कोरोना संकट : बदलने लगा है लोगों का नजरिया

प्रो. अतुल जोशी

“परिवर्तन समाज का एक आवश्यक नियम है”। उसकी गति एवं तीव्रता विविध परिस्थितियों एवं कालखंडों में अलग अलग होती है। यह तीव्रता कभी अदृश्य होती है तथा लम्बे समय बाद उसका प्रभाव दिखाई देता है परन्तु कुछ परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जिनमे परिवर्तन की गति अति तीव्र होती है और उसका तात्कालिक प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। पूरी मानव जाति पर कोरोना काल २०२० के विगत छह माह एक महामारी का रूप लेकर उभरे हैं। इतने कम समय में ही पूरी दुनिया के प्रत्येक देश में व्यक्ति और समाज की जीवन शैली में जितनी तेजी से परिवर्तन हुआ है और जिस तरह से पूरी दुनिया भय और संशय के साए में जीने को विवश हुई है, ऐसा कालचक्र शायद ही इससे पूर्व  दुनिया ने देखा होगा जब एक अदृश्य वायरस मात्र कुछ ही माह में दुनिया के प्रत्येक देश को अपनी गिरफ्त में लेकर उनका एकमात्र सर्वशक्तिमान नियंत्रक बन बैठा हो। यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा कि जिस प्रकार विज्ञान के नियम के आधार पर कोई भी घटना, वस्तु अथवा भावनाएं तटस्थ नहीं होती हैं उसी प्रकार कोरोना का प्रभाव भी तटस्थ या एकतरफा नहीं है। अतः कोरोना के नकारात्मक प्रभावों के साथ-साथ उसके कुछ महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभावों का भी विश्लेषण आवश्यक है।

इस समयावधि में दुनिया के लगभग तीन लाख लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा है, जिसमे 2,24,106 मृतक दुनिया के छह विकसित देशों (संयुक्त राज्य अमेरिका – 85,197, ब्रिटेन – 33,998, इटली – 31,610, स्पेन – 27,459, फ्रांस के 27,529, तथा ब्राज़ील – 14,962) से सम्मिलित थे जोकि पूरी दुनिया के कोरोना वायरस के संक्रमण से मृत संख्या के लगभग 75 प्रतिशत के बराबर थे। दूसरी ओर दुनिया के दो देश भारत (1 अरब 37 करोड़) तथा चीन (1 अरब 43 करोड़) जो दुनिया की कुल आबादी (7 अरब 80 करोड़) का लगभग 36 प्रतिशत जनसँख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं, में अद्ध्तन केवल 2.4 प्रतिशत (7287) मौतें ही हुईं हैं। कोरोना महामारी के विस्तार एवं प्रभाव का विश्लेषण करने पर स्थिति और भी साफ़ हो जाती है कि इसकी जद में तथाकथित विकसित देश ही अधिक आये हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि इस अदृश्य वायरस ने जिसके जीवित होने पर भी संशय है उसने अपना पहला और सबसे बड़ा निशाना उन व्यक्तियों, समाजों, अर्थव्यवस्थाओं, सभ्यताओं को बनाया है जो अपनी पूँजी, शिक्षा, तकनीकी एवं प्रोद्योगिकी विकास, आर्थिक सम्पन्नता, स्वच्छता एवं पर्यावरणीय जागरूकता आदि मानकों पर स्वयं को समृद्ध मानते हुए अभिमान करते रहे हैं जबकि भारत सहित दुनिया के अनेकों देश जो गरीबी, कुपोषण, जनसँख्या विस्फोट, अशिक्षा, प्रदूषण, स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव जैसी समस्याओं से ग्रस्त हैं, वहां पर कोविड-19 का प्रभाव तुलनात्मक रूप से बहुत कम रहा है।

 

जब हम कोरोना के वर्तमान प्रभावों का विश्लेषण करने का प्रयास करते है तो सर्वप्रथम मानव जीवन पर उसके प्रभावों खतरों की समीक्षा करना आवश्यक है। एक महत्वपूर्ण बात जो कोरोना संक्रमण के प्रभाव से सम्बंधित एवं पुष्ट है, कि इस महामारी ने वैश्विक स्तर पर मनुष्य को अपने घर के अन्दर बंद रहने के लिए विवश कर दिया है। इसने देश-दुनिया के समाजों और सरकारों की तो दूर, मानव जाति के आपसी संबंधों की भी नयी तरह से विवेचना शुरू कर दी है। कुछ ही महीनों में हम हाथ मिलाने, साथ-साथ भोजन करने, पूजा करने, बैठने, खेलने, पढ़ने, यात्रा करने आदि जैसे दैनिक जीवन शैली से सम्बंधित व्यवहारों में बड़े परिवर्तनों को स्वीकार करने लगे हैं, जिनकी शायद किसी ने भी कल्पना भी नहीं की होगी। कोरोना महामारी के आने से पहले जिस प्रकार धार्मिक आयोजनों, मेलों, त्योहारों, उत्सवों, विवाह, जैसे पर्वों एवं अवसरों की प्रतीक्षा रहती थी तथा सामाजिक मेलमिलाप प्रदर्शित होता था, वह अब लम्बे समय के लिए हमारी जीवन शैली से दूर हो जाने वाला है। कोरोना के कारण मृत व्यक्ति की देह के अंतिम संस्कार के लिए लोगो की कमी तो खलने भी लगी है।

 

मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, चर्च आदि सभी धार्मिक आस्थाओं के केन्द्र एवं पूजाघर इस कोरोना काल में न केवल बंद पडे़ हैं।  भारत में इस दौरान चाहे रामनवमी के ब्रत हो या अयोध्या में रामलला की प्राण-प्रतिस्था,  रमजान के पवित्र महिने में मस्जिदों से अजान हो या गुड फ्राइडे की प्रार्थना-सभा या फिर सिखों के लिए नये साल के आगमन का पर्व बेसाखी में गुरूवाणी ही क्यों न हो, मंदिरों, मस्जिदों, चर्चों एवं गुरूद्वारों से ध्वनि विस्तारकों की मदद से कीर्तन, अजान, प्रार्थना एवं गुरूवाणी की आवाजें नदारत रहीं। बद्री-केदार धाम के पट बिना श्रद्धालुओं के खोल दिए गए। लेकिन इसके बावजूद मनुष्य में जीवन के प्रति यह भाव बढ़ता जा रहा है कि जीवन बहुत छोटा है, केवल धन एवं भौतिक संसाधनों के संग्रहण की प्रवृत्ति एवं लालसा सफल जीवन की अंतिम कसौटी नहीं हो सकती। मानव मन में आध्यात्मिकता, दया एवं करूणा का भावना बलवती होने लगी है।

 

दुनिया भर में लॉकडाउन के चलते कोरोना काल का पर्यावरण पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। आसमान का नीला रंग और रात में चमकते चाँद-सितारे एकदम साफ नजर आने लगे हैं।  नदियाँ,, तालाब, पोखर, नहरें, ही नहीं पाकिस्तान से तिब्बत तक फैले भारतीय हिमालय क्षेत्र के वे पर्वत शिखर जो पहाड़ों से भी नहीं दिखाई देते थे, अब मैदानों से भी स्पष्ट दिखाई देने लगे हैं। गंगा-यमुना नदियों की सफाई का जो कार्य दशकों से हजारों करोड़ रूपये पानी की तरह बहाकर और भ्रष्टाचार की भैंट चढ़ कर भी संभव न हो सका वह कोरोना काल में परवान चड़ने लगा है। विषेली गैसों से पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली फैक्ट्रियों तथा सड़कों पर वाहनों के बंद होने के कारण शहरों की हवा बेहद साफ हुई है। वायु प्रदूषण के साथ-साथ ध्वनि प्रदूषण भी बेहद कम स्तर पर आ गया है। कोरोना काल में वायुमंडल में ओजोन पर्त को नष्ट करने वाले पदार्थों की कमी के कारण ओजोन  पर्त की क्षरण दर में तेजी से गिरावट आई है। सड़कों पर वाहनों के कम चलने से सड़क दुघर्टनाओं में भी अप्रत्याशित कमी हुई है।

 

पशु-पक्षी अब गाँव, शहरों तथा मुख्य एवं सम्पर्क मार्गों तक बिना किसी भय के स्वच्छंद विचरने लगे हैं। गंगा में डाल्फिन भी दिखाई देने लगी है। विलुप्तप्राय प्रजाति के पशु-पक्षी भी नजर आने लगे हैं तथा परिवेश चिड़ियों की चहचहाट से गुंजायमान हो उठा है। घर-आँगन में कई तरह की तितलियाँ  मडराने लगी हैं। इस प्रकार कोरोना काल जो मानवता के लिए काल का पर्याय बनकर आया है उसका सबसे बड़ा सकारात्मक पक्ष यह है कि उसने पृथ्वी की आयु कई वर्ष बड़ा दी है।  इस सम्बन्ध में कैलिफोर्निया के स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय में ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के प्रोफेसर रॉब जैसन का यह कथन महत्वपूर्ण  है कि ‘कार्बन डाई डाइऑक्साइड’ के उत्सर्जन में इस वर्ष वैश्विक स्तर पर पांच प्रतिशत से अधिक कमी आने का अनुमान है जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पिछले सत्तर वर्षों में पहली बार होगा।

 

आज केंद्र में एक पार्टी की सरकार है तो राज्यों में दूसरे राजनैतिक दल सत्ता में हैं इस कारण  कोरोना ने भारत के राजनैतिक दलों को बहुत राजनीति करने का अवसर नहीं दिया है। निश्चित रूप से केंद्र की सरकार से लोगों की अपेक्षाएं ज्यादा हैं और लोगों का गुस्सा भी उसके प्रति अधिक फूट रहा है परन्तु, राज्य सरकारें भी जनता की नाराजगी का कोपभाजन बन रही हैं। लगभग सभी राजनैतिक दल स्वयं को पिछले पाँव पर ही पा रहे हैं क्योंकि गरीबों की रोजी रोटी और मकान जैसी मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वास्तव में आज तक किसी भी राजनैतिक दल ने कोई भी सार्थक काम नहीं किया। आज तक सभी राजनैतिक दलों द्वारा गरीबों का वोट बैंक के रूप में ही प्रयोग होता रहा है और जाति, धर्म तथा क्षेत्र के आधार पर बांटकर उनके वोट लिए जाते रहे हैं। एक महत्वपूर्ण बात जो प्रत्यक्ष रूप से सामने आ रही है, यह है कि इस दौर में एक बड़ी जनसँख्या गरीबी की रेखा से नीचे चली गयी है। भुखमरी, बेरोजगारी, पुलिस दमन और सड़क दुर्घटनाओं का बड़ा शिकार भी यही गरीब बन रहे हैं।

 

हाल में ही केंद्र सरकार ने जिस प्रकार अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करने के नाम पर उद्योगपतियों के हित में श्रम कानूनों में बडे बदलाव किये हैं उनका भी शिकार गरीब मजदूरों को ही बनना पड़ेगा जिसका विरोध देश के लगभग सभी विपक्षी राजनैतिक दलों एवं ट्रेड यूनियनों द्वारा प्रारभ भी हो चुका है। एक और अच्छी बात जो इस कोरोना काल में हुई वह है, हमारे टीवी चैनलों में धार्मिक उन्माद बढ़ाने वाली तथा देश की एकता एवं अखंडता को चुनौती देने वाली फिजूल की बहसें लगभग समाप्त हो गयीं हैं। कुल मिलकर यह कहा जा सकता है कि कोरोना काल का देश की राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पडने वाला है जिसका सत्तारूढ़ राजनैतिक दलों की स्थिति पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा और राजनैतिक दलों को वास्तव में अपनी राजनीति के केंद्र में देश के गरीब मजदूर, किसान, नौजवान, बेरोजगार वर्ग को रखने पर मजबूर होना पड़ेगा।

 

कोरोना के संक्रमण काल में उपभोक्ता का व्यवहार भी निश्चित रूप से बहुत बदल चुका है तथा किसी भी उपभोक्ता वस्तु के सम्बन्ध में उसकी पसंद अथवा नापसंद का आधार आवश्यकता हो गयी है न कि विलासिता। उपभोक्ता अब  ‘शॉप फ्रॉम होम’ (Shop From Home) के तहत ही उन्हीं उत्पादों को खरीद रहा है  जिसकी उसे वास्तव में आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो उपभोक्ता अपने खर्चों का नियोजन अत्यंत सतर्कता के साथ करने लगा है जिसमें फिलहाल विलासितापूर्ण उत्पादों अथवा सेवाओं के लिए कोई भी स्थान नहीं है। इस दौर में उपभोक्ता अपने जीवन की रक्षा के प्रति बहुत अधिक सतर्क होता दिखा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उसका शाकाहार के प्रति बढता रुझान है। बाज़ार में मदिरा, धूम्रपान, तम्बाकू, विदेशी पेय, जंक फ़ूड आदि की मांग ना के बराबर है।

 

पर्यटन तथा परिवहन क्षेत्र पर कोरोना का सर्वाधिक विपरीत प्रभाव पड़ा है। इन दोनों ही क्षेत्रों के उपभोक्ता एवं व्यवसायी इसके चंगुल में बहुत लम्बे समय तक फंसे रहने वाले हैं। कोरोना काल में उपभोक्ता के मनोरंजन के सम्बन्ध में भी उसके व्यवहार में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है कि अब वह घर में ही ऑनलाइन मनोरंजन चाहने लगा है। लॉकडाउन में सरकार द्वारा दूरदर्शन पर रामायण, महाभारत आदि लोकप्रिय सीरियलों के प्रसारण को देश भर में खूब पसंद किया जा रहा है। अतः आगे भी इसी तरह के ऑनलाइन मनोरंजन कार्यक्रम उपभोक्ताओं को आकर्षित करते रहेंगे। इस हेतु प्रत्येक उपभोक्ता अपने टीवी अथवा अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों को सेटेलाइट से जोड़ने के लिए व्यय करना चाहेगा।

 

दुनिया भर के अर्थशास्त्रियों एवं सरकारों की भाँती भारत में भी अब ग्रीन इकानामी तथा ग्रामीण पुनर्गठन एवं  पुनर्निर्माण पर गंभीरता के साथ विमर्श प्रारंभ होने लगा है तथा ग्लोबल से लोकल के विचार को प्रोत्साहित किया जा रहा है। व्यावसायिक समूह अपनी कारोबारी बैठकों के विकल्प के रूप में वैबिनार की सहायता ले रहे हैं तथा वर्क फ्राम होम एवं वर्चुअल ऑफिस जैसे नये तरीके खोजे जा रहे हैं। उपभोक्ता-व्यवहार का आधार विलासिता के स्थान पर आवश्यकता बन गया है। सामाजिक एवं पारिवारिक निर्भरता एवं मेल मिलाप के  स्थान पर व्यक्ति-केन्द्रित भावना बलवती होती जा रही है। लोगों में आध्यात्मिक दर्शन का भाव प्रबल हुआ है परन्तु धार्मिक कट्टरता कम हुई है। जनमानस में गरीबों तथा कमजोर वर्ग के लोगों के प्रति उदारता बड़ी है तथा देश की राजनैतिक पार्टियां ऐसा कोई बयान देने अथवा कार्य करने से परहेज कर रही हैं जिससे उनकी वोट लोलुपता प्रदर्शित होती हो। कोरोना काल पर्यावरण की चिंता करने वाले लोगों के लिए एक आशा की किरण के रूप में आया है, कुछ पर्यावरणविद् और संस्थाऐं तो कोरोना को पृथ्वी के जीवन की रक्षा के लिए वेक्सिन के रूप में तक स्वीकार करने लगे हैं।

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