रबीन्द्रनाथ ठाकुर की कृति गीतांजलि से संगीतात्मक कविताएं

डॉ. डोमन साहु 'समीर'

रबीन्द्रनाथ ठाकुर की कृति 'गीतांजलि' नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी है। इस किताब में लिखी कविताओं का अनुवाद डॉ. डोमन साहु 'समीर' ने किया है। विशेष यह है कि इस किताब में लिखी प्रत्येक कविता एक स्वर लिए हुए है जिसे आप अपनी धुन में गा भी सकते हैं। रबीन्द्रनाथ टैगोर के नाम से रबीन्द्र संगीत भी प्रसिद्ध है। उन्होंने कई गीत लिखे हैं। विश्व संगीत दिवस के मौके पर पढ़ें उनके लिखे कुछ ख़ास गीत :

आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में
आओ गन्धों में, वर्णों में, गानों में
आओ अंगों में तुम, पुलकित स्पर्शों में
आओ हर्षित सुधा-सिक्त सुमनों में
आओ मुग्ध मुदित इन दोनों नयनों में
आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में

आओ निर्मल उज्जवल कान्त
आओ सुन्दर स्निग्ध प्रशान्त
आओ, आओ है वैचित्र्य-विधानों में

आओ सुख-दुख में तुम आओ मर्मों में
आओ नित्य-नित्य ही सारे कर्मों में
आओ, आओ सर्व कर्म-अवसानों में
आओ नव-नव रूपों में तुम प्राणों में
मैं तो यहां रहा हूं गाने को ही गीत तुम्हारा
देना अपनी जगत-सभा में स्थान मुझे थोड़ा-सा

मैं न रहा हूं किसी का, नाथ! तुम्हारे भव में
इस अकर्म के प्राण रहे बजते अपने ही स्वर में

करूं रात को नीरव मन्दिर में आराधन जब मैं
आदेशित करना तब मुझको, हे राजन! गाने को

प्रात: जब झंकृत हो वीणा नभ में स्वर्णिम स्वर में,
दूर नहीं रह जाऊं तब मैं, मिले मान इतना-सा
यहां गीत जो मैं गाने को है आया,
नहीं गीत वह मैं तो हूं गा पाया
आज तलक स्वर ही साधा है मैंने 
केवल कुछ गा लेना ही है चाहा

स्वर थोड़ा भी सध न सका है मेरा
वाक्यों में न शब्द अब तक बँध पाये
गा पाने की व्याकुलता ही केवल
रही उभरती है प्राणों में मेरे
खिला नहीं है फूल आज तक भी तो
चलती रही हवा ही केवल अब तक

देख न पाया मुखड़ा मैं उसका 
सुन न सका हूं मैं तो उसकी वाणी
पगध्वनि ही मैं पल-पल सुनता उसकी
मेरे दर होकर वह आता-जाता
भजन, पूजन, साधन, आराधन सब कुछ रहें पड़े,
रुद्ध द्वार मन्दिर के कोने में है क्यों तू रे
अन्धकार में छिपा हुआ है तू मन-ही-मन अपने
लगा हुआ है किसके पूजन में संगोपन में
नेत्र खोलकर देख, देवता हैं न यहां घर में

वे हैं जहां किसान काटते मिट्टी, कृषि करते हैं
श्रमिक तोड़ते पत्थक पथ-निर्माण जहां करते
धूप ताप वर्षा में वे तो साथ उन्हीं के हैं
लगी धूल-मिट्टी है उनके दोनों हाथों में
आ जा तू भी वस्त्र त्याग शुचि उन सा ही रज में 
तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे
फिर चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे
ओ तू चल अकेला चल अकेला चल अकेला चल अकेला रे

यदि कोई भी ना बोले ओरे
ओ रे ओ अभागे कोई भी ना बोले
यदि सभी मुख मोड़ रहे सब डरा करे
तब डरे बिना ओ तू मुक्त कंठ
अपनी बात बोल अकेला रे
तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

यदि लौट सब चले ओ रे ओ रे ओ अभागे लौट सब चले
यदि रात गहरी चलती कोई गौर ना करे
तब पथ के कांटे ओ तू लहू लोहित चरण तल चल अकेला रे
तेरी आवाज़ पे कोई ना आये तो फिर चल अकेला रे

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