'सुनो दीपशालिनी' से रबीन्द्रनाथ ठाकुर के चुनिंदा गीत

साभार : राजकमल प्रकाशन

हर विधा में रचनाएं लिखने वाले कवि रबीन्द्रनाथ ठाकुर को साहित्य में योगदान के लिए नोबल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। भारत सहित उन्होंने कुल तीन देशों के राष्ट्रगान लिखे। साथ ही 2,000 से अधिक गीतों की रचना की। पेश हैं उनकी किताब 'सुनो दीपशालिनी' से उनके लिखे कुछ गीत। इनका अनुवाद प्रयाग शुक्ल ने किया है।

द्वार थपथपाया क्यों तुमने ओ मालिनी
पाने को उत्तर ओ किससे क्या मालिनी
फूल लिए चुन तुमने गूँथी है माला 
मेरे घर का अन्धकार जड़ा हुआ ताला 
खोज नहीं पाया पथ दीप नहीं बाला 

आई गोधूलि और पुँछती सी रोशनी 
डूब रही स्वर्णकिरण अँधियारी में सनी
होगा जब अन्धकार आना तब पास में
दूर कहीं पर प्रकाश जब हो आकाश में

पथ असीम रात घनी, सुनो दीपशालिनी 

सखी आए वो कौन


सखी आए वो कौन, लौट जाए हर दिन,
दे दे उसको कुसुम, मेरे माथे से बिन
पूछे वो अगर फूल किसने दिया
नाम लेना नहीं तुमको मेरी कसम
रोज़ आए वो बैठे यहाँ धूल में 
एक आसान बना दे बकुल फूल में
कितनी करुणा भरे हैं ये उनके नयन
बोले वो कुछ नहीं कुछ तो कहने का मन

 

दिन पर दिन रहे बीत

देखूं मैं राह दिन जाते बीत
पवन बहे वासन्ती गाऊं मैं गीत
करता सुर-खेल, आया ना मीत
बेला यह कठिन बड़ी
करती बस छल
स्वप्न सा दिखती है मुझको हर पल
दिन पर दिन जा रहे
रहे अरे बीत
आते ना पास
दे जाते मुझको तुम
ये कैसी प्यास
जानूं मैं जाने मैं
दुख वही पाता है जो करता प्रीत

क्यों आँखों में छलका जल

क्यों आँखों में छलका जल 
क्यों हो आया मन उन्मन
सहसा मन में कुछ आया
ना आकर भी कुछ आया
चहुँओर मधुर नीरवता
फिर भी ये प्राण कलपते
फिर भी मेरा मन उन्मन
यह व्यथा समाई कैसी 
कैसी यह एक कसक-सी
किसका हुआ है अनादर
लौटा कोई क्या आकर
सहसा मन में कुछ आया
ना आकर भी कुछ आया

खोलो तो द्वार

खोलो तो द्वार, फैलाओ बाँहें
बाँहों में लो मुझको घेर
आओ तो बाहर, बाहर तो आओ
अब कैसी देर
निबटे हैं कामकाज, चमका ये संध्या का तारा
डूबा आलोक वहाँ सागर के पार अरे,
डूबा है सारा-का-सारा
भर भर के कलशी , छलकाई कैसी
ओढ़ा है कैसा दुकूल
देखूं तो माला, गूँथी है कैसी,
केशों में है कैसा फूल
लौटी हैं गाएं, पाखी भी लौटे
लौटे हैं वे अपने नीड़
पथ जितने सारे, सारे जगत के,
खोए, अँधेरे में डूबे
देना मुझे मत फेर

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