टैगोर से जुड़ी रोचक घटना जिसके बाद रबीन्द्रनाथ का नजरिया ही बदल गया

देवेंद्र बिष्ट

महान कवि रबीन्द्रनाथ टैगोर की आज जयंती है। रबीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था। उन्होंने पहली कविता मात्र आठ साल की उम्र में लिखी। टैगोर ने 2000 से ज्यादा गीतों की रचना की। सात अगस्त 1941 को कोलकाता में ही उनकी मृत्यु हो गई। भारत के वायसराय लार्ड कर्जन की नीति 'डिवाइड एंड रूल' के खिलाफ आंदोलन का आगाज कोलकाता की सरजमीं से 16 अक्टूबर 1905 में भारत व बांग्लादेश के राष्ट्रगान के रचयिता रवींद्रनाथ टैगोर ने किया था।

गुरुदेव टैगोर की कविताओं में हमें अस्तित्व के असीम सौन्दर्य और भक्ति के दर्शन होते हैं। क्या इसी असीम का अनुभव उन्होंने अपने भीतर भी किया था? उनकी बहुत-सी कविताएं प्रकृति के सौन्दर्य से जुड़ी हैं। वह अकसर दैवीयता/दिव्यता, अस्तित्व, कुदरत व सौंदर्य सहित तमाम चीजों के बारे में बहुत कुछ कहते, जबकि खुद उन्हें इस चीज को कहीं कोई अनुभव नहीं था।

वहीं पास में एक बुजर्ग व्यक्ति रहा करते थे, जो खुद एक सिद्ध व्यक्ति थे। यह बुजुर्ग दूर से कहीं उनके रिश्ते में भी लगते थे। जब भी टैगोर कहीं भाषण या व्याख्यान देने जाते तो यह बुजुर्ग सज्जन भी वहां पहुंच जाते और उन्हें देखते रहते। जब भी रबीन्द्रनाथ उनकी तरफ देखते तो वह अचानक असहज हो जाते।


यही नहीं, समय-समय पर वह बुजुर्ग मौका मिलते ही टैगोर से सवाल करने लगते कि तुम इतना सत्य के बारे में बात करते हो, लेकिन क्या सचमुच तुम इसके बारे में जानते हो? टैगोर को पक्के तौर पर यह नहीं पता था कि वह बुजुर्ग जानते हैं कि उन्हें इस बारे में कुछ पता नहीं है। हालांकि, टैगोर इतने महान लेखक थे कि जब आप उनकी कविता पढ़ते हैं तो कहीं से भी यह नहीं लगता कि वह बिना अनुभव या बिना जानें उन्होंने ऐसी चीजें लिखी होंगी। इसके बावजूद वह बुजुर्ग उनसे इसे लेकर लगातार सवाल करते रहते। इसलिए जब भी गुरुदेव की नजरें उनसे मिलती, वह सकपका उठते। हालांकि, धीरे-धीरे उनके भीतर भी इसे लेकर एक खोज जारी हो चुकी थी कि आखिर वो क्या है, जिसके बारे में मैं बात तो करता हूं, लेकिन उसे जानता नहीं हूं।


एक दिन बारिश हुई और फिर रुक गई। टैगोर को हमेशा नदी के किनारे सूर्यास्त देखना बहुत अच्छा लगता था, तो उस दिन भी टैगोर सूर्यास्त देखने के लिए नदी के किनारे की ओर चले जा रहे थे। रास्ते में काफी गड्ढे थे, जो पानी से भरे थे। टैगोर उन गड्ढों से बचते हुए सूखी जगह तलाशते हुए आगे बढ़ रहे थे। तभी उनकी नजर रास्ते में पानी से भरे एक गड्ढे पर पड़ी, जहां प्रकृति का पूरा प्रतिबिम्ब उसमें झलक रहा था। यह देख उनके भीतर अचानक कुछ बहुत अजीब-सा घटित हुआ। इसके बाद वह वहां से सीधे उस बुजुर्ग के घर गए और जाकर उनका दरवाजा खटखटाने लगे। यह देख टैगोर को समझ में आ गया कि बुजुर्ग उनसे किन आंखों से चीजों को देखने के बारे में कहते थे। बुजुर्ग ने दरवाजा खोला व एक नजर टैगोर को देखा और फिर बोले, 'अब तुम जा सकते हो, क्योंकि तुम सच जान चुके हो। यह तुम्हारी आंखों में साफ दिखाई दे रहा है।' इसके बाद रवींद्रनाथ का नजरिया ही बदल गया।


साहित्य की शायद ही कोई शाखा हो जिनमें उनकी रचनाएं नहीं हों। गुरुदेव ने कविता, गीत, कहानी, उपन्यास, नाटक आदि सभी विधाओं में रचनाओं का सृजन किया। उनकी कई कृतियों का अंग्रेजी में भी अनुवाद किया गया है। अंग्रेजी अनुवाद के बाद पूरा विश्व उनकी प्रतिभा से परिचित हुआ। नोबेल पुरस्कार प्राप्त टैगोर दुनिया के संभवत: एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी रचनाओं को दो देशों ने अपना राष्ट्रगान बनाया।

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