गुरुदेव की स्मृतियों का संरक्षण और उनके शिक्षा-दर्शन  की आवश्यकता

मोहन चन्द्र जोशी 

एक साहित्यकार जब अपनी भावाभिव्यक्ति को विभिन्न साहित्यिक विधाओं व सांकेतिकता के माध्यम से प्रस्तुत करता है तो उसमें न केवल उसकी साहित्य साधना परिलक्षित होती है बल्कि उसका सम्पूर्ण जीवन दर्शन एवं उसकी संवेदनशीलता परिलक्षित होती है। गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर अपने समय के एक ऐसे साहित्यकार थे जिनके बारे में कहा जाता है कि मानो एक उच्चकोटि के साहित्य ने साक्षात् मानव देह धारण कर ली हो। उनकी रचनाओं में मानव जीवन की हर परिस्थिति की अभिव्यक्ति होती है। गुरूदेव एक संवेदनशील व्यक्ति थे जिन्हें प्रकृति के कण-कण से अगाध लगाव था। प्रातःकालीन सूर्योदय की रमणीयता हो या घनघोर घटाओं की मानवीय परिस्थितियों के अनुरूप भावोन्वेषणता, अपने आराध्य से रागात्मक भाव में हृदय की सहज अभिव्यक्ति हो या फिर स्वयं की चाह के प्रति अनुग्रह, सब परिस्थितियों की भावाभिव्यक्ति उनके साहित्य में दृष्टिगोचर होती है। 

जिस ’’गीतांजलि’’ के लिए उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया उसकी प्रत्येक पक्ति में भौतिक प्रतिमानों के माध्यम से आध्यात्मिक जगत की रहस्यावादिता की अनुभूति होती है। वैसे तो गुरूदेव के द्वारा रचित मूल ’’गीतांजलि’’ (जिसे बंगला भाषा में लिखा गया है) में कविताओं का कोई शीर्षक नही दिया गया है, परन्तु हिन्दी अनुवादित गीतांजलि में उनकी पहली कविता ’’तेरी कृपा’’ शीर्षक से मिलती है जिसमें वे कहते हैं-

तूने मुझे अनन्त बनाया है, ऐसी तेरी लीला है,
तू इस भंगुर-पात्र (शरीर) को बार-बार खाली करता है 
और नवजीवन से उसे सदा भरता रहता है। 
तूने  इस बाॅस की नन्हीं सी बाॅसुरी को पहाड़ियों और घाटियों में फिराया है
और तूने इसके द्वारा ऐसी मधुर तानें निकाली हैं जो नित्य नई हैं। 
मेरा छोटा सा हृदय, तेरे हाथों के अमृतमय स्पर्श से 
अपने आनन्द की सीमा को खो देता है और फिर
उसमें ऐसे उद्गार उठते हैं जिनका वर्णन नही हो सकता।

अपने आराध्य के प्रति ऐसी परोपकार की भावना शायद ही समकालीन साहित्य में देखी गई हो। आज के भौतिकवादी जीवन में जहाॅ शरीर को ही मानव का वास्तविक स्वरूप समझा जाता हो तब मानव शरीर को क्षण-भंगुर ’पात्र’ न केवल कहना बल्कि शरीर को क्षण-भंगुर मानते हुए तदानुसार अनुशरण करना शायद गुरूदेव जैसे मनीषी के लिए ही सम्भव है। 


आज जब सम्पूर्ण संसार मानव जीवन के वास्तविक स्वरूप को न पहचान कर केवल भोग-विलाश और मोह-माया में ही जीवन की सार्थकता समझता है, आपने शारीरिक और मानसिक परिपोषण के लिए भोज्य और अभोज्य के बीच अन्तर करना भी भूल गया है, तब ऐसा कोई तो हो, जो एक लक्ष्मण रेखा खीच सके और मनुष्य को मनुष्य बने रहने में मार्गदर्शक का कार्य कर सके। कोई ऐसा ध्येय जो हमें यह बता सके कि  शारीरिक और मानसिक शुद्धि के क्या मानक और ध्येय हों ? यदि अपने अराध्य का परम स्पर्श अनुभव करके, उसके स्पर्श की पवित्रता को बनाये रखने के लिए ही सही, यदि हम इस काया की देखभाल कर इसकी पवित्रता को बनाये रख सकें तो भी जीवन सार्थक तो हो ही जायेगा। गुरूदेव ने ’गीतांजलि’ में कहा है -
’’हे जीवन-प्राण, यह अनुभव करके कि
मेरे सब अंगों में तेरा सचेतन स्पर्श हो रहा है,
मैं अपने शरीर को सदैव पवित्र रखने का यत्न करूॅगा।’’

हृदय की पवित्रता को बनाये रखने के लिए गुरूदेव ने उस परम-प्रकाश के दीपक को अपने हृदय में अनुभव किया और सहज रूप से लिख दिया -
हे परम-प्रकाश, यह अनुभव करके कि तूने मेरे हृदय में बुद्धि के दीपक जलाये हैं
मैं अपने विचारों से समस्त असत्यों को दूर रखने का सदैव यत्न करूॅॅगा।

ऐसा नही है कि ’’गीतांजलि’’ में केवल आध्यात्मिकता का सन्देश देती रचनाओं को ही संकलित किया गया हो। उन्होंने सच्ची ईश्वर भक्ति का आधार जनमानस की सच्ची सेवा को माना है। किसान, मजदूर आदि मेहनत करने वालों के कर्मकौशल में ईश्वर के सच्चे स्वरूप की परिकल्पना की है। सच्ची उपासना कविता में वे कहते हैं- 
’’इस पूजापाठ भजनगान और माला के जाप को छोड, सब द्वारों को बंद करके मन्दिर के एकान्त अँधेरे कोने में तू किसकी पूजा करता है? आंखें तो खोल और देख कि तेरा ईश्वर तेरे सामने नही है। वह तो वहाॅ है जहाॅ किसान कड़ी भूमि में हल चला रहा है और सड़क बनाने वाला पत्थर तोड़ रहा है। वह धूप और पानी में उनके साथ है और उसके कपड़े धूल से आच्छादित हो रहे  हैं- तू अपने पवित्र वस्त्र उतार डाल और उसके सामने धूल भरी भूमि में उतर आ।’’ 

सांसारिक बन्धनों के प्रति उनका स्पष्ट मन्तव्य था कि जिन बन्धनों को स्वयं ईश्वर ने स्वयं सहर्ष स्वीकार किया है उनसे हम मुक्ति की कामना क्यों करें? क्योंकि ईश्वर तो सदा के लिए हमारे साथ इन बन्धनों के द्वारा हमारे साथ स्वयं बॅधा ही है। जीवन को एक यात्रा के रूप में वर्णित करते हुए गुरूदेव मानते हैं कि ईश्वर हमेशा जीव के साथ इस जीवन यात्रा में रहता है। ’दीर्घ-यात्रा’ कविता में उन्होंने स्पष्ट किया है कि -
’’मेरी यात्रा में बड़ा समय लगता है और उसका मार्ग लम्बा है। 
मैं यात्रा के लिए प्रकाश की प्रथम किरण के साथ रथ पर निकला था। 
ग्रहों और तारों में लोक और लोकान्तर में,
बनों और पवर्तो में, घूम फिर कर में अपने भ्रमण के चिन्ह छोड आया हूॅ।
सबसे अधिक दूरी का मार्ग ही तेरे सबसे निकट आ जाता है..............’’

’’गीतांजलि’’ गुरूदेव की वह रचना थी जिनका विश्व की अनेक भाषाओँ में अनुवाद किया गया और दुनियां के साहित्य प्रेमियों ने इसका रसास्वादन किया। यहाँ तक कि गीतांजलि की मूल रचना को पढ़ने के लिए अनेक लोगों ने बांग्ला भाषा भी सीखी। तात्पर्य यह है कि गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर समकालीन युग के सामान्य मानव नहीं थे। वे एक मनीषी थे, जिन्होंने समाज में शिक्षा, साहित्य, संगीत, चित्रकला, आयुर्वेद आदि में नये प्रतिमान स्थापित किये और उनके माध्यम से समाज को नई दिशा प्रदान करने की कोशिश की। ऐसे प्रतिमान जो न केवल भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप थे बल्कि धरती में मानव जाति के दीर्घ अस्तित्व के लिए आवश्यक थे। चूॅकि तत्कालीन परिस्थिति में भारत पराधीनता के दंश से आक्रान्त था ऐसी परिस्थिति में भी उन्होंने शिक्षा का एक ऐसा केन्द्र स्थापित किया जो भारतीय परिस्थितियों के लिए आदर्श शिक्षा का माध्यम बनता। जब सम्पूर्ण विश्व ने उनके दर्शन को स्वीकार कर साहित्य के नोवेल पुरस्कार से सम्मानित कर दिया तो भारत की तो सम्पूर्ण राष्ट्रनीति ही उनके विचारों के अनुरूप होनी चाहिए थी। परन्तु यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि भारत भूमि ने अनेक ऐसे मनीषियों को जन्म दिया जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व में मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया, परन्तु भारत में उनके विचारों को आगे बढाने के लिए कोई राष्ट्रनीति नहीं बन पाई। आचार्य चाणक्य के बाद तो ऐसा कभी नहीं हो पाया। 

गुरूदेव ने ’शांतिनिकेतन’ की स्थापना की, ताकि शिक्षा के माध्यम से बाल्यकाल से ही मानव में वह संस्कार डाले जा सके जिससे वह एक परिपूर्ण जीवन प्राप्त कर सके। कहा जाता है कि उत्तराखण्ड के नैनीताल जिले में स्थित रामगढ़ में उन्होंने शांतिनिकेतन की स्थापना का स्वप्न देखा था। ऐसा महादेवी वर्मा जी ने अपनी पुस्तक ’पथ की साथी’ में लिखा भी है। यदि ऐसा नहीं भी था तब भी इतना तो प्रामाणिक रूप से स्पष्ट है कि गुरूदेव सन् 1903 से लगातार रामगढ़ नैनीताल में आते रहे। यहाॅ पर उनका एक बंगला था वे यहाॅ लोगों को आयुर्वेद के माध्यम से उपचार करते थे, वर्तमान टैगोर टाॅप की एक शिला पर बैठ कर कुछ लिखा करते थे। हमारे लिए क्या इतना पर्याप्त नही है कि एक विश्व प्रसिद्ध साहित्यकार एवं दार्शनिक हमारे बीच रहा और हमारे लोक जीवन में ऐसे रचा-बसा जैसे वह यहीं का हो। फिर और क्या प्रमाण चाहिए?

गुरूदेव जैसे मनीषी जहाॅ रहते हैं ऐसे स्थान स्वयं ही श्रीनिकेतन या आश्रम बन जाते हैं। गुरूदेव रामगढ़ में जिस बंगले में रहे, या जिस शिला पर वे साहित्य रचना करते थे या चिन्तन में बैठे रहते थे, वह स्थान अपने आप में उसी समय ’शांतिनिकेतन’ बन गया था। मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है इस कारण तत्कालीन परिस्थितियों में गुरूदेव रामगढ़ में शिक्षा के किसी केन्द्र को स्थापित नहीं कर सके होंगे। ऐसे में क्या उनके बाद हमारा दायित्व नहीं बनता कि हम उनके विचारों के अनुरूप एक ऐसे संस्थान की स्थापना वहां पर करेें, जो गुरूदेव के जीवन आदर्श एवं शिक्षा-दर्शन पर आधारित हो? इस दिशा में सम्यक रूप से न केवल विचार किया जाना अति आवश्यक है बल्कि ठोस कार्यवाही भी की जानी आवश्यक है। 

गुरूदेव के विचारों के अनुरूप रामगढ में एक संस्थान की स्थापना हो, ऐसा विचार इससे पूर्व भी आता रहा है। सन् 1961 में उ0प्र0 के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री चन्द्रभानु गुप्त ने इस सम्बन्ध में श्री यशवंत सिह अधिवक्ता के इस प्रस्ताव पर सहमति व्यक्त की थी कि जिसमें रामगढ़ के टैगोर टाॅप में एक ’टैगोर स्मारक’ बनाया जाय। परन्तु भारत-चीन युद्ध के कारण यह कार्य अवरूद्ध हो गया। वर्तमान में भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्री डा0 रमेश पोखरियाल ’निशंक’ जी जब उत्तर-प्रदेश सरकार में संस्कृति एवं धर्मस्व मंत्री थे तब 17 अप्रैल 2000 को महादेवी वर्मा सृजन पीठ रामगढ़ आये थे। उनके द्वारा गुरूदेव की स्मृतियों को संग्रहित करने के उद्देश्य से ’रबीन्द्र संग्रहालय’ की स्थापना हेतु स्वीकृति भी प्रदान की थी। हिमालयन एजुकेशनल रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट सोसाइटी (हर्डस) तथा शान्तिनिकेतन ट्रस्ट फाॅर हिमालया द्वारा प्रति वर्ष रामगढ़ मेें ’रबीन्द्र जन्मोत्सब’ का आयोजन बडे घूमधाम से किया जा रहा है। ऐसे आयोजन से न केवल क्षेत्रवासियों में गुरूदेव के विचारों का प्रसार हो रहा है बल्कि रबीन्द्रनाथ टैगोर के बारे में समग्र रूप से जानकारी भी प्राप्त हो रही है। इस अवसर पर प्रति वर्ष राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है जिसमें अनेक विश्वविद्यालयों के प्रतिनिधि बढ़-चढ़ कर प्रतिभाग करते हैं। गुरूदेव जैसे विराट व्यक्तित्व के लिए इतना ही पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि मानव जाति के अस्तित्व को बचाने के लिए गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर, महर्षि अरबिन्द, महात्मा गाॅधी जैसे मनीषियों के जीवन दर्शन के अनुरूप जीवन पद्यति अपनाई जानी आवश्यक है। इसके लिए इन महान विभूतियों के जीवन से जुडी वस्तुओं, स्थानों, साहित्य, कला एवं दर्शन से जुडी हर छोटी-बड़ी चीज का सम्यक संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार शिक्षा के माध्यम से संस्थागत रूप में होना अति आवश्यक है। 

यह वेबसाइट  शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया द्वारा विकसित की है।

@ 2020 शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया सर्वाधिकार सुरक्षित।

  • Facebook - Black Circle
  • Twitter - Black Circle

Ramgarh (Uttarakhand), India