गुरुदेव जीवनवृत्त

रबिन्द्रनाथ टैगोर विलक्षण प्रतिभा के व्यक्ति थे। उनका व्यक्त्वि बहुआयामी था। वे एक ही साथ महान साहित्यकार, समाज सुधारक, अध्यापक, कलाकार एवं संस्थाओं के निर्माता थे। वे एक स्वप्नदृष्टा थे, जिन्होंने अपने सपनों को साकार करने के लिए अनवरत् कर्मयोगी की तरह काम किया। उनकी कालजयी सफलताओं से भारतीयों में आत्मसम्मान का भाव आया। उनके विशाल व्यक्त्वि को राष्ट्र की सीमांए बांध नहीं पायी। वे एक विश्व नागरिक थे। उनका शिक्षा दर्शन सम्पूर्ण वसुधा के संरक्षण एवं विकास का उद्देश्य लेकर चलती है, जिसमें सौन्दर्याभूति है, सत्य है और जीव मात्र का कल्याण है। 
जब हम उनके किसी भी काम को पढ़ते हैं एक निश्चित रूप से एक ही बात सामने आती है यह महान लेखक एक बच्चे के रूप में प्रकृति की गोद में बड़ा हुआ जिसने उस पर एक गहरी छाप छोड़ दी। जिससे स्वतंत्रता की भावना पैदा हुई, जो उन दिनों के प्रचलित सामाजिक रीति-रिवाजों से अपने मन, शरीर और आत्मा को मुक्ति देता था। वह प्रकृति से कितना भी करीब थे पर वह कभी भी जीवन की कठोर वास्तविकताओं से दूर नहीं थे। उन्होंने जीवन और समाज को अपने चारों ओर देखा, कठोर रीति-रिवाजों और मानदंडों से तौला और रूढ़िवाद से ग्रस्त उनकी सामाजिक आलोचनाओं की आलोचना, उनके अधिकांश कार्यों का अंतर्निहित विषय है।

नाम               : रबिन्द्रनाथ टैगोर

जन्म               : 7 मई 1861

जन्म स्थान      : कोलकाता

मृत्यु               : 7 अगस्त 1941, कलकत्ता

पिता का नाम  : देवेंद्र नाथ टैगोर

माता का नाम  : शारदा देवी

पत्नी का नाम   : मृणालिनी देवी (1883-1902)

बच्चों के नाम   : रेणुका, शमिंद्रनाथ, मीरा, रथिंद्रनाथ, माधुरिलता

शिक्षा              : लन्दन लॉ कॉलेज और सेट जेवियर स्कूल

कार्यक्षेत्र          : कहानीकार, गीताकर, संगीतकार,                                                नाटककार, निबंधकार तथा चित्रकार

पुरस्कार          : नोबेल पुरस्कार (1913)

मुख्य योगदान  : भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान के रचियता

रविंद्रनाथ टैगोर एक विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार और दार्शनिक थे। वे अकेले ऐसे भारतीय साहित्यकार हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला है। वह नोबेल पुरस्कार पाने वाले प्रथम एशियाई और साहित्य में नोबेल पाने वाले पहले गैर यूरोपीय भी थे। वह दुनिया के अकेले ऐसे कवि हैं जिनकी रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान हैं – भारत का राष्ट्र-गान ‘जन गण मन’ और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान ‘आमार सोनार बाँग्ला’। कहा जाता है कि श्रीलंका के राष्ट्रगान का एक हिस्सा भी सन् 1938 में टैगोर द्वारा लिखे गये बंगाली गीत पर आधारित है। गुरुदेव के नाम से भी प्रसिद्ध रविंद्रनाथ टैगोर ने बांग्ला साहित्य और संगीत को एक नई दिशा दी। उन्होंने बंगाली साहित्य में नए तरह के पद्य और गद्य और बोलचाल की भाषा का भी प्रयोग किया। इससे बंगाली साहित्य क्लासिकल संस्कृत के प्रभाव से मुक्त हो गया। रविंद्रनाथ टैगोर ने भारतीय सभ्यता की अच्छाइयों को पश्चिम में और वहां की अच्छाइयों को यहाँ पर लाने में प्रभावशाली भूमिका निभाई। बचपन से ही उनकी कविता, छन्द और भाषा में अद्भुत प्रतिभा का आभास लोगों को मिलने लगा था। उनकी प्रतिभा का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है की जब वे मात्र 8 साल के थे तब उन्होंने अपनी पहली कविता लिखी थी। 16 साल की उम्र में ‘भानुसिम्हा’ उपनाम से उनकी कवितायेँ प्रकाशित भी हो गयीं। देश और विदेश के सारे साहित्य, दर्शन, संस्कृति आदि उन्होंने आहरण करके अपने अन्दर समेट लिए थे। पिता के ब्रह्म-समाजी के होने के कारण वे भी ब्रह्म-समाजी थे। पर अपनी रचनाओं व कर्म के द्वारा उन्होंने सनातन धर्म को भी आगे बढ़ाया।  वह घोर राष्ट्रवादी थे और ब्रिटिश राज की भर्त्सना करते हुए देश की आजादी की मांग की। जलिआंवाला बाग़ कांड के बाद उन्होंने अंग्रेजों द्वारा दिए गए नाइटहुड का त्याग कर दिया।
मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी सम्पर्क है, उनकी रचनाओं के अन्दर वह अलग-अलग रूपों में उभर आता है। साहित्य की शायद ही ऐसी कोई शाखा हो, जिनमें उनकी रचना न हो - कविता, गान, कथा, उपन्यास, नाटक, प्रबन्ध, शिल्पकला - सभी विधाओं में उन्होंने रचना की। उनकी प्रकाशित कृतियों में गीतांजली, गीताली, गीतिमाल्य, कथा ओ कहानी, शिशु, भोलानाथ, कणिका, क्षणिका, खेया आदि प्रमुख हैं। उन्होंने कुछ पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद भी किया। अंग्रेज़ी अनुवाद के बाद उनकी प्रतिभा पूरे विश्व में फैली।

 

प्रारंभिक जीवन
रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। उनके पिता देवेन्द्रनाथ टैगोर और माता शारदा देवी थीं। वह अपने माँ-बाप की तेरह जीवित संतानों में सबसे छोटे थे। जब वे छोटे थे तभी उनकी माँ का देहांत हो गया और चूँकि उनके पिता अक्सर यात्रा पर ही रहते थे इसलिए उनका लालन-पालन नौकरों-चाकरों द्वारा ही किया गया। टैगोर परिवार ‘बंगाल रेनैस्सा’ (नवजागरण) के अग्र-स्थान पर था। वहां पर पत्रिकाओं का प्रकाशन, थिएटर, बंगाली और पश्चिमी संगीत की प्रस्तुति अक्सर होती रहती थी| इस प्रकार उनके घर का माहौल किसी विद्यालय से कम नहीं था।
उनके सबसे बड़े भाई द्विजेन्द्रनाथ एक दार्शनिक और कवि थे। उनके एक दूसरे भाई सत्येन्द्रनाथ टैगोर इंडियन सिविल सेवा में शामिल होने वाले पहले भारतीय थे। उनके एक और भाई ज्योतिन्द्रनाथ संगीतकार और नाटककार थे। उनकी बहन स्वर्नकुमारी देवी एक कवयित्री और उपन्यासकार थीं। पारंपरिक शिक्षा पद्धति उन्हें नहीं भाती थी इसलिए कक्षा में बैठकर पढना पसंद नहीं था। वह अक्सर अपने परिवार के सदस्यों के साथ परिवार के जागीर पर घूमा करते थे। उनके भाई हेमेंद्रनाथ उन्हें पढाया करते थे। इस अध्ययन में तैराकी, कसरत, जुडो और कुश्ती भी शामिल थे। इसके अलावा उन्होंने ड्राइंग, शरीर रचना, इतिहास, भूगोल, साहित्य, गणित, संस्कृत और अंग्रेजी भी सीखा। आपको ये जानकार हैरानी होगी कि औपचारिक शिक्षा उनको इतनी नापसंद थी कि कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में वो सिर्फ एक दिन ही गए।
अपने उपनयन संस्कार के बाद रविंद्रनाथ अपने पिता के साथ कई महीनों के भारत भ्रमण पर निकल गए। हिमालय स्थित पर्यटन-स्थल डलहौज़ी पहुँचने से पहले वह परिवार के जागीर शान्तिनिकेतन और अमृतसर भी गए। डलहौज़ी में उन्होंने इतिहास, खगोल विज्ञान, आधुनिक विज्ञान, संस्कृत, जीवनी का अध्ययन किया और कालिदास के कविताओं की विवेचना की। इसके पश्चात रविंद्रनाथ जोड़ासाँको लौट आये और सन 1877 तक अपनी कुछ महत्वपूर्ण रचनाएँ कर डाली।
उनके पिता देबेन्द्रनाथ उन्हें बैरिस्टर बनाना चाहते थे इसलिए उन्होंने रविंद्रनाथ को वर्ष 1878 में इंग्लैंड भेज दिया। उन्होंने यूनिवर्सिटी कॉलेज लन्दन में लॉ की पढाई के लिए दाखिला लिया पर कुछ समय बाद उन्होंने पढाई छोड़ दी और शेक्सपियर और कुछ दूसरे साहित्यकारों की रचनाओं का स्व-अध्ययन किया। सन 1880 में बिना लॉ की डिग्री के वह बंगाल वापस लौट आये। वर्ष 1883 में उनका विवाह मृणालिनी देवी से हुआ।

कैरियर
इंग्लैंड से वापस आने और अपनी शादी के बाद से लेकर सन 1901 तक का अधिकांश समय रविंद्रनाथ ने सिआल्दा (अब बांग्लादेश में) स्थित अपने परिवार की जागीर में बिताया। वर्ष 1898 में उनके बच्चे और पत्नी भी उनके साथ यहाँ रहने लगे थे। उन्होंने दूर तक फैले अपने जागीर में बहुत भ्रमण किया और ग्रामीण और गरीब लोगों के जीवन को बहुत करीबी से देखा। वर्ष 1891 से लेकर 1895 तक उन्होंने ग्रामीण बंगाल के पृष्ठभूमि पर आधारित कई लघु कथाएँ लिखीं।
वर्ष 1901 में रविंद्रनाथ शान्तिनिकेतन चले गए। वह यहाँ एक आश्रम स्थापित करना चाहते थे। यहाँ पर उन्होंने एक स्कूल, पुस्तकालय और पूजा स्थल का निर्माण किया। उन्होंने यहाँ पर बहुत सारे पेड़ लगाये और एक सुन्दर बगीचा भी बनाया। यहीं पर उनकी पत्नी और दो बच्चों की मौत भी हुई। उनके पिता भी सन 1905 में चल बसे। इस समय तक उनको अपनी विरासत से मिली संपत्ति से मासिक आमदनी भी होने लगी थी। कुछ आमदनी उनके साहित्य की रॉयल्टी से भी होने लगी थी। 14 नवम्बर 1913 को रविंद्रनाथ टैगोर को साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। नोबेल पुरस्कार देने वाली संस्था  स्वीडिश अकैडमी ने उनके कुछ कार्यों के अनुवाद और ‘गीतांजलि’ के आधार पर उन्हें ये पुरस्कार देने का निर्णय लिया था। अंग्रेजी सरकार ने उन्हें वर्ष 1915 में नाइटहुड प्रदान किया जिसे रविंद्रनाथ ने 1919 के जलिआंवाला बाग़ हत्याकांड के बाद छोड़ दिया। सन 1921 में उन्होंने कृषि अर्थशाष्त्री लियोनार्ड एमहर्स्ट के साथ मिलकर उन्होंने अपने आश्रम के पास ही ‘ग्रामीण पुनर्निर्माण संस्थान’ की स्थापना की। बाद में इसका नाम बदलकर श्रीनिकेतन कर दिया गया। अपने जीवन के अंतिम दशक में टैगोर सामाजिक तौर पर बहुत सक्रीय रहे। इस दौरान उन्होंने लगभग 15 गद्य और पद्य कोष लिखे। उन्होंने इस दौरान लिखे गए साहित्य के माध्यम से मानव जीवन के कई पहलुओं को छुआ। इस दौरान उन्होंने विज्ञान से सम्बंधित लेख भी लिखे।
उन्होंने अपने जीवन के अंतिम 4 साल पीड़ा और बीमारी में बिताये। वर्ष 1937 के अंत में वो अचेत हो गए और बहुत समय तक इसी अवस्था में रहे। लगभग तीन साल बाद एक बार फिर ऐसा ही हुआ। इस दौरान वह जब कभी भी ठीक होते तो कवितायें लिखते। इस दौरान लिखी गयीं कविताएं उनकी बेहतरीन कविताओं में से एक हैं। लम्बी बीमारी के बाद 7 अगस्त 1941 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनकी मृत्यु पर गुरूदेव के प्रशंसक महात्मा गाँधी ने कहा था "गुरूदेव के पार्थिव शरीर की राख पृथ्वी में मिल गई है, लेकिन उनके व्यक्त्वि का प्रकाश सूर्य की ही तरह तब तक बना रहेगा जब तक पृथ्वी पर जीवन है... गुरूदेव एक महान अध्यापक ही नहीं थे वरन् एक ऋषि थे।”

 

साहित्य सृजन 

गुरुदेव के नाम से रबीन्द्रनाथ टैगोर ने बांग्ला साहित्य को एक नई दिशा दी। उन्होंने बंगाली साहित्य में नए तरह के पद्य और गद्य के साथ बोलचाल की भाषा का भी प्रयोग किया। इससे बंगाली साहित्य क्लासिकल संस्कृत के प्रभाव से मुक्त हो गया। टैगोर की रचनायें बांग्ला साहित्य में एक नई ऊर्जा ले कर आई। अधिकतर लोग उनको एक कवि के रूप में ही जानते हैं परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं था। कविताओं के साथ-साथ टैगोर ने अपने जीवनकाल में कई उपन्यास, निबंध, लघु कथाएँ, यात्रावृन्त, नाटक और हजारों गाने भी लिखे हैं। टैगोर की गद्य में लिखी उनकी छोटी कहानियों को शायद सबसे अधिक लोकप्रिय माना जाता है; इस प्रकार इन्हें वास्तव में बंगाली भाषा के संस्करण की उत्पत्ति का श्रेय दिया जाता है।
उनके काम अक्सर उनके लयबद्ध, आशावादी, और गीतात्मक प्रकृति के लिए काफी उल्लेखनीय हैं। उनकी कविताओं में नदी और बादल की अठखेलियों से लेकर अध्यात्मवाद तक के विभिन्न विषयों को बखूबी उकेरा गया है। उनकी कविता पढ़ने से उपनिषद की भावनाएं परिलक्षित होती है। टैगोर ने इतिहास, भाषाविज्ञान और आध्यात्मिकता से जुड़ी कई किताबें लिखी थी। उन्होंने एक दर्जन से अधिक उपन्यास लिखे। इनमे चोखेर बाली, घरे बहिरे, गोरा आदि शामिल है। उनके उपन्यासों में मध्यम वर्गीय समाज विशेष रूप से उभर कर सामने आया। मात्र आठ वर्ष की उम्र मे पहली कविता और केवल 16 वर्ष की उम्र मे पहली लघुकथा प्रकाशित कर बांग्ला साहित्य मे एक नए युग की शुरुआत की रूपरेखा तैयार की। टैगोर के यात्रावृन्त, निबंध, और व्याख्यान कई खंडों में संकलित किए गए थे, जिनमें यूरोप के जटरिर पत्रों (यूरोप से पत्र) और मनुशर धरमो (द रिलिजन ऑफ मैन) शामिल थे। अल्बर्ट आइंस्टीन के साथ उनकी संक्षिप्त बातचीत, "वास्तविकता की प्रकृति पर नोट", बाद के उत्तरार्धों के एक परिशिष्ट के रूप में शामिल किया गया है।
टैगोर के १५० वें जन्मदिन के अवसर पर उनके कार्यों का एक (कालनुक्रोमिक रबीन्द्र रचनाबली) नामक एक संकलन वर्तमान में बंगाली कालानुक्रमिक क्रम में प्रकाशित किया गया है। इसमें प्रत्येक कार्य के सभी संस्करण शामिल हैं और लगभग अस्सी संस्करण है। २०११ में, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने विश्व-भारती विश्वविद्यालय के साथ अंग्रेजी में उपलब्ध टैगोर के कार्यों की सबसे बड़ी संकलन द एसेंटियल टैगोर, को प्रकाशित करने के लिए सहयोग किया है यह फकराल आलम और राधा चक्रवर्ती द्वारा संपादित की गयी थी और टैगोर के जन्म की १५० वीं वर्षगांठ की निशानी हैं।

संगीत और कला
एक महान कवि और साहित्यकार के साथ-साथ गुरु रविंद्रनाथ टैगोर एक उत्कृष्ट संगीतकार और पेंटर भी थे। टैगोर ने करीब 2,230 गीतों की रचना की। रवींद्र संगीत बाँग्ला संस्कृति का अभिन्न अंग है। टैगोर के संगीत को उनके साहित्य से अलग नहीं किया जा सकता। उनकी अधिकतर रचनाएँ तो अब उनके गीतों में शामिल हो चुकी हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ठुमरी शैली से प्रभावित ये गीत मानवीय भावनाओं के अलग-अलग रंग प्रस्तुत करते हैं। अलग-अलग रागों में गुरुदेव के गीत यह आभास कराते हैं मानो उनकी रचना उस राग विशेष के लिए ही की गई थी। प्रकृति के प्रति गहरा लगाव रखने वाला यह प्रकृति प्रेमी ऐसा एकमात्र व्यक्ति है जिसने दो देशों के लिए राष्ट्रगान लिखा।
लगभग 60 साल की उम्र में रविंद्रनाथ टैगोर ने ड्राइंग और चित्रकला में रूचि दिखाना प्रारंभ किया। उन्होंने अपनी कला में विभिन्न देशों के शैली को समाहित किया। इसमें युग का संशय, मोह, क्लान्ति और निराशा के स्वर प्रकट हुए हैं। मनुष्य और ईश्वर के बीच जो चिरस्थायी सम्पर्क है उनकी चित्रकला में वह अलग-अलग रूपों में उभरकर सामने आया। 

 

यात्रायें
सन 1878 से लेकर सन 1932 तक उन्होंने 30 देशों की यात्रा की। उनकी यात्राओं का मुख्य मकसद अपनी साहित्यिक रचनाओं को उन लोगों तक पहुँचाना था जो बंगाली भाषा नहीं समझते थे। प्रसिद्ध अंग्रेजी कवि विलियम बटलर यीट्स ने गीतांजलि के अंग्रेजी अनुवाद का प्रस्तावना लिखा। उनकी अंतिम विदेश यात्रा सन 1932 में सीलोन (अब श्रीलंका) की थी।

राजनैतिक विचार
उनके राजनैतिक विचार बहुत जटिल थे। उन्होंने यूरोप के उपनिवेशवाद की आलोचना की और भारतीय राष्ट्रवाद का समर्थन किया। इसके साथ-साथ उन्होंने स्वदेशी आन्दोलन की आलोचना की और कहा कि हमें आम जनता के बौधिक विकास पर ध्यान देना चाहिए – इस प्रकार हम स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं। टैगोर और महात्मा गान्धी के बीच राष्ट्रीयता और मानवता को लेकर हमेशा वैचारिक मतभेद रहा। जहां गान्धी पहले पायदान पर राष्ट्रवाद को रखते थे, वहीं टैगोर मानवता को राष्ट्रवाद से अधिक महत्व देते थे। लेकिन दोनों एक दूसरे का बहुत अधिक सम्मान करते थे। टैगोर ने गान्धीजी को महात्मा का विशेषण दिया था। एक समय था जब शान्तिनिकेतन आर्थिक कमी से जूझ रहा था और गुरुदेव देश भर में नाटकों का मंचन करके धन संग्रह कर रहे थे। उस समय गान्धी जी ने टैगोर को 60 हजार रुपये के अनुदान का चेक दिया था। जीवन के अन्तिम समय ७ अगस्त १९४१ से कुछ समय पहले इलाज के लिए जब उन्हें शान्तिनिकेतन से कोलकाता ले जाया जा रहा था तो उनकी नातिन ने कहा कि आपको मालूम है हमारे यहाँ नया पावर हाउस बन रहा है। इसके जवाब में उन्होंने कहा कि हाँ पुराना आलोक चला जाएगा और नए का आगमन होगा। भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन के समर्थन में उन्होंने कई गीत लिखे। सन 1919 के जलियांवाला बाग़ नरसिंहार के बाद उन्होंने अंग्रेजों द्वारा दी गयी नाइटहुड का त्याग कर दिया।  गाँधी और अमबेडकर के मध्य ‘अछूतों के लिए पृथक निर्वाचक
मंडल’ मुद्दे पर हुए मतभेद को सुलझाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।

जीवन दर्शन
गुरूदेव का जीवन-दर्शन प्राचीन ऋषियों की तरह व्यापक था। उनका व्यापक जीवन-दर्शन उपनिषदों के गहन चिन्तन–मनन के परिणाम स्वरूप विकसित हुआ था। उपनिषदों में विवेचित विश्वबोध की भावना ने गुरूदेव के व्यक्त्वि सोच और कार्य को अत्यधिक प्रभावित किया। वे सम्पूर्ण जीव-जगत में इस सत्ता को महसूस करते हैं। इसीलिए गुरूदेव को मानव मात्र की एकता में अनन्त विश्वास है। उन्हें विश्व की बाह्य विविधताओं के मध्य एकता नजर आती है। उनका विश्वास है कि ईश्वर सम्पूर्णता का अनन्त आदर्श है और मनुष्य उस पूर्णता को प्राप्त करने की शाश्वत प्रक्रिया है। एक और अनेक का मिलना तथा बाह्य का आंतरिक से समन्वय, इन दोनों के बारे में गहन सोच तथा इन्हें जीवन में प्रयुक्त करने हेतु व्यवहारिक
मार्ग की खोज गुरूदेव के जीवन का परम लक्ष्य था।
टैगोर के जीवन दर्शन में मानव करूणा का महत्वपूर्ण स्थान है। वे भारतीयों की गरीबी से अत्यधिक द्रवित हो जाते थे। इसने उनकी जीवन दृष्टि को व्यापक रूप से प्रभावित किया। गुरूदेव के व्यक्त्वि का दूसरा पक्ष भी अत्यन्त महत्वपूर्ण था। उन्हें मानव की निर्णय लेने एवं उसे क्रियान्वित करने की इच्छा शक्ति पर दृढ़ विश्वास था। उनका मानना था कि "हम जो भी नवनिर्माण करना चाहते है, उसमें व्यक्ति या समाज किसी के भी आत्मसम्मान को ठेस नहीं पहुँचना चाहिए तथा ऐसा कोई कार्य नहीं चाहिए जिससे जीवन के आध्यात्मिक और संसारिक पक्षों में दुराव हो। अपने निबन्ध 'द पोएट्स स्कूल मे गुरूदेव ने लिखा "मानव इस संसार में इसलिए नहीं आया है कि वह इसके बारे में सारी सूचनांए एकत्रित करे तथा उसे अपना दास बनाए, वह इसे यहाँ अपना घर बनाने आया है, वह यहाँ जीव मात्र का सहयोगी और वसुधा का पूजक बनने आया है, वह यहाँ प्रेम, कलात्मक रचनात्मकता तथा आनन्द के द्वारा अपनी इच्छा को पूर्ण करने आया है। गुरूदेव की दृष्टि में इन सब को जीवन के प्रति सम्पूर्ण उपागम को अपनाकर पाया जा सकता है, न कि आंशिक विकास एवं स्वार्थ के द्वारा।"
टैगोर को मानव की क्षमता में पूर्ण विश्वास था। उन्होंने व्यक्त्वि के सामन्जस्यपूर्ण विकास पर बल दिया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जब मानव जाति पर गंभीर संकट आया उस समय भी महाकवि ने मानव के विवेक पर आस्था जताते हुए कहा कि हम इस संकट को पार कर सृजनात्मक जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करेंगे। टैगोर व्यक्ति के सम्मान और उसकी स्वतंत्रता में आस्था रखते थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर भारतीय ग्राम जीवन एवं संस्कृति का पुनरूत्थान चाहते थे। 1905 में उन्होंने 'स्वदेश समाज' नाम से एक लम्बा निबंध लिखा। इसमें कृषि, शिल्प, ग्रामोद्योग आदि के पुनर्विकास पर जोर दिया गया। स्वप्रबन्धित समाज के निर्माण पर उन्होंने अत्यधिक बल दिया। इस संदर्भ में गुरूदेव के प्रयासों की सराहना करते हुए महात्मा गाँधी ने कहा “उन्होंने (रवीन्द्रनाथ टैगोर ने) भारत की निर्धनता का कारण समझा तथा इसे कैसे समाप्त किया जाया, इस संदर्भ में उनके पास पैनी दृष्टि थी। इस कार्य हेतु उन्होंने सबसे अधिक बल शिक्षा पर दिया- न केवल बच्चों की शिक्षा बल्कि प्रौढ़ों की भी शिक्षा। भारत अपना परम्परागत गौरव हासिल कर सके इसके लिए उन्होंने संभावनाओं को तलाशा तथा राह गढ़े।"
टैगोर दर्पपूर्ण राष्ट्रवाद के घोर विरोधी थे। वे सभी संस्कृतियों के मध्य सहयोग एवं समन्वय की कामना रखते थे। उन्होंने विश्वभारती विश्वविद्यालय को सभी संस्कृतियों का मिलन स्थल बनाया। इस विश्वविद्यालय का ध्येय वाक्य 'यत्र विश्वम् भवेत्य नीड़म्” टैगोर के आदर्शों को परिलक्षित करता है। वास्तव में गुरूदेव एक विश्व नागरिक थे और वे मानव को उसकी क्षुद्र सीमाओं से निकाल कर उन्हें 'वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना से ओत-प्रोत करना चाहते थे।

रवीन्द्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित शैक्षिक संस्थायें
रवीन्द्रनाथ टैगोर उन महान शिक्षाशास्त्रियों में से एक है जिन्होंने शिक्षा से सम्बन्धित केवल सिद्धान्त ही प्रतिपादित नहीं किए वरन् उन्हें व्यवहारिक रूप भी देने का प्रयास किया। इस क्रम में गुरूदेव ने अनेक शैक्षिक संस्थाओं की स्थापना की, जो निम्नलिखित है :-
शान्तिनिकेतन
1901 मे रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ब्रह्मचर्य आश्रम की स्थापना बोलपुर के पास की। बाद में इसका नाम उन्होंने शान्तिनिकेतन रखा। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि जिस समय ब्रह्मचर्य विद्यालय की स्थापना की गई उस समय टैगोर नेवैद्य नामक कवितांए लिख रहे थे। जिस पर उपनिषद् के आर्दशों का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। उसी समय ब्रह्मबांधव उपाध्याय ने टैगोर को 'गुरूदेव' कहा और वे अंत तक गुरूदेव बने रहे। टैगोर विद्यालयों के नियमों को संहिता पर आधारित करना चाहते थे ताकि भारतीय परम्परा के अनुसार विद्यालय का संचालन किया जा सके। प्रारंभ में शान्तिनिकेतन को रवीन्द्रनाथ टैगोर के दो पुत्रों रतिन्द्रनाथ तथा समिन्द्रनाथ के साथ प्रारंभ किया गया। बाद में छात्रों तथा अध्यापकों की संख्या बढ़ती गई। 1913 तक गुरूदेव ने स्वंय ही इस संस्था का व्यय वहन किया। 1913 में नोबेल पुरस्कार मिलने के उपरांत आर्थिक संकट कम हुआ। अमेरिका, यूरोप, चीन, जापान आदि देशों के भ्रमण करने से गुरूदेव के शैक्षिक विचारों में परिपक्वता आई । शान्तिनिकेतन विश्वभर की संस्कृतियों का मिलन स्थल बन गया जहाँ
कोई भी बिना धर्म, देश या संस्कृति के भेदभाव के सम्मानपूर्वक शिक्षा ग्रहण कर सकता था। टैगोर शान्तिनिकेतन से कुछ हद तक निराश हुए। उन्हें लगा कि उसमें उनके विचारो पर अमल नहीं किया जा रहा है। वे कहते हैं "अभिभावकों की अवसरवादिता परीक्षा प्रणाली लागू करने के लिए जिम्मेवार है। इसने एक प्रकार से आजादी
और स्वतः स्फूर्तता का वातावरण कमजोर किया।"

शिक्षा सत्र
अपना प्रयोग जारी रखने के लिए टैगोर ने 1924 में शिक्षा सत्र के नाम से एक और स्कूल प्रारम्भ किया। इसमें ऐसे बच्चे शामिल किए गये जो अनाथ थे या जिनके माता-पिता इतने गरीब थे कि वे उन्हें किसी भी स्कूल में नही भेज सकते थे। उन्हें इस स्कूल से बड़ी आशाएं थी। वस्तुतः उन्हें उम्मीद थी कि शान्तिनिकेतन की कमियां इस विद्यालय में नही आयेंगी और यह विद्यालय उनके विचारों का सही अर्थों मे मूर्तरूप होगा। लेकिन 'शिक्षा सत्र' के महत्वपूर्ण शैक्षिक प्रयोगों को टैगोर के उपरांत विस्मृत कर दिया गया और वह एक सामान्य विद्यालय बन गया।

श्रीनिकेतन
गुरूदेव भारतीय ग्राम्य जीवन को पुनः उसकी गौरवशाली परम्पराओं के आधार पर पुनर्जीवित करना चाहते थे। 1905 में उन्होंने स्वदेश समाज नामक निबन्ध में कृषि, शिल्प, ग्रामोद्योग को पुनः विकसित करने पर जोर दिया। इन्हीं सपनों को वास्तविक रूप देने के लिए शान्तिनिकेतन के एक मील की दूरी पर, ‘सुरूल' नामक स्थान में ग्रामीण पुनर्रचना के लिए उन्होंने श्रीनिकेतन की स्थापना की। यह एक दिलचस्प तथ्य है कि 1920 के दशक के मध्य उन्होंने दो प्रसिद्ध नाटक उस समय लिखे जब श्रीनिकेतन का प्रयोग चल रहा था। ये थे 1922 में लिखी गई मुक्तोधारा और 1924 में लिखी गई रक्तकरबी। दोनों में ही मशीनी सभ्यता के प्रति विरोध का भाव है। वे प्रकृति पर मशीनी टेक्नोलॉजी के प्रभुत्व से चितिंत थे।
तकनीकी प्रभुत्व वाले समाज के शोषण के चरित्र के प्रति तिरस्कार की भावना स्पष्ट है। श्रीनिकेतन का प्रयोग आरम्भ करने के लिए उन्हें विदेश से एमहर्ट द्वारा लाई गई वित्तीय सहायता पर निर्भर होना पड़ा था। श्रीनिकेतन प्रयोग के दौरान ग्रामीण समाज की विशेष जरूरत के आधार पर विकसित आत्म सहायता और सहयोग के जरिए सामुदायिक विकास पर ध्यान दिया गया।

विश्वभारती
1921 के अंत में शान्तिनिकेतन का विस्तार ‘विश्वभारती विश्वविद्यालय के रूप में किया गया। यह विश्वविद्यालय अपने आदर्श वाक्य 'यत्र विश्वम् भवेत्य नीड़ को साकार करता है। सच ही यहाँ सम्पूर्ण वसुधा ‘विश्वभारती नामक घोसले में समा जाती है। यह एक ऐसी संस्था है जहाँ पूर्व की सभी संस्कृतियों का मिलन होता है, जहाँ दर्शन और कला की हर परम्परा एक दूसरे से सम्बन्ध बनाती है, जहाँ पूर्व और पश्चिम के दार्शनिक, साहित्यकार एवं कलाकार अपनत्व महसूस करते है। विश्वभारती एक आवासीय विश्वविद्यालय है जहाँ सह-शिक्षा की व्यवस्था है। राष्ट्रीयता, धर्म, जाति, भाषा के आधार पर विद्यार्थियों एवं अध्यापकों में कोई भेदभाव नहीं है। सभी ईश्वर की उत्कृष्ट रचना मानव के रूप में सम्मान के साथ अध्ययन
करते हैं। सन् 1951 में भारतीय संसद में 'विश्वभारती को केन्द्रीय विश्वविद्यालय के रूप में मान्यता दी। इससे आर्थिक सुदृढ़ता तो आयी पर अन्य सरकार पर आधारित अन्य विश्वविद्यालयों की तरह इसमें भी नवीनता एवं सृजनात्मकता पर जोर क्रमशः कम होने लगा। ।
विश्वभारती में अनेक विभाग है, जिन्हें 'भवन' कहा जाता है। ये भवन निम्नलिखित है :-

  1. पाठ भवन- यह उच्च विद्यालय स्तर तक की शिक्षा बंगला भाषा में प्रदान करता है।

  2. शिक्षा भवन- इसमें इण्टर तक की शिक्षा दी जाती है। बंगला, अंग्रेजी, हिन्दी, संस्कृत, तर्कशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, गणित, भूगोल, विज्ञान आदि विषयों की शिक्षा की व्यवस्था है।

  3. विद्या भवन- इसमें स्नातक स्तर का तीन वर्षीय पाठ्यक्रम, दो वर्षों का एम0ए0 तथा एम0एस-सी0 का पाठ्यक्रम और पी-एच0डी0 की व्यवस्था है।

  4. विनय भवन- यह अध्यापक शिक्षा विभाग है। जिसमें बी0ए0,एम0एड0 एवं शिक्षाशास्त्र में पी-एच0डी0 की व्यवस्था है।

  5. कला भवन- कला तथा शिल्प में दो वर्ष का पाठ्यक्रम हाईस्कूल के उपरांत चार वर्षीय डिप्लोमा तथा स्त्रियों के लिए दो वर्ष का सर्टिफिकेट कोर्स कला भवन में उपलब्ध है। इस भवन में अपना पुस्तकालय एवं संग्रहालय है।

  6. संगीत विभाग- इसमें संगीत और नृत्य से सम्बन्धित विभिन्न तरह के पाठ्यक्रम संचालित किए जाते है।

  7. चीन भवन- इसमें चीनी भाषा और संस्कृति, इतिहास के बारे में शिक्षा दी जाती है।

  8. हिन्दी भवन- इस भवन में हिन्दी भाषा एवं साहित्य की उच्च स्तरीय शिक्षा की व्यवस्था है।

  9. इस्लाम अनुसंधान विभाग- इसमें इस्लाम धर्म के अध्ययन और अनुसंधान का प्रबन्ध किया गया है। इस प्रकार विश्वभारती में विद्यालय स्तर से लेकर उच्च स्तर के शिक्षा की समुचित व्यवस्था है।

महात्मा गाँधी ने गुरूदेव द्वारा स्थापित संस्थाओं के बारे में कहा कि गुरूदेव की शक्ति नई चीजों के निर्माण में थी। उन्होंने शान्तिनिकेतन, श्रीनिकेतन, विश्वभारती जैसी संस्थाओं की स्थापना की। इन संस्थाओं में गुरूदेव की आत्मा निवास करती है। ये संस्थायें केवल बंगाल की ही नहीं वरन् पूरे भारत की धरोहर हैं।

सम्मान
उनकी काव्यरचना गीतांजलि के लिये उन्हे सन् १९१३ में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला। सन् १९१५ में उन्हें राजा जॉर्ज पंचम ने नाइटहुड की पदवी से सम्मानित किया जिसे उन्होंने सन् १९१९ में जलियाँवाला बाग हत्याकांड के विरोध में वापस कर दिया था।

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Ramgarh (Uttarakhand), India