बेबस मजदूर और बेफिक्र सरकार!

के० के० पांडेय

लॉकडाउन होने के बाद से ही कई राज्यों में प्रवासी श्रमिक फंसे हुए हैं। समस्या यह है कि लॉक डाउन में काम बंद हुआ तो रोटी का समस्या खड़ी हो गई। परिवार को रोटी नहीं खिला सकते ऐसे में मकान का किराया कहां से दें। यात्री परिवहन सेवाएं बंद होने के कारण इन मजदूरों के पास घर जाने का कोई साधन नहीं है। सरकार ट्रेन तो चला रही है, लेकिन इसका किराया इतना ज्यादा है कि वे टिकट खरीदने में असमर्थ हैं। उनके पास खाने-पीने के लिए भी कुछ नहीं है। असहाय मजदूर घर पहुंचने की लालसा में पैदल ही अपने घर लौट रहे हैं। चिलचिलाती धूप और तपती सड़कें भी श्रमिकों की राह नहीं रोक पा रही हैं। उनकी तो मजबूरी है बस चलते रहना, जिन सड़कों को बनाने में इन श्रमिकों ने पसीने बहाए आज उन्हीं बेबस-असहाय से हजारों किलोमीटर दूर से पैदल चले आ रहे हैं। भूखे पेट बच्चे हैं, सूखे हुए गले हैं, टूटी हुई चप्पल है, कुर्ते की फटी जेब है। यहां तक कि कईयों के पैर में छाले पड़ गए तो कुछ के पैरों खून तक बह निकले। पता नहीं ऐसे कितने मजदूर होंगे जो घर पहुंचने की लालसा में पैदल चलते-चलते गुजर गए होंगे और किसी को ट्रक-टैम्पो ने टक्कर मार दी होगी। इन मौतों पर दो आंसू बहाने वाला भी कोई नहीं।  

'न्यू इंडिया' की दर्दभरी तस्वीर
प्रवासी मजदूरों के अस्तित्व और परेशानियों को नकारते हुए लॉकडाउन शुरू कर दिया गया। प्रवासी मजदूरों के वजूद पर नज़र तब गई जब उन्होंने कदम आगे बढ़ा दिये, हजारों किलोमीटर के सफर पर पैदल ही निकल पड़े। इनकी और इनके परिवार की ज़िंदगी उसी नकद आमदनी पर टिकी होती है जिसे ये पूरे दिन काम करने के बाद घर लेकर जाते हैं। उनका कहना हैं कि हमें कोरोना वायरस के बारे में सब कुछ पता है, ये बहुत ख़तरनाक है। पर हमारे जैसे लोगों के पास दो ही विकल्प हैं - एक सुरक्षा और दूसरा भूख। अब आप ही बताएं कि हम किसे चुनें। भारत और इंडिया के बीच बढ़ती खाई पैदल चल रहे मजदूरों के पैर की बेवाई जैसी 'न्यू इंडिया' की दर्दभरी तस्वीर प्रस्तुत कर रही है।

दोहरे मापदंड
भले ही केंद्र सरकार ने प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्य पहुंचाने की मंजूरी दे दी हो, लेकिन इस दौरान कोरोना वायरस महामारी और लॉकडाउन के मारे इन प्रवासी मजदूरों से टिकट के पैसे लेने पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। सबसे अधिक चौंकाने वाली बात ये है कि इसी कोरोना वायरस महामारी के समय विदेशों में फंसे भारतीयों को जब भारत वापस लाया गया था तो उनका पूरा खर्च केंद्र सरकार ने उठाया था। लेकिन जब प्रवासी मजदूरों को वापस उनके घर भेजने की बारी आई तो केंद्र ने इसका जिम्मा राज्यों पर डाल दिया और सफर मुफ्त नहीं किया। गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी गाइडलाइन्स के मुताबिक, हर राज्य को बसों के जरिए अपने यहां के मजदूरों को वापस लाने का काम शुरू करना होगा। इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग, क्वारनटीन, सैनिटाइजेशन, स्क्रीनिंग समेत हर नियम का पालन करना जरूरी होगा। सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों के कारण बसों में जो सीटें खाली छोड़ी जा रही हैं, उनका किराया भी मजदूरों से लिया जा रहा है और उन्हें टिकट दोगुने की पड़ रही है। 

हौसला बन कर सामने आई सामाजिक संस्थाएं 
घर वापसी के इस सफर में इन प्रवासी मजदूरों को धन नहीं चाहिए, बल्‍कि घर लौटने की अपनी इस जीवटता को जिंदा रखने के लिए सहयोग और हौसला चाहिए। ये सुख की बात है कि एक तरफ गरीब मजदूरों के सफर का संघर्ष है वहीं दूसरी तरफ उस सफर में उनका हौसला बन कर कई सामाजिक संस्थाएं और लोग भी नजर आ रहे हैं। कोई इन मजदूरों को गरमा-गर्म रोटियां, पूरी बनाकर प्रेम से खिला रहा है, कोई मास्क और सेनिटिज़ेर दे रहा है, तो कोई उनके पैरों को धूप और गर्म सड़क से बचाने के लिए जूते-चप्‍पल पहना रहा है। मदद और परोपकार की इस तस्‍वीर को सभी लोगों को आगे आकर देशहित में और बड़ा और वि‍स्‍तृत करना होगा।

राज्य की परिस्थितियों के अनुरूप ठोस प्रयास आवश्यक
कोरोना महामारी और लॉकडाउन की लंबी अवधि ने भारत में श्रमिकों के हालात और श्रम रोजगार से जुड़े कुछ अनछुए अध्याय भी खोल दिए हैं। मजदूरों के पलायन को रोकने और आर्थिक विकास का मजबूत आधार बनाने के लिए हर राज्य में वहां की परिस्थितियों के अनुरूप प्रयास जरूरी है। पीएम मोदी की सरकार ने इस महामारी की वजह से परेशान होने वाले दिहाड़ी मजदूरों की भी मदद करने का वादा किया है। लेकिन इन वादों को अमल में लाने के लिए सरकारों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। यदि सरकार चाहती है कि कोरोना-संकट के बाद भारत की अर्थ-व्यवस्था शीघ्र ही पटरी पर लौट जाए तो उसे मजदूरों की आमदनी और सुरक्षा बढ़ाने पर तुरंत जोर देना चाहिए। देश के करोड़ों मजदूरों के हाथ में ज्यादा पैसा आएगा तो बाजार की रौनक भी बढ़ेगी और काम-धंधे भी जोर पकड़ेंगे।

यह वेबसाइट  शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया द्वारा विकसित की है।

@ 2020 शांतिनिकेतन ट्रस्ट फॉर हिमालया सर्वाधिकार सुरक्षित।

  • Facebook - Black Circle
  • Twitter - Black Circle

Ramgarh (Uttarakhand), India