कोरोना वायरस से बचाव और शिक्षा के प्रसार में जीवन-रेखा बन सकता है कम्युनिटी रेडियो

डॉ० सर्वेश उनियाल  

कोरोनावायरस के संक्रमण के दौरान प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक का परंपरागत ढांचा बदल रहा है। सोशल डिस्टेंस बनाये रखने हेतु ऑनलाइन शिक्षा प्रणाली समय की सबसे बड़ी जरूरत बन गई है। परन्तु भारत के ग्रामीण हिस्सों में मुख्यधारा के मीडिया की खराब उपस्थिति, कमजोर इंटरनेट कनेक्टिविटी एवं शिक्षार्थियों के कमजोर तकनीकी ज्ञान के कारण अधिकांश छात्र ऑनलाइन शिक्षा से वंचित हो रहे हैं। आज भी देश के कई स्थानों पर इंटरनेट और स्मार्टफोन की सुविधा नहीं है, ऐसे समय में कम्युनिटी रेडियो स्टेशन न केवल सरकार के लिए, बल्कि लोगों के लिए भी एक जीवन-रेखा बन सकते हैं। खासकर जब कोरोनोवायरस के कारण पूरा देश लॉकडाउन में है, ये स्टेशन स्थानीय चिंताओं को पहचानने एवं श्रोताओं को शिक्षित करने के लिए सहायक हो सकते हैं।

सामुदायिक अथवा कम्युनिटी रेडियो लोगों के लिए, लोगों का, लोगों के द्वारा बनाया एक सशक्त माध्यम है जो देश के अंतिम छोर के व्यक्ति अथवा ग्रामीण को अपनी बात कहने की पूरी आजादी देता है। मुख्यधारा की मीडिया ग्रामीण इलाकों में सूक्ष्म स्तर पर इनवॉल्व नहीं हो पाती। ऐसे में कम्युनिटी रेडियो ग्रामीण इलाकों के लोगों से जुडऩे, लोक संस्कृति को जीवंत बनाने और उन्हीं की भाषा में सूचना देने के सबसे बेहतर औजार बन सकता है। आपदाओं के दौरान बिजली और इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षतिग्रस्त होने से टीवी, केबल, इंटरनेट या फोन कनेक्शन प्रभावित हो जाते हैं। ऐसे में कम्युनिटी रेडियो ही स्थानीय लोगों के लिए सूचना का एकमात्र जरिया होते हैं। 

कम्युनिटी रेडियो में स्थानीय स्वाद का महत्व निर्विवाद है और यह मास मीडिया सेवा के इस स्वरूप की सबसे बड़ी खासियत है। कम्युनिटी रेडियो स्टेशनों की भूमिका इसलिए महत्‍वपूर्ण है, क्योंकि आबादी का जो कमजोर तबका है, उसे कोरोना वायरस से बचाव के संबंध में विश्वसनीय सूचना चाहिए, वह भी स्थानीय भाषा में। इस काम को कई कम्युनिटी रेडियो बड़ी जिम्मेदारी से निभा सकते हैं और निभा भी रहे हैं। ये रेडियो उस जगह की वास्तविक स्थिति से वाकिफ होते हैं, इसीलिए उनकी जानकारी वहां की आवाज और जरूरतों के अनुरूप होती है। दुनिया भर में यह माना जाता है कि कम्युनिटी रेडियो लोकल लोगों की जरूरत को आवाज देता है। वह ऐसे मुद्दे उठाता है, जो उनकी जिंदगी को प्रभावित करते हैं और अक्सर मेन स्ट्रीम मीडिया में नजरअंदाज किये जाते हैं। 

गुड़गांव में 'गुड़गांव की आवाज' कम्युनिटी रेडियो है, जो वंचित वर्गों की आवाज बना हुआ है। वह टैक्सी ड्राइवर, सिक्योरिटी गार्ड और क्लीनिंग वर्कर्स की आवाज है। वह लोगों तक राशन पहुंचाने का भी काम कर रहा है। उड़ीसा का एक कम्युनिटी रेडियो, रेडियो ढिम्सा बेहतरीन काम कर रहे है। वो रिमोट गांवों तक सीधे पहुंच कर जागरूकता फैला रहे है। हिमाचल का रेडियो रेडियो गुंजन लोगों तक स्थानीय और हिंदी दोनों में जानकारी पहुंचा रहा है। इसके अलावा, एमिटी विश्वविद्यालय सामुदायिक रेडियो स्टेशन ‘पंचतंत्र का कोरोना मंत्र’नामक कार्यक्रम चला रहा है जिसमें पंचतंत्र की अनेक कहानियों का इस्तेमाल कोरोना वायरस से जुड़े संदेश देने के लिए किया जा रहा है।  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के पहले बजट में कम्युनिटी रेडियो को बढ़ावा देने के लिए 100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। कोरोना वायरस के बचाव हेतु किये जा रहे लॉकडाउन में एजुकेशन का महत्व समझते हुए मोदी सरकार द्वारा 20 लाख करोड़ रुपये के विशेष आर्थिक पैकेज में भी पीएम ईविद्या योजना के तहत कम्युनिटी रेडियो को प्राथमिकता से रखा गया है।  

क्या है कम्युनिटी रेडियो?
कम्युनिटी रेडियो भारत सरकार की एक ऐसी सोच का हिस्सा है, जिसमें कम्युनिटी खुद का रेडियो स्टेशन स्थापित कर अपने आसपास एक सीमा के अंदर रेडियो पर कार्यक्रम प्रसारित कर सके। शुरू में यह आईआईटी और आईआईएम जैसे उच्च संस्थानों के लिए तय किया गया था और उन्हें ही कम्युनिटी रेडियो स्थापित करने की इजाजत दी गयी थी। यह प्रयोग सफल रहा और सरकार ने इसका दायरा बढ़ाने का फैसला किया। इसके तहत सामाजिक क्षेत्र में काम करने वाली उन स्वयंसेवी संस्थाओं को भी कम्युनिटी रेडियो का लाइसेंस दिया जाने लगा, जो सोसाइटी रजिस्ट्रेशन एक्ट के तहत पंजीकृत हैं और गैर लाभकारी यानी नॉन-प्रोफिटेबल हैं। पंजीकृत एनजीओ के अलावा पंजीकृत ट्रस्ट, कृषि विज्ञान क्षेत्र, कृषि विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय और अन्य शिक्षण संस्थानों को भी कम्युनिटी रेडियो स्टेशन स्थापित करने की अनुमति दी जा रही है।  

कम्युनिटी रेडियो के कुछ महत्वपूर्ण बिंदु 
कम्युनिटी रेडियो के लाइसेंस के लिए कोई भी गैर सरकारी संगठन और शिक्षण संस्थान आवेदन कर सकता है, parantu ये संगठन कम से कम तीन साल से पंजीकृत हो ये अनिवार्य है। उसके बाद लाइसेंस के लिए निर्धारित प्रक्रिया के तहत और निर्धारित फॉर्म में आवेदन करना होगा. एक बात हमेशा ध्यान में रखना होगा कि यह लाइसेंस आपको व्यक्तिगत लाभ कमाने के लिए नहीं मिलेगा. आप समुदाय के हित में नो लॉस-नो प्रोफिट की शर्त पर कम्युनिटी रेडिया स्टेशन चला सकते हैं. कम्युनिटी रेडियो के लिए केन्द्रीय वित्त सहायता उपलब्ध नहीं है। कम्युनिटी रेडियो लाइसेंस के हकदार वो होते हैं जो 100 वाट रेडियो स्टेशन चलाते हो, इसका कार्यक्षेत्र कम से कम 12 किलोमीटर की त्रिज्या में हो। इसके तहत संचालक अधिकतम 30 मीटर ऊँचा एंटीना लगा सकता है।

कैसे करेंगे आवेदन?
आवेदन के लिए हर साल सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, समाचार-पत्रों तथा अन्य माध्यमों में विज्ञापन देता है। आप ऑनलाइन भी आवेदन कर सकते हैं। आवेदन के साथ प्रोसेसिंग चार्ज के रूप में 2500 रुपये का शुल्क भी देना होता है। आपके आवेदन पर मंत्रालय की एक उच्च समिति विचार करती है और फिर आपको लाइसेंस जारी किया जाता है। विश्विद्यालयों और सरकारी शिक्षण संस्थानों को मंत्रलय सीधे ही एक फ्रीक्वेंसी आवंटित करता है और रेडियो स्टेशन स्थापित करने की अनुमति दे दी जाती है।

अन्य संस्थानों को फ्रीक्वेंसी आवंटित करने की प्रक्रिया
अन्य आवेदकों और निजी शिक्षण संस्थानों को भी फ्रीक्वेंसी आवंटित होती है, लेकिन इसकी प्रक्रिया गृह मंत्रालय , रक्षा मंत्रालय और मानव संसाधन विकास मंत्रालय से स्वीकृति मिलने के बाद संचार एवं सूचना प्रोद्योगिकी मंत्रालय के डब्लूपीसी विंग द्वारा पूरी की जाती है। वहां से फ्रीक्वेंसी आवंटित होने के बाद सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय आपको लैटर ऑफ इंटेंट जारी करता है। लाइसेंस अनुमति मंजूरी करार पर हस्ताक्षर के समय 25 हजार रुपये की बैंक गारेटी देनी होगी।

प्रसारण का दायरा 
कम्युनिटी रेडियो कम दायरे में प्रसार सुने जाने के लायक होता है। इसके लिए दो तरह के ट्रांसमीटर होते हैं. सामान्य तौर पर पांच से 10 किलोमीटर तक इसके प्रसारण की अनुमति होती है। यह दूरी एयरियल डिस्टेंस यानी आसमानी दूरी होती है। इसके लिए 100 वॉट का ट्रांसमीटर लगाया जाता है। विशेष परिथितियों में 250 वॉट का ट्रांसमीटर लगाने की अनुमति दी जाती है।

कम्युनिटी रेडियो स्टेशन हेतु जगह 
कम्युनिटी रेडियो स्टेशन के लिए बहुत बड़ी जगह की जरूरत नहीं होती है। 100 वर्ग फुट के कमरे में भी आप रेडियो स्टेशन बना सकते हैं और वहां से इसका प्रसारण कर सकते हैं। चूंकि यह चौबीस घंटे कार्यक्रम प्रसारण वाला रेडियो नहीं है। इसलिए इसे बहुत अधिक पावर बैक की भी जरूरत नहीं पड़ती है। इसमें खास है इसका एंटिना, जिससे इसके प्रसारण को सुना जाता है। यह एंटिना जमीन से कम से कम 15 मीटर और अधिक से अधिक 30 मीटर ऊंचा होना चाहिए। इसकी ऊंचाई इस बात पर भी निर्भर करता है कि जिस क्षेत्र में आप कम्युनिटी रेडियो लगा रहे हैं, वहां की प्राकृतिक बनावट क्या है? 
एंटिना आपको वहीं लगाना है, जहां आपका रेडियो स्टेशन है और जहां रेडियो स्टेशन लगाने की आपको अनुमति मिली है। इसके स्थल का चयन इस तरह किया जाता है कि जिस समुदाय या वर्ग के लिए आप कार्यक्रम का प्रसारण करना चाहते हैं, वह इसके दायरे में आता हो। अगर विश्वविद्यालय, कृषि महाविद्यालय या कोई शैक्षणिक संस्थान सामुदायिक रेडियो स्टेशन लगाता है, तो वह अपने ही परिसर में इसका ट्रांसमीटर और एंटिना लगायेगा।

स्थापित करने की लागत
आम तौर पर एक सामुदायिक रेडियो स्टेशन स्थापित करने में करीब दो से पांच लाख रुपये लगते हैं। वैसे 27 लाख तक के मॉडल उपलब्ध हैं। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह की मशीन खरीदते हैं, कितनी देर कार्यक्रम प्रसारित करते हैं, और कैसा स्टूडियो बनाते हैं। बाजार में अच्छे उपकरणों की कमी नहीं है। संपर्क करने पर पुराने उपकरण भी कम दाम पर मिल जाते हैं और वहां लागत स्वाभाविक रूप से कम पड़ती है।


 

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