गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर का कुमाऊॅं से था अन्तरंग लगाव

प्रकृति की मनोरमवादी में कष्ट व्यथित चिन्तनशील मन में ‘‘विश्वभारती’’ का विचार भी प्रस्फुटित हुआ।

डा0 विद्याधर नेगी

महान दार्शनिक उपनिषदों के ज्ञाता देवेन्द्र नाथ टैगोर के पांचवे पुत्र रत्न के रूप में रविन्द्र नाथ टैगोर का जन्म 07 मई,1861 ई0 में हुआ। बचपन से ही दार्शनिक अंदाज एवं कुशाग्र बुद्वि के धनी रविन्द्र नाथ टैगोर का उत्तराखण्ड के पर्वतीय क्षेत्र कुमाऊॅं की वादियों से गहरा सम्बन्ध रहा है। सन् 1902 में गुरूदेव की जीवन संगिनी श्रीमती मृणालिनी टैगोर के देवाहसान् से दुःखी एवं 12 वर्षीय पुत्री रेनुका की बीमारी से व्यथित होकर पहाड़ों की शान्त वादियों की ओर जाने का मन बनाया। रेनुका क्षय रोग से पीड़ित थी, चीड़ के वनों की आबोहवा ऐसे रोगी के लिये लाभकारी होने के कारण सन् 1903 की गर्मियों में गुरूदेव रेनुका एवं छोटे पुत्र समीन्द्र नाथ टैगोर को साथ लेकर रामगढ़ पहॅंुचे। वहाॅं पर सेब, पुलम, आडूॅं, खुमानी  के बगीचों एवं चीड़ के घने जंगलों के मध्य घर लेकर अगस्त माह तक रूके। यहीं पर उन्होंने इस प्रवास के दौरान ‘‘शिशु’’ नामक कविता की रचना की। साथ ही इस काल में गीतांजली के कुछ पदों का श्रृजन भी किया।

प्रकृति की मनोरमवादी में कष्ट व्यथित चिन्तनशील मन में ‘‘विश्वभारती’’ का विचार भी प्रस्फुटित हुआ। यहीं हिमालय की गोद में आश्रम स्थापित करने का भी विचार मन में आने लगा। प्रथम प्रवास पूर्ण कर सितम्बर मध्य तक कलकत्ता वापस लौट गये। जिस पुत्री के स्वास्थ्यवर्धन की दृष्टि से रामगढ़ में प्रवास किया था, र्दुभाग्यवश 1903 में ही उनकी आकस्मिक मृत्यु के कारण हृदय विदारक कष्ट का सामना करना पड़ा। दुःखों का पहाड़ यही पर रूका नहीं 1907 में पुत्र समीन्द्रनाथ टैगोर का निधन भी अपार दुःख दायी रहा। इतनी आपदाओं के बाद भी टैगोर जी का पर्वत प्रेम उन्हें पहाड़ की शान्त एकान्त वादियों की ओर जाने को प्रेरित करते रहा।

सन् 1914 में रवीन्द्र नाथ टैगोर पुनः रामगढ़ प्रवास पर पहुॅचे। मई -जून की ग्रीष्म ऋतु में रामगढ़ की ऊॅंची पहाडी (लगभग 8500 फुट ऊॅची) पर बने काटेज का क्रय कर उसमें रहे। ये चोटी आज ‘‘टैगोर टाॅप’’ के नाम से विख्यात है। इस पहाड़ी से सामने हिमालय की चैरखम्भा से लेकर नेपाल हिमालय की गगन चुम्बी चोटियों का मनोरम दिग्दर्शन उन्हें खूब भाता था। आज भी यहाॅ से विशाल क्षेत्र में फैली हिमालय श्रेणी के दर्शन की सुखद अनुभूति बार- बार टैगोर टाॅप आने को अभिप्रेरित  करती है। रामगढ़ के इस प्रवास के दौरान भी महाकवि द्वारा गीतान्जली के कुछ पदों की रचना भी महत्वपूर्ण थी। पर्वतीय प्रवास काल में गीतान्जली अनवरत समृद्ध होती रही। 


तीसरी बार हिमालय प्रेम टैगोर जी को सन् 1927 ई0 में कुमाउॅ की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा खींच लाया। स्व0 कैप्टन जवाहर लाल साह ठुलघरिया के पुत्र श्री गिरीश लाल साह ठुलघरिया (जो वर्तमान में.भगिनी निवेदिता काॅटेज रूपी ऐतिहासिक धरोहर को संरक्षित करने में लगे हैं। सम्प्रति देवदार होटल के स्वामी) बताते हैं कि प्रथम बार अल्मोड़ा आगमन पर गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने श्री दास पंडित ठुलघरिया के आतिथ्य को स्वीकारा। तब उनके  आवास की व्यवस्था ‘‘चील कपीटा हाउस’’ में की गयी। यह बंगला देवदार एवं चीड़ की घनी छाॅव में तब बड़ा ही रमणीक एवं शान्त स्थल था। यहाॅ पर चील पक्षियों के घोंसले अधिक होने के कारण यह बंगला  चील कपीटा हाउस नाम से जाना जाता था। उस समय वहां पर कुछ आम के वृ़क्ष भी थे। यहां के आमों की गुरूदेव खूब प्रशंसा करते रहते थे। श्री गिरीश साह बताते है कि इस प्रवास के दौरान गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपनी जेब घड़ी साह परिवार के किसी सदस्य को यादगार स्वरूप भेेट की थी। वर्षो तक यह घड़ी उनके परिवार के पास रही बाद में परिवार बढ़ते गये। बॅटवारा होता गया अब घड़ी कहाॅ है? किसी को पता नहीं। बाद में इसी बंगले में स्वामी विवेकानन्द के गुरू भाई स्वामी प्रिया नन्द भी लम्बे अर्से तक रहे और यह तब से ‘प्रियानन्द हाउस’ के नाम से प्रसिद्व हुआ। आजकल यहाॅं पर होटल मैनेजमेंट का विशालकाय भवन निर्मित हो गया है। परन्तु बीच में पुराना बंगला अभी भी सुरक्षित है। श्री गिरीश साह बताते हैं कि इस बंगले की भूमि होटल मैनेजमेंन्ट को इस शर्त पर स्थानन्तिरित की गयी कि नव निर्माण से पुराने बंगले के स्वरूप  को नुकसान न पहुचे। शायद तभी पुराने बंगले का अस्तित्व अभी तक बचा हुआ है।


गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का अल्मोड़ा आगमन यहाॅ के बुद्धिजीवी समाज के लिये बहुत महत्व पूर्ण एवं प्रेरणा दायी रहा। गौरा पन्त का  उदाहरण यहाॅ उल्लेखनीय है।     गुरूदेव की प्रेरणा से ही गौरा पन्त को अध्ययन हेतु शान्ति निकेतन जाने का शुभ अवसर मिला। शान्ति निकेतन से वह सन् 1943 में स्नातक की शिक्षा प्राप्त कर लौटी। आज गौरा पन्त ‘शिवानी’ के नाम से पूरा साहित्य जगत भली भाॅति परिचित है।


चैथी बार गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का कुमाउॅं आगमन मई 1937 में हुआ। कहा जाता है कि अल्मोड़ा में विवेकानन्द कृषि अनुसंधान के संस्थापक एवं प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक बोसी सेन के विशेष आग्रह आमंत्रण पर गुरूदेव अल्मोड़ा आये। तब उनके आवास की व्यवस्था कैन्टोमेन्ट बोर्ड के बंगले में की गयी थी। जो उस समय  ‘सैंट माक्र्सहाउस’ के नाम से जाना जाता था। 1961 में गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर शताब्दी वर्ष में इसका नाम परिवर्तित कर ‘‘टैगोर भवन’’ कर दिया गया। टैगोर जी के अन्दर कवि, दार्शनिक के साथ ही एक चित्रकार भी विद्यमान था। वे बहुत बड़े चित्रकार थे। उनके अल्मोड़ा प्रवास के दौरान उनके  द्वारा निर्मित रंगीन चित्रों से यह टैगोर भवन भी धन्य हुआ। आज भी ये चित्रण उस महान कला मर्मज्ञ की सिद्धहस्त कूॅची के साक्षी हैं। 

 

इस प्रवास के दौरान उन्होने ‘सेजुति’, ‘आकाश प्रदीप’, ‘नवोजातोक्’ एवं ‘छडार‘ आदि अनेक महत्वपूर्ण कविताओं की रचना भी की। ‘‘विश्व-परिचय’’ नामक प्रसिद्ध कृति भी इसी प्रवास के दौरान सॅवरी। इस प्रवास के दौरान रवीन्द्र नाथ टैगोर का सार्वजनिक अभिनन्दन समारोह भी आयोजित किया गया। यह समारोह रैमजे इंटर कालेज में आयोजित किया गया। कहा जाता है कि प्रसिद्व कुमाउॅनी कवि ‘गौर्दा’ ने  इस स्वागत समारोह मंे गुरूदेव के स्वागत में कविता पाठ कर अल्मोड़े में दो सूरजों का उदय होने की बात कही। एक सूरज जो आसमान में जो अपने प्रकाश से प्रकाशित करता है। दूसरा सूरज (गुरूदेव) जो ज्ञान से प्रकाशित कर रहा है। इस प्रवास के दौरान वैज्ञानिक बोसी सेन एवं उनकी धर्मपत्नी इमर्सन सेन के साथ गौरा पन्त ‘शिवानी’ के परिजनों से मिलने उनके घर  कसून भी गये।


1937 का ग्रीष्म प्रवास गुरूदेव का अन्तिम कुमाऊॅं प्रवास सिद्ध हुआ। क्योंकि 07, अगस्त 1941 को उनका देवहासन हो गया। अल्मोड़ा प्रवास के दौरान साक्षी रहे टैगोर हाउस एवं बाहर लगा शिलालेख पट्ट आज भी गुरूदेव की स्मृति को  जीवंत  करता है। गुरूदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर  जुड़ी महत्वपूर्ण धरोहरें जो हमारे पास है। इन ऐतिहासिक धरोहरों को सुरक्षित रखने की चुनौती आज हमारे सामने है ? जिसकी न तो आज समाज को चिंता है और न ही सरकारों को ? अभी कुछ संस्थाएं ऐसी है, जो इन धरोहरों को संजोने के प्रयास कर रही है, परन्तुये प्रयास स्तुत्य होते हुए भी पर्याप्त नहीं है। इनके संरक्षण के लिए आज पर्याप्त आर्थिक सहयोग की आवश्यकता है। सरकारी संस्थाएं जैसे नगरपालिका, जिला पंचायत, पुरातत्व सर्वेक्षण तथा गैर सरकारी संस्थाएं (एन0 जी0 ओ0) इन धरोहरों को संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती हैं। इन धरोहरों को संग्रहालय, पुस्तकालय, वाचनालयों के रूप  में विकसित किया जाना चाहिये। समय-समय पर सेमीनार गोष्ठियों का आयोजन इन स्थलों पर आयोजित किये जाने चाहिये। जिनसे  युवा पीढ़ी के छात्र, शोधार्थी, विचारक तथा भावी पीढ़ीयां गुरूदेव से संबंधित ज्ञान का लाभार्जन कर सकें एवं इनके ज्ञान का प्रकाश पूरी दुनियां में फैला सकें।  

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