पुस्तक समीक्षा-भारतीय संस्कृति का संवाहक इंडोनेशिया

के० के० पाण्डे  

हजारों साल बाद भी भारतीय संस्कृति का जीवंत रूप देखना है तो इंडोनेशिया जाना चाहिए। नैसर्गिक सौंदर्य से भरपूर और विशिष्ट संस्कृतिवाला इंडोनेशिया बड़े वर्ग को आकर्षित करता है। न केवल इंडोनेशिया ने अपने को भारत की अमर सनातन संस्कृति से जोड़ा है, बल्कि उसे समृद्ध बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। धर्म, संप्रदाय, भाषा, क्षेत्र और जाति की परिधि में अपने को समेटकर हम लालच में पड़कर नैतिकता को छोड़ पतन की तरफ जा रहे हैं। ऐसे में इंडोनेशिया ने न केवल भारतीय संस्कृति को सहेजकर रखा है, बल्कि उसे संरक्षित, संवर्धित करने में सफलता पाई है।

भारत के निकटवर्ती देशों में इंडोनेशिया एक ऐसा देश है, जिसका बाली द्वीप हिंदू संस्कृति की खुशबू से सराबोर है। ऐतिहासिक द्वीप बाली की संस्कृति पूरे विश्व के पर्यटकों को आकर्षित करती है। बाली ने अपने आंचल में बहुत-सी सांस्कृतिक धरोहरों को समेटा हुआ है। भारत की हिंदू सभ्यता यहां पूरी तरह जीवंत है। बाली में हिंदुत्व की नींव छठीं-सातवीं शताब्दी में ऋषि मारकंडेय ने रखी थी। इंडोनेशिया की धरती पर उतरते ही आपको भारतीय संस्‍कृति की झलक देखने को मिल जाएगी। क्‍योंकि इंडोनेशिया एयरलाइंस का लोगो 'गरुड़ पक्षी' है। गरुड़ देखते ही आपके मन में भगवान राम और गरुड़ पक्षी की कहानी याद आ जाएगी। गरुड़ इंडोनेशिया का नेशनल एंबलम भी है। यह देश मुस्‍लिम भले ही हो लेकिन यहां की संस्‍कृति में भारतीयता घुली-मिली है।

इंडोनेशिया में रामायण का प्रभाव इतना गहरा है कि यहां की सारी संस्कृति ही रामायण की पारम्परिक आस्था से जुडी हुई है। यहां पर रामलीला भी होती है जो काफी फेमस है। देश के कई इलाकों में रामायण के अवशेष और रामकथा की नक्काशी वाले पत्थर भी मिलते हैं। भारत में जहां लोग आदिकवि ऋषि वाल्मिकी द्वारा लिखित रामायण को मानते हैं जो संस्कृत भाषा में लिखी गयी थी, वही इंडोनेशिया में कवि योगेश्वर द्वारा लिखित रामायण को माना जाता है जो कावी भाषा में लिखी गयी थी। इंडोनेशिया की करेंसी देखने पर आपको उसमें गणेश जी की फोटो छपी हुई साफ-साफ दिखाई देगी। गणेश भगवान को इंडोनेशिया में कला, विज्ञान और शिक्षा के देवता के रूप में देखा जाता है इसलिए वहां की करेंसी पर उनके ही फोटो छपे हुए हैं।
 

इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता जाने वाले यात्रियों के लिए उत्तर-पश्चिम तट पर स्थित शहर के बीचों बीच निर्मित भव्य अनेक घोड़ों से खिंचने वाले रथ पर श्री कृष्ण-अर्जुन की प्रतिमा सर्वाधिक आकर्षित करने वाली है। इस शहर में जगह-जगह आपको हिंदू स्‍थपत्‍य कला का दर्शन होता रहेगा। वहीं इंडोनेशिया में पांच बड़े-बड़े हिंदू मंदिर भी हैं। भारत के भगवान राम और अन्य कई देवताओं की मूर्तियां या मंदिर आपको सहज ही मिल जाएंगे जो की इंडोनेशिया को भारत की संस्कृति से कहीं न कहीं जोडऩे का कार्य करते हैं। रामायण और महाभारत का प्रभाव पूरे इंडोनेशिया में है। बाली के लोगों में महाभारत के युद्धस्थल कुरुक्षेत्र को देखने की इच्छा बलवती है। वहां के लोग गंगा में पवित्र स्नान तथा शिव मंदिरों को देखने को अपनी पहली प्राथमिकता में रखते हैं। उन्हें यहां अपने देश जैसा माहौल लगता है।

डा० रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ द्वारा लिखी इस पुस्तक में इंडोनेशिया-भारत की प्रगाढ़ मित्रता, सामरिक साझेदारी का उल्लेख है, वहीं इंडोनेशिया के भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक पक्ष को सुधी पाठकों के समक्ष रखा है। इसमें इंडोनेशिया की संस्कृति, शिक्षा, परंपराओं, इतिहास और इस देश की विकास की कहानी को पाठकों से साझा किया गया है। बदलते विश्व परिदृश्य में भारत-इंडोनेशिया की सामरिक मित्रता, बढ़ते व्यापारिक रिश्तों के साथ-साथ एशिया में इंडोनेशिया-भारत की बढ़ती भूमिका और दक्षिण-पूर्व प्रशांत क्षेत्र में विश्व शांति की स्थापना में दोनों देशों की साझी नीतियों और उनके योगदान की चर्चा की है। इस कृति से दोनों देशों के लोगों को एक-दूसरे के निकट आने में मदद मिलेगी।

लेखक परिचय :

रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ कविता, कहानी, उपन्यास, पर्यटन, डायरी, तीर्थाटन, संस्मरण और व्यक्तित्व विकास जैसी विभिन्न विधाओं पर हिंदी साहित्य को पाँच दर्जन से अधिक उत्कृष्ट पुस्तकें देनेवाले डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ लेखन के साथ-साथ पिछले तीन दशक से राजनीति में भी सक्रिय हैं। इसके साथ ही वे गंगा तथा हिमालय के पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन के लिए लगातार संघर्षरत हैं। डॉ. निशंक के साहित्य का अनुवाद अंग्रेजी, रूसी, फ्रेंच, क्रिओल, नेपाली, स्पेनिश, जर्मन आदि विदेशी भाषाओं सहित एक दर्जन से अधिक भारतीय भाषाओं में हुआ है। देश के कई विश्वविद्यालयों में उनके साहित्य पर शोध कार्य हुए और हो रहे हैं। देश एवं विदेश के अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में उनका साहित्य पढ़ाया जा रहा है। उत्कृष्ट साहित्य सृजन के लिए देश के चार राष्ट्रपतियों द्वारा राष्ट्रपति भवन में सम्मान, उत्कृष्ट साहित्य सृजन, गंगा एवं हिमालय के पर्यावरण संरक्षण-संवर्धन के लिए विश्व के एक दर्जन से अधिक देशों में सम्मान। देश के अनेक विश्वविद्यालयों, संस्थाओं, संगठनों और साहित्यिक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर सम्मान एवं पुरस्कार। 
संप्रति: उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री एवं वर्तमान में हरिद्वार से लोकसभा सांसद तथा केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री।

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