्रम को 5+3+3+4 प्रणाली पर विभाजन, तकनीकी शिक्षा को प्रोत्साहन, भाषा की बाध्यताओं को दूर करना, दिव्यांग छात्रों एवं महिलाओं के लिए शिक्षा को सुगम बनाने पर बल है। वर्तमान की रटंत एवं बोझिल होती जा रही शिक्षा के स्थान पर रचनात्मक सोच, तार्किक निर्णय और नवाचार की भावना को सम्मिलित किया गया है। 

सवाल : ये 5+3+3+4 प्रणाली क्या है ?
जवाब : नई शिक्षा नीति में 10+2 के फार्मेट को पूरी तरह खत्म कर 5+3+3+4 फार्मेट में ढाला गया है। अब स्कूल के पहले पांच साल में प्री-प्राइमरी स्कूल के तीन साल और कक्षा 1 और कक्षा 2 सहित फाउंडेशन स्टेज शामिल होंगे। फिर अगले तीन साल को कक्षा 3 से 5 की तैयारी के चरण में विभाजित किया जाएगा। इसके बाद में तीन साल मध्य चरण (कक्षा 6 से 8) और माध्यमिक अवस्था के चार वर्ष (कक्षा 9 से 12)। अथार्त अब बच्चे 6 साल की जगह 3 साल की उम्र में फ़ॉर्मल स्कूल में जाने लगेंगे और प्ले-स्कूल के शुरुआती साल भी अब स्कूली शिक्षा में जुड़ेंगे।  नई शिक्षा नीति में बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा की एक मजबूत बुनियाद को शामिल किया गया है जिससे आगे चलकर बच्चों का विकास बेहतर हो।

सवाल : नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षण के क्या प्रभाव आप देख रहे है जबकि अंग्रेजी छायी हुई है ?
जवाब : बेहतर शैक्षिक संवाद के लिए मातृभाषा बहुत महत्वपूर्ण है। शिक्षा को अपने समाज के अनुरुप संचालित करने और अपनी भाषाओं में शिक्षण करने से ज्ञान के नए क्षैतिजों का विस्तार होता हैं। नवाचार के नए-नए आयाम उभरते है। मातृभाषा हमें दूसरों के विचारों, भावों और भाषाओं को सीखने व समझने में सहज रूप से समर्थ बनाती चलती है। दुनिया भर के अनुभवजन्य साक्ष्य इस तथ्य को पुष्ट करते हैं कि छोटे बच्चे उस भाषा में सबसे अच्छा सीखते हैं जिससे वे परिचित हैं। अगर स्कूल की भाषा तथा घर की भाषा एक जैसी है तो बच्चों के लिए स्कूल जाना और आसान हो जाता है। नई शिक्षा नीति में जो सबसे अहम कदम है वह मातृभाषा को लेकर लिया गया निर्णय है। त्रिभाषा फार्मूला नयी शिक्षा नीति को नए क्षैतिज प्रदान करने वाला साबित होगा।

सवाल : नई शिक्षा नीति में मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम लागू किया गया है। इसका क्या मतलब है? 
जवाब : इसका मतलब यह है कि अगर कोई छात्र किसी वजह से बीच में पढ़ाई छोड़ देता है तो वह बाद में भी उसे जारी रख सकता है। विद्यार्थी यदि चाहे तो एक साल बाद शिक्षा छोड़ सकता है और उसे सर्टिफिकेट प्रदान किया जाएगा, यदि दो साल बाद छोड़ता है तो उसे डिप्लोमा दिया जाएगा, तीन साल बाद छोड़ता है तो उसे डिग्री प्रदान की जाएगी और चार वर्ष पूरा करने पर ऑनर्स की डिग्री दी जाएगी। चार वर्ष का ग्रेजुएशन कोर्स सिर्फ मास्टर्स एवं रिसर्च में रुचि रखने वाले के लिए जरूरी होगा। मल्टीपल एंट्री थ्रू बैंक ऑफ क्रेडिट के तहत छात्र के फर्स्ट, सेकंड ईयर के क्रेडिट डिजीलॉकर के माध्यम से क्रेडिट रहेंगे। जिससे कि अगर छात्र को किसी कारण ब्रेक लेना है और एक फिक्स्ड टाइम के अंतर्गत वह वापस आता है तो उसे फर्स्ट और सेकंड ईयर रिपीट करने को नहीं कहा जाएगा। छात्र के क्रेडिट एकेडमिक क्रेडिट बैंक में मौजूद रहेंगे। ऐसे में छात्र उसका इस्तेमाल अपनी आगे की पढ़ाई के लिए करेगा। 

सवाल : नई शिक्षा नीति युवाओं के लिए किस तरह फायदेमंद होगी?
जवाब : नई शिक्षा नीति में स्कूली पढ़ाई के साथ-साथ वोकेशनल ट्रेनिंग और एक्स्ट्रा करीकुलर एक्टिविटीज़ को भी अहमियत दी जाएगी जिससे छात्रों के पूर्ण विकास में मदद मिलेगी और रोजगार के नए अवसर भी खुलेंगे। इसके अलावा स्कूलों में कला, वाणिज्य, विज्ञान स्ट्रीम का कोई कठोर पालन नहीं होगा, छात्र अब जो भी पाठ्यक्रम चाहें, वो ले सकते हैं। उच्च शिक्षा में विद्यार्थी को विषयों के चयन की छूट और मल्टीपल एग्जिट सिस्टम विद्यार्थियों को आत्मनिर्भर बनाएगा। "प्रेक्टिकल एप्लीकेशंस ऑफ नॉलेज" और "वर्कशॉप ट्रेनिग" विद्यार्थियों के कौशल विकास में सहायक सिद्ध होगी।

सवाल : नई शिक्षा नीति से कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में किस प्रकार के परिवर्तन देखने को मिलेंगे?
जवाब : नई शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा के तहत ग्रेडेड अटॉनोमी की बात कही गई है, जिसमें विश्वविद्यालयों के ऊपर से बोझ को कम किया जाएगा और कॉलेज को भी अकादमिक, प्रशासनिक और आर्थिक स्वायत्तता दी जाएगी। इस नीति के तहत विश्वविद्यालय को परिभाषित करें तो कई तरह के संस्थान होंगे, जो शिक्षण और शोध को बराबर महत्व देने वाले होंगे। प्राथमिक तौर पर स्वायत्त डिग्री देने वाला कॉलेज उच्चतर शिक्षा के एक बड़े बहु विषयक संस्थान को संदर्भित करेगा। वहीं कॉलेजों को ग्रेडेड स्वायत्तता देने के लिए एक चरणबद्ध प्रणाली स्थापित की जाएगी। कालांतर में धीरे-धीरे सभी महाविद्यालय या तो डिग्री प्रदान करने वाले स्वायत्त महाविद्यालय बन जाएंगे या किसी विश्वविद्यालय के अंग के रूप में विकसित होंगे। शिक्षा की कई रेगुलेटरी बॉडी जैसे कि यूजीसी, एआइसीटीई, एनएएसी व एनसीटीई का समावेश कर भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (हॉयर एजुकेशन काउंसिल ऑफ इंडिया) का गठन किया जाएगा। राष्ट्रीय अनुसंधान फाउंडेशन (एनआरएफ) की स्थापना से राष्ट्र में गुणवत्तायुक्त अनुसंधान को सही रूप में विकसित किया जा सकेगा। 

सवाल : नई शिक्षा नीति हेतु किन चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है?
जवाब : सबको शिक्षा, सस्ती शिक्षा, कौशल विकास वाली शिक्षा मुहैया कराने वाली इस नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में तमाम खूबियां हैं, लेकिन इसका क्रियान्वयन बड़ी चुनौती होगी। किसी देश की शिक्षा प्रणाली की बुनियाद वहां के शिक्षक होते हैं। देश में कुशल शिक्षकों की कमी है। उनको प्रशिक्षित करने के मानदंड तय करने होंगे। 
मैं समझता हूं कि दुनिया में सबसे युवा मानव संसाधन हमारे पास है। दुनिया के कई देशों की जितनी कुल आबादी है, उतने हमारे यहां हर साल ग्रेजुएट पैदा होते हैं। अगर हम अपनी नई शिक्षा नीति के बूते इस अपार संपदा को सहेज और संवार सके तो निश्चित ही भारत को ज्ञान की महाशक्ति एवं विश्वगुरु के रूप में स्थापित कर पायेंगे।

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