शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया - एक परिचय

के० के० पांडे

पर्वतीय राज्य उत्तराखण्ड का गठन उत्तर प्रदेश के पर्वतीय जिलों को अलग कर 9 नवम्बर, 2000 को किया गया था। यह भारत का 27वाँ राज्य है, जिसकी सीमायें हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्यों तथा नेपाल व चीन देश से मिलती हैं। हिन्दू धर्म के पवित्र चार धाम - बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री व यमुनोत्री, इसी राज्य में स्थित हैं, इसीलिए इसे ‘देव-भूमि’ भी कहा जाता है।​

 

देश-दुनिया के कराड़ों निवासियों को शुद्ध प्राणवायु, पेयजल एवं उदरपूर्ति तथा सामरिक सुरक्षा प्रदान करने वाली देवभूमि आदिकाल से ही आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक, साॅंस्कृतिक, साहित्यिक एवं राजनैतिक आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले महापुरूषों यथा कालीदास, गुरू गोरखनाथ, आदिगुरू शंकराचार्य, चीनी यात्री ह्नवेनसांग, सिख गुरू गुरूनानक देव, स्वामी रामतीर्थ, नारायण स्वामी, महर्षि अरविन्द, दयानंद सरस्वती, स्वामी विवेकानंद, नीम करौली बाबा, हैड़ाखान बाबा, सरला बहिन, उदय शंकर, मूरक्राफ्ट, एडमण्ड हिलेरी, लाला लाजपत राय, गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, आधुनिक मीरा महादेवी वर्मा आदि की साथना तथा कर्म स्थली रही है। उन्होंने इस भू-भाग का न केवल भ्रमण किया वरन् इस दौरान उन्होने अपने जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नई ऊर्जा को भी प्राप्त किया।  

लोककथाओं के आधार पर पाण्डव यहाँ पर आये थे और महाभारत और रामायण की रचना यहीं पर हुई थी। प्राचीन काल से यहाँ मानव अधिवास के प्रमाण मिलने के बावजूद इस क्षेत्र के इतिहास के बारे में बहुत कम जानकारी मिलती हैं। कुमाऊँ में, चम्पावत जनपद के तल्लादेश में, एक पर्वत की चोटी पर ‘गुरु गोरखनाथ की अखण्ड धूनी‘ निरन्तर जलती रहती है। इसके बारे में मान्यता है कि जब गुरु गोरखनाथ तिब्बत को जा रहे थे तो कुछ समय के लिये इस स्थान पर रुककर उन्होंने साधना की। उन्होंने यहाँ पर जो धूनी ‘चेतन‘ की थी उसे उनके अनुयायियों ने अभी तक ‘चेतन‘ रखा है। इस धूनी में, निकटवर्ती वन के वृक्षों की स्वयं सूखी हुई टहनियों का छिलका उतार तथा पानी से धोकर जलाने की परम्परा है। उत्तराखंड में उनके अनुनायी जो इस पंथ के मानने वाले हैं वे मृतक शरीरों का दाह संस्कार न कर उन्हें भू-समाधि देते हैं। अपने नाम के साथ ‘नाथ‘ शब्द लगाते हैं। कार्तिकेयपुर राजवंश के शासन काल में ही उत्तराखंड में अदि गुरु शंकराचार्य जी का आगमन हुआ था, जिन्होंने केदारनाथ तथा बद्रीनाथ का पुनरुद्धार किया और ज्योर्तिमठ की स्थापना की। आदिगुरु शंकराचार्य जी ने केदारनाथ में ही अपने प्राण त्यागे थे। 


पहाड़ की वादियों में साहित्यकारों और कवियों ने कई कालजयी ग्रन्थों की रचना की। इन्ही में से एक हैं, साहित्य के लिए एशिया में प्रथम नोबल पुरस्कार विजेता तथा भारत के राष्ट्रीय गान के रचेयता महान कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, गायक, गीतकार, संगीतकार, चित्रकार, प्रकृतिप्रेमी, पर्यावरणविद और मानवतावादी गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर,। गुरूदेव टैगोर जी ना सिर्फ नैनीताल के रामगढ़ में आकर रुके थे बल्कि यहां उन्हौने गीतांजली के कुछ भाग की रचना भी की, जिसकें लिए उन्हें वर्ष 1913 में साहित्य के सर्वोच्च सम्मान नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 


आधुनिक मीरा के नाम से विख्यात महादेवी वर्मा हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण छायावादी आन्दोलन के बड़े नामों में से एक थीं।यह स्थान उन्हें इतना भाया कि उन्होंने 1936 में गर्मियों में आकर रहने के लिए यहाँ एक भवन खरीदा जिसका नाम मीरा कुटीर रखा गया। इस भवन में रह कर महादेवी ने अनेक कई गद्य रचनाएं की साथ ही अपने संग्रह ‘दीपशिखा’ (1942) पर समूचा कार्य भी यहीं किया। आज इस भवन को कुमाऊँ विश्वविद्यालय की देखरेख में एक साहित्य-संग्रहालय का रूप दे दिया गया है एवं “महादेवी वर्मा सृजन पीठ“ नामक महत्वपूर्ण साहित्यिक केंद्र संचालित किया जा रहा है।  महान कवि ’छायावादी युग’ के चार प्रमुख स्तंभों में से एक सुमित्रानंदन पंत जी का जन्म उत्तराखंड में अल्मोड़ा जिले के कौसानी गांव में हुआ था। हिंदी साहित्य को एक बेहतर मुकाम तक पहुंचाने और बेहतरीन काम के लिए उन्हें साल 1961 में पद्मभूषण, 1968 में ज्ञानपीठ और साहित्य अकादेमी के साथ ही सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार जैसे पुरूस्कार से सम्मानित किया गया।


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक महात्मा गांधी जी को उत्तराखंड बहुत भाता था। उत्तराखंड से बापू की अनगिनत यादें जुड़ी हैं। ब्रिटानी सामा्रज्य के खिलाफ देश भर में आज़ादी की अलख जगाने के लिए यूं तो महात्मा गांधी ने देश भर में दौरा किया था, लेकिन उत्तराखंड के तमाम शहरों एवं गाॅंवों से उनका जुड़ाव बराबर बना रहा था। नैनीताल, हल्द्वानी, देहरादून, मसूरी, कुमायूं, अल्मोड़ा सहित लगभग सभी हिस्सों में बापू ने आज़ादी की अलख जगाई थी। 

उत्तराखंड से था गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर का गहरा नाता 

 

पहाड़ के प्राकृतिक सौन्दर्य ने हर किसी को अपनी ओर आकर्षित किया, जो भी यहां आया वो यहीं का होकर रह गया। चारों ओर प्रकृति की सुन्दरता व पेड़ों की छावों में बसा यह भूभाग साहित्यकारों व कवियों के लिए तीर्थ से कम नही है। यही कारण है कि गुरूदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर, जिन्होंने अपने ज्ञान से पूरे विश्व को भारतीय संस्कृति के सर्वश्रेष्ठ रूप से रूबरू कराया था, उनका भी देवभूमि से विशेष नाता रहा हैै। इस देवभूमि से गहरे प्रेम के कारण उन्होंने प्रदेश के विभिन्न स्थानों में न केवल भ्रमण किया वरन गहन साहित्य साधना भी की। उल्लेखनीय है कि गुरूदेव नई ऊर्जा प्राप्त करने के लिए देवभूमि उत्तराखंड का रुख करते थे। 


कविगुरु जिन्होंने मोहन चंद करम चंद गांधी को महात्मा नाम दिया, का उत्तराखंड में आगमन 1903, 1914 एवं 1937 में हुआ। गुरूदेव द्वारा इन अवधियों में उत्तराखंड की सांस्कृतिक नगरी अल्मोडा एवं अपने नैसर्गिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध पहाड़ी क्षेत्र रामगढ में प्रवास किया। अपने उत्तराखंड प्रवास के दौरान गुरुदेव द्वारा ”गीतांजली“ के कुछ भाग की रचना के साथ ही आधुनिक विज्ञान पर आधारित ग्रंथ ”विश्व परिचय“ की रचना की गई। कविगुरु ने इसी स्थल पर रहते खगोल विज्ञान, इतिहास, संस्कृत के साथ ही कालिदास की शास्त्रीय कविताओं को खूब पढ़ा साथ ही कई कविताओं की रचना भी यहीं की। इसी प्रवास के दौरान अपने बच्चों के जीवन से प्रेरित मातृविहीन बच्चों की व्यथा पर उन्होने ”शिश“ शीर्षक से कविताओं की श्रंखला की भी रचना की। 


शांतिनिकेतन व अन्य स्थलों के प्रवास के दौरान फूर्सत निकाल उन्होंने कृषि वैज्ञानिक प्रो0 बो0सी0 सेन को पत्र लिख पछतावा जाहिर किया था कि उन्हें कुछ और वक्त पहाड़ की वादियों के बीच गुजारना चाहिए था। प्रो. सेन की पत्रकार पत्नी जी इमर्सन ने बाकायदा इस पर लंबा लेख भी लिखा है।

“टैगोर टॉप”, रामगढ़

समुद्र सतह से लगभग सात हजार फीट की ऊँचाई पर नैनीताल से 25 किमी0 दूर सुरम्य पर्वतीय क्षेत्र है- रामगढ़। एक ओर हिमालय की अत्यन्त सुरम्य पर्वत श्रृखलंाए-ं नंदा देवी, त्रिशूल, पचंाचूली, नीलकण्ठ, नन्दाघुंटी आदि अपनी पावन धवल छटा के साथ क्षितिज के आर-पार बिछी हुई है तथा दूसरी है प्रख्यात गर्ग ऋषि की तपस्थली- गर्गांचल, आज गागर नाम से जाना जाता है। रामगढ़ के आस-पास कुमाऊं क्षेत्र के अत्यन्त सुरम्य स्थल अपने प्राकृतिक वैभव के साथ विद्यमान है। इसे का ”फ्रूट बाउल आॅफ कुमाऊं“ भी कहा जाता है। औपनिवेशिक काल के दौरान रामगढ़ अंग्रेजों की एक छावनी भी रह चुका है।


चूंकि यह शांत स्थल है, इसलिए यहां कवि और लेखकों का आवागमन लगा रहता है। कहते हैं आचार्य नरेन्द्रदेव ने भी अपने ”बौद्ध दर्शन“ नामक विख्यात ग्रन्थ को अन्तिम रूप यहीं आकर दिया था। सामाजिक कार्यकर्ता नारायण स्वामी ने भी रामगढ़ में अपने आश्रम की स्थापना की थी। भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु को भी रामगढ़ बहुत पसन्द था। साहित्यकारों को यह स्थान सदैव अपनी ओर आकर्षित करता रहा है। स्व. महादेवी वर्मा, जो आधुनिक हिन्दी साहित्य की मीरा कहलाती हैं, को तो रामगढ़ भाया कि वे सदैव ग्रीष्म ॠतु में यहीं आकर रहती थीं। उन्होंने अपना एक छोटा सा मकान ”मीरा कुटीर“ भी यहाँ बनवा लिया था। आज भी यह भवन रामगढ़-मुक्तेश्वर मोटर मार्ग के बायीं ओर बस स्टेशन के पीछे वाली पहाड़ी पर वृक्षों के बीच देखा जा सकता है। 


सन् 1903 ई0 में गुरुदेव रबींद्रनाथ टैगोर अपनी बेटी रेणुका के स्वास्थ्य लाभ के लिये रामगढ़ आये थे। काठगोदाम से पैदल चलते हुए जब वे भीमताल पहुँचे तो उनके एक प्रशंसक स्विट्जरलैण्ड निवासी मिस्टर डेनियल उनके स्वागत हेतु आये और गुरुदेव को अपने साथ ‘रामगढ़‘ लाये। पहले तो वे डैनियल के अतिथि के रुप में उसके बंगले में रहे, खण्डहर में तब्दील हो चुके इस बंगले को स्थानीय लोग आज भी ”शीशमहल“ के नाम से जानते हैं। कुछ ही दिनों बाद डेनियल ने गुरुदेव के लिए एक सबसे ऊँची चोटी पर एक भवन बनवाया। इस जगह को आज “टैगोर टॉप” के नाम से जाना जाता है। इस बात के भी प्रमाण हैं कि टैगोर ने अपनी कालजयी रचना ‘गीतांजलि’ का कुछ हिस्सा रामगढ़ में लिखा। 


यह बहुत महत्वपूर्ण बात इसलिए है कि टैगोर बंगाल के रहने वाले थे, जिसके करीब ही पहाड़ों की रानी कहा जाने वाला दार्जिलिंग है, इसके बावजूद टैगोर ने ‘गीतांजलि’ के कुछ हिस्से लिखने के लिए रामगढ़ को चुना। रामगढ़ के लोग बताते हैं कि गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर शांतिनिकेतन की स्थापना रामगढ़ में ही करना चाहते थे, लेकिन क्षयरोग से पीड़ित बेटी के स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं होने और उसका स्वास्थ्य ज्यादा बिगड़ने से गुरुदेव निराश होकर यहाँ से चले गए और गुरुदेव का रामगढ़ में शांिन्तनिकेतन की स्थापना का सपना पूरा नहीं हो सका।

शान्तिनिकेतन ट्रस्ट फाॅर हिमालया

रामगढ को क्षेत्रीय जनता की भावनाओं के अनुरूप साॅंस्कृतिक एवं साहित्यिक नगरी के रूप में प्रतिस्थापित करने एवं गुरूदेव के स्वप्न रामगढ में शान्तिनिकेतन की स्थापना हेतु स्थानीय लोगों एवं बुद्धिजीवियों द्वारा लगभग 7 साल पहले “हिमालयन एजुकेशनल रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसायटी” के बैनर तले प्रयास शुरू किये। रामगढ को राष्ट्रीय पटल पर पहचान दिलाने के उद्देश्य से “हिमालयन एजुकेशनल रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसायटी” द्वारा स्थानीय नागरिकों के सहयोग से विगत पाॅंच वर्षों (2015) से अनवरत गुरूदेव रबीन्द्र नाथ टेगोर का जन्मोत्सव आयोजित किया जा रहा है। इस क्रम में प्रतिवर्ष गुरूदेव के विचार एवं दर्शन पर आधारित राष्ट्रीय संगोष्ठी, फोटो प्रदर्शनी, कविता पाठ, रक्तदान शिविर, टैगोर टाॅप तक सांस्कृतिक शोभा यात्रा सहित सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न किये जाते रहे हैं, जिनमें बंगाल सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से विद्वान, शोध छात्र एवं स्कूली बच्चे अपना योगदान देते हैं। 


तीन वर्ष पश्चात २०१८ में “हिमालयन एजुकेशनल रिसर्च एंड डेवलपमेंट सोसायटी (हर्ड्स)" द्वारा स्थानीय लोगों एवं बुद्धिजीवियों को साथ लेकर  “शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया” का गठन किया गया। सोसायटी की 15 सदस्यीय समिति का प्रयास है कि रामगढ़ में शांतिनिकेतन का निर्माण हो। इसमें शुरूआती सफलताएँ भी मिल चुकी हैं। फिलहाल टैगोर टॉप को मुख्य सड़क से जोड़ने वाला पैदल मार्ग अब मोटर वाहन जाने लायक बनाया जा चुका है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कर्मभूमि टैगोर टाॅप (रामगढ) को शिक्षण संस्थान, संग्रहालय एवं पर्यटक केंद्र के रूप में विकसित करने हेतु “शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया” कृत संकल्पित है।

शान्तिनिकेतन ट्रस्ट फाॅर हिमालया के उद्देश्य

  1. गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की कर्मभूमि टैगोर टाॅप (रामगढ) को शिक्षण संस्थान, संग्रहालय एवं पर्यटक केंद्र के रूप में विकसित करना।

  2. आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक, साॅंस्कृतिक, साहित्यिक एवं राजनैतिक आदि क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले महापुरूषों, समाज सुधारकों, साहित्यकारों, कवियों और मनीषियों के विचार दर्शन, साहित्य एवं कृतियों पर आधरित शोध कार्यों को प्रोत्साहित करना।

  3. राज्य स्तरीय, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों  के माध्यम से गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद, जैसे मनीषियों के दर्शन और विचारों का प्रचार-प्रसार करना। 

  4. क्षेत्रीय युवक-युवतियों को स्वावलम्बी बनाने के लिए लोक कला, लघु उद्योग और हस्तशिल्प के कार्य एवं कौशल विकास का प्रशिक्षण देना।

  5. भारतीय घरेलू उद्योगों की उन्नति और भारत की द्रव्य-सम्पदा के विकास में सहायक आवश्यक व्यावहारिक ज्ञान से युक्त वैज्ञानिक, तकनीकी तथा व्यावसायिक ज्ञान का प्रचार और प्रसार करना।

  6. पुस्तक, पत्रिकाओं तथा वेबसाईट के प्रकाशन द्वारा भारतीय संस्कृति, दर्शन, अध्यात्म एवं योग का प्रचार-प्रसार करना।  

  7. योग, आधात्म, भारतीय संस्कृति एवं इतिहास पर डिजिटल लाइब्रेरी का निर्माण करना।  

यह वेबसाइट  शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया द्वारा विकसित की है।

@ 2020 शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया सर्वाधिकार सुरक्षित।

  • Facebook - Black Circle
  • Twitter - Black Circle

Ramgarh (Uttarakhand), India