छोलिया नृत्य - श्रृंगार और वीर रस का कलात्मक स्वरुप 

के० के० पाण्डेय्

छलिया नृत्य (जिसे छोलिया भी कहा जाता है) उत्तराखंड राज्य के कुमाऊं क्षेत्र का एक प्रचलित लोकनृत्य है। यह एक तलवार नृत्य है, जो प्रमुखतः शादी-बारातों या अन्य शुभ अवसरों पर किया जाता है। यह विशेष रूप से कुमाऊँ मण्डल के पिथौरागढ़, चम्पावत, बागेश्वर और अल्मोड़ा जिलों में लोकप्रिय है। इतिहासकारों के अनुसार मूलरूप में कुमाऊं अंचल का यह प्रसिद्ध नृत्य पीढ़ियों से उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान रहा है। छोलिया नृत्य की विशेषता यह है कि इसमें एक साथ श्रृंगार और वीर रस दोनों के दर्शन हो जाते हैं। 

छोलिया नर्तकों, जिन्हें छोल्यार भी कहा जाता है, की पोशाक अत्यंत दर्शनीय होती है। पोशाक में लाल-नीले-पीले वस्त्रों की फुन्नियों और टुकड़ों की मदद से सजाया गया सफ़ेद घेरेदार चोला, सफ़ेद चूड़ीदार पाजामा, कपडे का रंगीन कमरबंद मुख्य होता है। इसके अलावा सिर में पगड़ी, कानों में बालियां, पैरों में घुंघरू की पट्टियां और चेहरे पर चंदन और सिंदूर लगे होने से पुरुषों का एक अलग ही अवतार दिखता है। 

एक छलिया टीम में सामान्यतः २२ कलाकार होते हैं, जिनमें 8 नर्तक तथा 14 संगीतकार होते हैं। इस नृत्य में नर्तक युद्ध जैसे संगीत की धुन पर क्रमबद्ध तरीके से तलवार व ढाल चलाते हैं, जो कि अपने साथी नर्तकियों के साथ नकली लड़ाई जैसा प्रतीत होता है। नृत्य के समय नर्तकों के मुख पर प्रमुखतः उग्र भाव रहते हैं, जो युद्ध में जा रहे सैनिकों जैसे लगते हैं। इस नर्तक-टोली के साथ संगीतकारों का एक दल अलग से चलता है जो मशकबीन, तुरही, ढोल, दमामा और रणसिंघा जैसे लोक-वाद्य बजाती हुई चलती है। नर्तकों को अपनी शारीरिक चपलता और चतुरता से विरोधी सैनिकों के दांव-पेंचों की नक़ल करनी होती है जिससे वे छल के माध्यम से शत्रु को परास्त कर सके। संभवतः इसी कारण इसे छोलिया (अथवा छलिया) का नाम दिया गया है। 

नर्तकों को नृत्य के समय अपने चेहरे के हावभावों के माध्यम से भी खिलंदड़ी, चतुरता और शारीरिक चपलता को प्रदर्शित करना होता है। नर्तक अपने हाव-भाव से एक-दूसरे को छेड़ते हैं और चिढ़ाने व उकसाने के भाव प्रस्तुत करते हैं। इस दौरान जब आस-पास मौजूद लोग रुपये उछालते हैं तो छोल्यार उन्हें तलवार की नोक से उठाते हैं। खास बात ये कि छोल्यार एक-दूसरे को उलझाकर बड़ी चालाकी से रुपये उठाने की कोशिश करते हैं। यह दृश्य देखने में बड़ा आकर्षक लगता है। छोलिया नृत्य के बाजगी बताते हैं कि नर्तकों को गति देने के उद्देश्य से अनेक तरह की तालें हैं जिन्हें अलग-अलग समय के लिए नियत किया गया है। इस नृत्य की रफ़्तार को नियंत्रित करने का काम मुख्य ढोल वादक का ही होता है। लोक विद्वानों के अनुसार ढोल वादक वीरों के उत्साह वर्धन के साथ ही युद्ध कला में भी प्रवीण होते थे। वह युद्ध भूमि में अपने राजा की सेना की स्थिति पर पूरी दृष्टि रखता था, और जरूरत के अनुसार सेना को आगे बढने या या पीछे हटने अथवा किसी विशेष दिशा में बढने तथा युद्ध जीतने के लिये सेना के लिए जरूरी व्यूह रचना ढोल वादन के गुप्त संकेतों के जरिए प्रकट करते थे। ढोल वादक गंगोलिया बाजा, हिटुवा बाजा, बधाई का बाजा, दुल्हन के घर पर पहुंचने का बाजा, वापस गांव की सीमा पर बजने वाला बाजा आदि अलग-अलग प्रकार के बाजे बजाते हैं। 

इतिहासकारों के इस नृत्य को लेकर अलग अलग मत हैं। कुछ लोग इसे युद्ध में जीत के बाद किया जाने वाला नृत्य कहते हैं। अकसर जब कोई राजा युद्ध जीत लेता था तो कई दिनों तक राजमहल में विजय समारोह मनाया जाता था। वीरों को पुरुस्कृत करने के साथ ही उनके युद्ध-कौशल और ढाल-तलवार नचाने की निपुणता का महीनों तक बखान होता रहता था। यह बखान बहुत ही अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से किया जाता था और यह काम राज दरबार के चारण (भाट) किया करते थे। भाटों द्वारा युद्ध वर्णन सुनकर राज दरबार में श्रोताओं के रोंगटे खड़े हो जाते थे।


कहा जाता है कि एक बार किसी विजयी राजा के दरबार में इस तरह के युद्ध वर्णन को सुनकर रानियां अभिभूत हो गईं और उन्होंने भी उस युद्ध में वीरों द्वारा दिखाई गई वीरता को प्रतीक रुप में अपनी आंखों के सामने देखना चाहा। तो राजा के आदेश पर उसके वीर सैनिकों ने स्वयं ही आपस में दो विरोधी दल बनाकर और युद्ध की वेष-भूषा पहनकर ढाल-तलवारों से युद्ध के मैदान की ही तरह प्रतीकात्मक युद्ध नृत्य करने लगे। ढोल-दमाऊं, नगाड़े, नरसिंगा आदि युद्ध के वाद्य बजने लगे और वीरों द्वारा युद्ध की सारी कलाओं का प्रदर्शन किया जाने लगा। उन्होंने इस विजय युद्ध में अपने दुश्मन को वीरता और छल से कैसे परास्त किया, इसका सजीव वर्णन उन्होने राज दरबार में किया। राजमहल में प्रतीक रुप में किया गया यह युद्ध सभी रानियों, राजा और दरबारियों को बड़ा ही पसन्द आया। अतः समय-समय पर इस प्रतीक छलिया नृत्य का आयोजन राज दरबार में होने लगा। अति आकर्षक नृत्य, विविध ढंग से कलात्मक रुप से ढोल वादन, ढाल-तलवार द्वारा वीरों का युद्ध नृत्य समाज में अति लोकप्रिय हुआ और राजशाही खत्म होने के बाद आम लोगों में यह नृत्य के रुप में लोकप्रिय हुआ।  

कुछ इतिहासकार कहते हैं कि तलवार की नोक पर शादी करने वाले राजाओं के शासन की उत्पत्ति का सबूत ये नृत्य है। ऐसा माना जाता है कि छलिया नृत्य की शुरुआत खस राजाओं के समय हुई थी, जब विवाह तलवार की नोक पर होते थे। चंद राजाओं के आगमन के बाद यह नृत्य क्षत्रियों की पहचान बन गया। यही कारण है कि कुमाऊं में अभी भी दूल्हे को कुंवर या राजा कहा जाता है। वह बरात में घोड़े की सवारी करता है तथा कमर में खुकरी रखता है। इस कला का प्रयोग अधिकतर राजपूत समुदाय की शादी के जुलूसों में होता है तथा शादियों में ध्वज ले जाने की परंपरा भी है। वे अपने साथ त्रिकोणीय सफेद और लाल झंडा (निसाण) भी रखते हैं। जब दूल्हा अपने घर से निकलकर दुल्हन के घर जाता है तो आगे सफेद रंग का ध्वज (निसाण) चलता है और पीछे लाल रंग का। निसाण का मतलब है निशान या संकेत। इसका संदेश यह है कि हम आपकी पुत्री का वरण करने आए हैं और शांति के साथ विवाह संपन्न करवाना चाहते हैं। इसीलिए सफेद ध्वज आगे रहता है। 

तलवार और ढाल के साथ किया जाने वाला छोलिया नृत्य को आत्मसम्मान, आत्मविश्वास और चपलता का प्रतीक माना जाता है। इसे पांडव नृत्य का हिस्सा भी माना जाता है। छलिया को शुभ माना जाता है तथा यह भी धारणा है कि यह बुरी आत्माओं और राक्षसों से बारातियों को सुरक्षा प्रदान करता है। परन्तु दुर्भाग्य यह है कि दसवीं सदी से निरंतर चला आ रहा हमारी समृद्ध संस्कृति का परिचायक लोक नृत्य आज व्यवसायिकता और आधुनिकता की अंधी दौड़ में कहीं खोता चला जा रहा है। छलिया नर्तक अब मुख्य रूप से मंच प्रदर्शन से ही जीवन निर्वाह करते हैं और देश के हर कोने में यह लोग विभिन्न कार्यक्रमों में शिरकत करने जाते हैं। 

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