रवीन्द्र संगीत: भारतीय शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत का समन्वय

डाॅ0 पंकज उप्रेती

गुरुदेव का मानना था कि शास्त्रीय किलिष्टता के चक्कर में संगीत रचना और उसमें निहित भाव को गम्भीर हानि पहुँचती है। भाव के साथ ही संगीत खिलता है। भावपूर्ण संगीत ही कर्णप्रिय और रंजक होता है। रवीन्द्रनाथ के संगीत में बंगाल के लोक की छाप और पहाड़ का सा दर्द है। वह कहते थे- शास्त्रीय संगीत सीखने के लिये गले के प्राकृतिक गुण-धर्म को नष्ट करना न्यायसंगत नहीं है। आवाज मिठास युक्त और भावपूर्ण होनी चाहिये।

 

बंगाल संगीत विधा में समृद्ध रहा है, यहाँ के लोक का संगीत और शास्त्रीय संगीत का अद्भुत प्रचलन सोचने पर मजबूर करता है कि गद्य और पद्य दोनों में लयकारी है। यहाँ राधा-कृष्ण से सम्बन्धित गीतों को कीर्तन के नाम से जानते हैं और पदावलियों को दुहराते हुए गाते हैं। लोकधुनों की छाया भी इनमें है। बंगाल में भटियाली लोकगीत भी समृद्ध है, इसमें दीर्घ स्वरों के साथ धुन गाई जाती है। बाउल संगीत के रूप में काव्य की भावप्रधान प्रस्तुति देखने को मिलती है। चटक प्रस्तुति के लिये चटका गायन भी एक शैली है। इसमें व्यंग्यवाण के साथ छेड़छाड़ भरा मनोरंजन होता है। विरह गीत के रूप में भवइया सुना जा सकता है। ऐसी ही अन्य विधाएं बंगाल के लोक में हैं।

जब बात पहाड़ यानी कि उत्तराखण्ड की करें तो यहाँ भी इसके लोक के अनगिनत गीत विविध शैलियों में मिलते हैं। न्योली के रूप में दर्दभरे स्वरों का आलाप, झोड़ा-चांचरी-ढुस्का के रूप में नृत्यगीत, बैर के रूप में सवाल-जबाब का मनोरंजन, हुड़कीबौल के रूप में कृषिगीत, होली के रूप में शास्त्रीय और लोक संगीत का मिश्रण व भावप्रधान गायकी, रामलीला के रूप में गीतनाट्य शैली, सम्वाद के रूप में पांडव नृत्य, झुमौलों, बाजूबन्द, थड्या, फाग, सगुनगीत, संस्कार गीत और भी कितने ही प्रकार हैं।

लोक बंगाल का हो, उत्तराखण्ड का हो या कहीं अन्य का, उसकी सहजता-सरलता जन्म से होती है, विकार और विकास तो उसका अगला चरण है। जब बात लोक गीतों की हो तो उनमें गेयता, व्यक्तितत्व, भावप्रवणता, रागात्मक अन्विति, आत्मद्रवणता, प्रवाहमयी शैली, भावाभिव्यंजना, प्रकृतिचित्रण होता है। इसमें छन्द, लय, विम्ब, प्रतीक, अलंकार, रस का स्वाभाविक रूप से होते हैं। लोक का यह शास्त्र ही है जो शास्त्रीयता के शास्त्र को भी दिशा देता है। लोक से उपजने वाले गीतों की सार्थकता हमेशा नवजीवन देने वाली, जन-जन में ऊर्जा संचार करने वाली रही है। रवीन्द्रनाथ जैसे विद्वान संगीत के इस पक्ष को बखूबी जानते थे। तभी उन्होंने बंगाल से पहाड़ का रुख किया होगा। 


गुरुदेव रवीन्द्रनाथ जितने गहरे कलाकार थे उतने ही वैज्ञानिक। संगीत विज्ञान पर उनका ऐसा प्रभाव देखा जा सकता है। कवीन्द्र रवीन्द्र ने संगीत की जिस विधा को जन्म दिया उसे- ‘रवीन्द्र संगीत’ कहा जाता है। रवीन्द्र संगीत, जिसे अंग्रेजी में टैगोर साङ्स (टैगोर के गीत) के रूप में जाना जाता है, रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित एक संगीत विधा है, जिन्होंने सामान्य रूप से भारत और विशेष रूप से बंगाल की संगीत अवधारणा में एक नया आयाम जोड़ा। रवींद्र संगीत का बंगाली संस्कृति बहुत ही गहरा प्रभाव पड़ा है। इन गीतों को बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल (भारत) दोनों में बंगाल की सांस्कृतिक निधि माना गया है। रवीन्द्र संगीत में स्रोतों के रूप में भारतीय शास्त्रीय संगीत और पारंपरिक लोक संगीत का उपयोग किया जाता है। विभिन्न विषयों को संबोधित करनेवाला रवींद्र संगीत बेहद लोकप्रिय है और बंगाली लोकाचार के लिए एक ऐसी नींव बनाता है, जो शेक्सपियर के अंग्रेजी जगत पर प्रभाव के तुलनीय और शायद उससे भी अधिक बड़ा है। कहा जाता है कि उनके गीत के 500 साल के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक मन्थन के परिणाम हैं जिससे होकर बंगाली समुदाय गुजरा है।
बचपन से ही उनकी कविताए छन्द और भाषा में अद्भुत प्रतिभा का आभास लोगों को मिलने लगा था। महज आठ वर्ष की आयु में ही उन्होंने अपनी पहली कविता लिख डाली और 1877 में केवल सोलह साल की उम्र में उनकी लघुकथा प्रकाशित हुई थी। भारतीय सांस्कृतिक चेतना में नई जान फूंकने वाले युगदृष्टा टैगोर के सृजन संसार में गीतांजलि, पूरबी प्रवाहिनी, शिशु भोलानाथ, महुआ, वनवाणी, परिशेष, पुनश्च, वीथिका शेषलेखा, चोखेरबाली, कणिका, नैवेद्य मायेर खेला और क्षणिका आदि शामिल हैं। 


रवीन्द्रनाथ टैगोर बंगाल के ख्याति प्राप्त विष्णुपुर घराने से प्रभावित थे। कहते हैं इस घराने की स्थापना तानसेन के वशंज बहादुर खाँ ने की थी। रवीन्द्र के पहले संगीत शिक्षक विष्णु चक्रवर्ती थे। बंगाल संगीत विधा का गढ़ रहा है, रवीन्द्रनाथ के पिता महर्षि देवेन्द्रनाथ संगीत कला के संरक्षक थे। यदि रवीन्द्रनाथ की वंशावली को देखें तो पता चल जाता है कि सभी विख्यात कलाकार और पारखी थे। महर्षि देवेन्द्रनाथ, गिरीन्द्रनाथ, द्विजेन्द्रनाथ, सत्येन्द्र, हेमेन्द्र, ज्योतिरीन्द्रनाथ, स्वर्णकुमारी, गुणेन्द्रनाथ, अश्वनीन्द्र, गुरुदेव रवीन्द्र, दीपेन्द्र, इन्दिरादेवी, लेडी प्रतिभा चैधूरी और क्षितीन्द्रनाथ आदि। इस लम्बी सूची में मंचीय कलाकार, कलावन्त, रचनाकार, स्वरलिपिकार, गायक-वादक सभी हैं। तत्कालीन विख्यात संगीतकारों का जमावड़ा इनके घर में होता था। विष्णु चक्रवर्ती, सुरेन्द्रनाथ वन्दोपाध्याय, रामप्रसाद, श्यामसुन्दर मिश्र, जगतचन्द्र गोस्वामी, राधिका प्रसाद जैसे श्रेष्ठ कलाकारों का इनके वहाँ आना-जाना था। ऐसे मंे रवीन्द्र भी इसमें गोता लगा रहे थे लेकिन उनके मुंह से निकलने वाले सजह स्वरों ने एक नई धारा को चलाया। उन्होंने जो रचनाएं तैयार की उनमें काव्य और संगीत को सन्तुलित रखा गया है। वह प्राकृतिक आवाज के साथ हाव-भाव का ध्यान रखते हुए होने वाली प्रस्तुति को संगीत की श्रेणी में मानते थे। ऐसे में स्वाभाविक रूप से रवीन्द्र संगीत ने अपना स्थान लोगों के बीच बना लिया।


गुरूदेव ने अपने द्वारा रची कविताओं को गीतों का रूप दे दिया, इस प्रकार रचना हुई एक नई संगीत विधा की जिसे हम रबिंद्र संगीत के नाम से जानते हैं। इस शैली ने बंगाल की संगीत अवधारणा में एक नया आयाम जोड़ा। गुरूदेव ने लगभग २३०० गीत रचे जिनका संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित है। ये गीत प्रकृति के प्रति उनके गहरे लगाव और मानवीय भावनाओं को दर्शाते हैं। रबिंद्र संगीत ने बंगाली संस्कृति पर एक गहरा प्रभाव डाला है तथा इसे बांग्लादेश तथा पश्चिम बंगाल दोनों की सांस्कृतिक निधि माना गया है। सामजिक जन चेतना तथा भारतीय स्वाधीनता में उनके गीतों ने महत्त्व्पूर्ण भूमिका निभाई। 


रबिंद्रसंगीत एक विशिष्ट संगीत पद्धति के रूप में विकसित हुआ है। इस शैली के कलाकार पारंपरिक पद्धति में ही इन गीतों को प्रस्तुत करते हैं। बीथोवेन की संगीत रचनाओं (सिम्फनीज) या विलायत खाँ के सितार की तरह रबिंद्र संगीत अपनी रचनाओं के गीतात्मक सौन्दर्य की सराहना के लिए एक शिक्षित, बुद्धिमान और सुसंस्कृत दर्शक वर्ग की मांग करता है। १९४१ में गुरूदेव की मृत्यु हो गई परन्तु उनका गौरव और उनके गीतों का प्रभाव अनन्त है। उन्होंने अपने गीतों में शुद्ध कविता को सृष्टिकर्त्ता, प्रकृति और प्रेम से एकीकृत किया है। मानवीय प्रेम प्रकृति के दृश्यों में मिलकर सृष्टिकर्त्ता के लिए समर्पण (भक्ति) में बदल जाता है। उनके 2000 अतुल्य गीतों का संग्रह गीतबितान (गीतों का बागीचा) के रूप में जाना जाता है। इस पुस्तक के चार प्रमुख हिस्से हैं- पूजा (भक्ति), प्रेम (प्यार), प्रकृति (प्रकृति) और बिचित्रा (विविध)।


यह एक स्वीकृत तथ्य है कि भारतीय शास्त्रीय संगीत के तत्वों को रबिन्द्र-संगीत में एक बहुत ही बुद्धिमान और प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया गया है। इसे इन गीतों में कथित भावों व मनोदशा को व्यक्त करने हेतु एक इकाई के रूप में ही सीमित रखा गया है ताकि शात्रीय संगीत के तत्व गीत के मुख्य भाव के साथ प्रतिद्वन्द्वित न हों। इसीलिए कई गीतों में शास्त्रीय संगीत का आंशिक अनुरूप पाया जाता है। परन्तु यह भी पाया गया है कि कुछ गीतों में न केवल रागों व तालों को उनके शुद्ध रूप में अपनाकर बल्कि कुछ अवसरों में तो गुरूदेव ने रागों को बहुत ही रोचक रूप में मिश्रित कर अपनी सबसे सुंदर व बौद्धिक रूप से चुनौतिपूर्ण रचनाएँ प्रस्तुत की हैं।


रवीन्द्र संगीत पर उत्तर भारत में प्रचलित ध्रुपद-धमार, ख्याल, टप्पा, ठुमरी, पाश्चात्य ओरल गीत, बंगाल की लोक धुनों का प्रभाव रहा है। गुरुदेव ध्रुपद गायकी से प्रभावित थे ऐसे में रवीन्द्र संगीत का मूलाधार भी ध्रुपद है। ऐसे में गुरुदेव ने लगभग दो हजार गीत लिखे जिनमें हिन्दी गीतों के आधार पर रचित गीतों की संख्या 215 बताई जाती है। बंगला भाषा में ये गीत ‘भाँगा-गान’ के नाम से प्रसिद्ध हुए जिन्हें पूजा गीत या ब्रह्म संगीत के रूप में गाया जाता है। श्रदेय प्रभुलाल गर्ग ने रवीन्द्र संगीत पर गहन अध्ययन करते हुए बताया है कि रवीन्द्र संगीत की अधिकांश रचनाएं तोड़ी, भैरवी, आसावरी, पूर्वी, ईमन, मल्लार और केदार में की गईं हैं। मालकौंस और बागेष्वरी का प्रयोग भी किया गया है लेकिन अधिक नहीं। भैरवी राग में लगभग 150, मल्हार में 40 और पूर्वी में 30 रचनाएं की गई हैं। तालों में सरलता का ध्यान रखा गया है ताकि गीत का काव्यपक्ष किसी भी कारण से मन्द न पड़े। गुरुदेव के 215 गीत हिन्दुस्तानी संगीत में रूपान्तरित हैं। उनका गीत- प्रथम आदि तव शक्ति आदि ‘परमोज्जवल’ उनके प्रथम कोटि के गीतों में गिना जाता है, इसे धु्रपद से लिया गया है। वर्षाकालीन गीत राग देश व दादरा ताल में निबद्ध है- ‘आई सावन की बेला’। बाउल गीत के आधार पर रची गई उनकी रचना- ‘यदि तोर डाक शुने केउ ना आसे तवे एकला चलो रे’ गांधी जी को अतिप्रिय थी। महात्मा गांधी ने ही रवीन्द्रनाथ के नाम के साथ- ‘गुरुदेव’ और ‘कविगुरु’ शब्द जोड़े थे और रवीन्द्रनाथ ने उन्हें ‘बापूजी’ नाम दिया था।


शान्तिदेव घोष द्वारा लिखित ‘रवीन्द्र संगीत’ में टैगोर की अनेक रचनाओं से सम्बन्धित राग-तालों का उल्लेख मिलता है। ‘गीत-वितान’ नामक बंगला पुस्तक में टैगोर के गीतों की स्वरलिपि का वृहद संग्रह मिलता है। इसके कई भाग हैं। उनकी रचनाओं से पता चलता है कि वह अवसर के अनुकूल तैयारी करते थे तभी यह भाव प्रधान थीं। शास्त्रीय रागों को गुरुदेव अपने ढंग से प्रस्तुत करते। ऐसे में शास्त्रीय संगीत का प्रभाव होते हुए भी उसकी अपनी धारा थी। उन्होंने वैष्णव पद, ईसाई प्रार्थनाएं, कीर्तन, ओपेरा, समूहगान को नई ऊँचाई दी। रवीन्द्र संगीत के गीतों को 6 भागों में समझा जा सकता है- 1. पूजा गीत, 2. स्वदेश गीत, 3. प्रेम गीत, 4. प्रकृति गीत, 5. नृत्यनाटक गीत, 6. विविध गीत। रवीन्द्रनाथ ने 1901 में नैवेद्य, 1906 में खैया, 1909 में गीतांजलि की रचना की। इनके अन्तर्गत आने वाले गीत पूजा गीत श्रेणी में हैं। इनमें ध्वनिमय व्यंजना और आदिशक्ति के लिये व्याकुलता दिखाई/सुनाई देती है। उदाहरण- ‘आजि तजो तारा सब आकाशे, सबे मोर प्राण भरि प्रकाशे।’ उनके लिखे/गाये देश गीत उच्चकोटि के हैं। एक उदाहरण- ‘ओ आमार देशेर माटी तोमार पाये छो आई माथा।’ बंगाल के महान प्रेमकाव्य रचनाकार निधु बाबू, मधुकान, बिहारी लाल का रवीन्द्र संगीत के गीतों में गहरा प्रभाव था। भौतिक प्रेम प्रसंगों को गुरुदेव ने आध्यात्म चेतना में ढालने के साथ ही छायावाद और रहस्यवाद की ओर ध्यान आकर्पित किया। चित्रांगदा, चंडालिका, श्यामा, कालमृगया, मायार खेला, वाल्मीकि प्रतिभा जैसे गीत तथा नृत्यनाटकों में इसका प्रभाव देखा जा सकता है।  प्रकृति सम्बन्धी गीतों में गुरुदेव ने जड़ और चेतन दोनों के प्रति वाणी मुखर की है। नृत्य-नाटक के लिये उन्होंने रचना तैयार की तथा कथावस्तु इस प्रकार गठित की कि उसका प्रभाव श्रोता/दर्शक को तत्काल हो। उनके गीतनाट्यांे को कलामंच पर हमेशा प्रसिद्ध मिली है। इसके अलावा उन्होंने विविध गीतों को गुंथा। गुरुदेव भावपूर्ण संगीत के लिये ताल को भी सहज-सुगम करने को कहते। सांगीतिक दृष्टि से देखें तो पता चल जाता है कि भावपूर्ण गायन के लिये उन्होंने ऐसे प्रयोग किये। यही कारण है कि रवीन्द्र संगीत का प्रभाव फिल्म संगीत पर भी पड़ा। सचिनदेव बर्मन, आर0सी0बोड़ाल, हेमन्त कुमार, सलिल चैधरी, पंकज मलिक, पहाड़ी सान्याल इत्यादि संगीतकारों की रचनाएं इसके उदाहरण हैं। 

यह वेबसाइट  शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया द्वारा विकसित की है।

@ 2020 शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया सर्वाधिकार सुरक्षित।

  • Facebook - Black Circle
  • Twitter - Black Circle

Ramgarh (Uttarakhand), India